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Explainer: कब सामने आएगा प्रसूताओं की मौत का सच? सिजेरियन के बाद क्यों बिगड़ी तबीयत? जानिए पूरा मामला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर
Published by: Priya Verma
Updated Fri, 26 Jun 2026 06:30 AM IST
सार
कोटा, बीकानेर, नागौर, डीडवाना और जोधपुर में प्रसूताओं की मौतें सिर्फ आंकड़ा नहीं हैं, यह सिस्टम से एक सवाल है कि प्रसूताओं के वार्डों में आखिर ऐसा क्या हो रहा है, जिसका जवाब अभी तक किसी के पास नहीं है?
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प्रदेश में प्रसूताओं की मौत का जिम्मेदार कौन?
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
लगता है राजस्थान का स्वास्थ्य महकमा गंभीर संक्रमण का शिकार हो गया है। कोटा, जोधपुर, बीकानेर नागौर, डीडवाना में प्रसूताओं की अचानक हुई मौतों ने प्रदेश को झकझोर दिया है। प्रसूताओं की मौत इसलिए ज्यादा चिंताजनक है क्योंकि इन मौतों की वजह अब तक सामने नहीं आई है। वहीं जहां कहीं भी प्रसूताओं की मौतें हुई हैं, वहां किसी न किसी दवा के बैच में कोई खराबी जरूर मिल रही है। ऐसे में लोगों के जेहन में यह डर पनप रहा है कि प्रसूताओं की मौतों का सिलसिला कहीं और ज्यादा तो नहीं बढ़ जाएगा। प्रसूताओं की मौतें सिर्फ आंकड़ा नहीं हैं, सवाल यह है कि प्रसूताओं के वार्डों में आखिर ऐसा क्या हो रहा है, जिसका जवाब अभी तक किसी के पास नहीं है?
राजस्थान में प्रसूताओं की अब तक हुई मौतों की घटनाओं में कुछ समानताएं दिखाई देती हैं, जैसे कोटा, बीकानेर, जोधपुर, नागौर और कुचामन में हुई प्रसूताओं की मौतों में सभी प्रसूताओं की तबीयत सिजेरियन डिलीवरी के बाद अचानक ही बिगड़ी। इन सभी अस्पतालों में आईसीयू संक्रमण और दवा पर शक के मामले भी सामने आए। यहां से दवा बैचों के सैंपल उठाए गए और उन पर रोक भी लगाई गई।
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सबसे बड़ा अनुत्तरित सवाल
सबसे बड़ी बात यह है कि लगभग सभी मामलों में कमेटियां बनाई गईं और अब तक किसी भी कमेटी की तरफ से रिपोर्ट सामने नहीं आई है कि ये मौतें आखिर हुईं कैसे? हालांकि अस्पताल प्रशासन और सरकार हर घटना को अलग-अलग कारणों से जोड़कर देख रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ जिन अस्पतालों में ये घटनाएं हुईं, वहां इस्तेमाल हो रही कुछ दवाओं के बैचों पर रोक लगाए जाने से संदेह और गहरा गया है।
कोटा में मौतों से शुरू हुआ विवाद
राजस्थान में प्रसूताओं की मौतों का विवाद की शुरुआत सबसे पहले कोटा से हुई। मई 2026 में कोटा के न्यू मेडिकल कॉलेज अस्पताल और जेके लोन अस्पताल में सिजेरियन डिलीवरी के बाद कई प्रसूताओं की तबीयत अचानक बिगड़ गई। शुरुआती जांच में संक्रमण और किडनी संबंधी जटिलताओं की आशंका जताई गई।
सबसे पहले न्यू मेडिकल कॉलेज अस्पताल में एक प्रसूता की मौत हुई और पांच अन्य गंभीर हालत में भर्ती हुईं। कुछ ही दिनों में जेके लोन अस्पताल में भी इसी तरह के मामले सामने आए। एक सप्ताह के भीतर दोनों अस्पतालों में प्रसव के बाद जटिलताओं से चार प्रसूताओं की मौत हो गई, जबकि कई अन्य महिलाओं को आईसीयू और वेंटिलेटर पर रखना पड़ा।
बीकानेर: एक जैसे लक्षणों ने बढ़ाई चिंता
कोटा में प्रसूताओं की मौतों के बाद बीकानेर के पीबीएम अस्पताल में सामने आए मामलों ने पूरे प्रदेश में मातृ स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर नई चिंता पैदा कर दी। जून की शुरुआत में अस्पताल में सिजेरियन और सामान्य प्रसव के बाद छह महिलाओं की तबीयत अचानक बिगड़ गई। इनमें कई महिलाओं में किडनी संक्रमण, अत्यधिक रक्तस्राव, प्लेटलेट्स की कमी, सांस लेने में दिक्कत और मल्टी ऑर्गन फेल्योर जैसे गंभीर लक्षण सामने आए, जिसके बाद उन्हें आईसीयू में भर्ती करना पड़ा।
मामले ने तब और गंभीर रूप ले लिया जब करीब 20 दिन तक वेंटिलेटर पर रहने के बाद एक प्रसूता प्रीति की मौत हो गई। इसके दो दिन बाद शारदा नायक नामक दूसरी महिला ने भी दम तोड़ दिया। इस तरह पीबीएम अस्पताल में इस प्रकरण से जुड़ी दो प्रसूताओं की मौत हो चुकी है, जबकि अन्य महिलाओं का इलाज लंबे समय तक चलता रहा।
घटनाओं के बाद स्वास्थ्य विभाग ने जांच शुरू कराई। ड्रग कंट्रोल विभाग ने अस्पताल से 31 दवाओं के नमूने जब्त कर उनकी जांच शुरू की। साथ ही ऑपरेशन थिएटर, आईसीयू, सर्जिकल उपकरणों और उपयोग में ली गई दवाओं की भी जांच कराई गई। हालांकि शुरुआती चरण में किसी एक दवा को सीधे तौर पर जिम्मेदार नहीं ठहराया गया लेकिन संदिग्ध दवाओं के बैचों के उपयोग पर रोक लगाई गई और नमूनों को परीक्षण के लिए भेजा गया।
जोधपुर: मौत नहीं, लेकिन एक साथ कई महिलाएं बीमार
कोटा और बीकानेर के बाद जोधपुर जिले के पावटा अस्पताल में भी प्रसव के बाद महिलाओं की तबीयत बिगड़ने का मामला सामने आया। 20 जून को अस्पताल में आठ महिलाओं की सिजेरियन डिलीवरी हुई थी। ऑपरेशन के कुछ घंटों बाद ही सभी महिलाओं में गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं दिखाई देने लगीं।
इनमें अत्यधिक रक्तस्राव, लो ब्लड प्रेशर, पेशाब कम होना, किडनी संक्रमण, सेप्टीसीमिया और मल्टी ऑर्गन प्रभावित होने जैसे लक्षण सामने आए। इनमें से दो महिलाओं की हालत बेहद गंभीर हो गई, जिन्हें डायलिसिस की जरूरत पड़ी और बाद में इन्हें एमडीएम अस्पताल तथा एम्स जोधपुर रैफर किया गया। अब तक इस मामले में किसी प्रसूता की मौत की पुष्टि नहीं हुई है, जबकि छह महिलाओं की हालत में सुधार बताया गया है।
घटना के बाद स्वास्थ्य विभाग ने एहतियातन बड़ा कदम उठाते हुए 25 दवाओं और इंजेक्शनों के उपयोग पर रोक लगा दी। जिन दवाओं, इंजेक्शनों, आईवी फ्लूड और अन्य उपभोग्य सामग्रियों का इस्तेमाल इन महिलाओं के उपचार और ऑपरेशन के दौरान किया गया था, उनके सभी नमूने जांच के लिए भेजे गए हैं। प्रारंभिक जांच में सोडियम लैक्टेट आईवी फ्लूड का एक बैच संदेह के घेरे में आया, जिसके उपयोग पर तत्काल रोक लगा दी गई। जब तक जांच रिपोर्ट नहीं आ जाती, संबंधित बैच और अन्य संदिग्ध दवाओं का इस्तेमाल बंद रखने के निर्देश दिए गए हैं।
नागौर-डीडवाना में मौत से बढ़ा विवाद
बीकानेर और जोधपुर के मामलों के बीच नागौर-डीडवाना क्षेत्र में भी प्रसूताओं की मौत ने बड़ा राजनीतिक और प्रशासनिक विवाद खड़ा कर दिया। डीडवाना-कुचामन जिले के बांगड़ अस्पताल में सिजेरियन डिलीवरी के बाद कई महिलाओं की तबीयत बिगड़ने के मामले सामने आए और इनमें से दो प्रसूताओं की मौत हो गई, जबकि अन्य महिलाओं का इलाज जयपुर और जोधपुर के उच्च चिकित्सा संस्थानों में कराया गया। मृतक महिलाओं के परिजनों ने इलाज में लापरवाही और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग को लेकर प्रदर्शन किया तथा 50 लाख रुपये मुआवजे और सरकारी नौकरी की मांग उठाई।
जांच के दौरान स्वास्थ्य विभाग, ड्रग कंट्रोल विभाग और मेडिकल विशेषज्ञों की टीमों ने अस्पताल में उपयोग की गई दवाओं, इंजेक्शनों, आईवी फ्लूड, सर्जिकल सामग्री और ऑपरेशन थिएटर से जुड़े नमूने लिए। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार नागौर-डीडवाना प्रकरण में करीब 25 दवाओं और चिकित्सा सामग्री के सैंपल जांच के लिए उठाए गए और संदिग्ध बैचों के उपयोग पर रोक लगाई गई।
ड्रग कंट्रोलर ने क्या कहा-
मामले में ड्रग कंट्रोलर अजय फाटक ने बताया कि टीम ने पीबीएम अस्पताल से कुल 27 प्रकार की दवाओं के सैंपल लिए हैं। इनमें ऑक्सीटोसिन, पेन किलर, आईवी फ्लूड्स तथा ऑपरेशन थिएटर में नियमित रूप से इस्तेमाल होने वाली अन्य महत्वपूर्ण दवाएं शामिल हैं। इन सभी सैंपलों को जांच के लिए जयपुर और कोलकाता स्थित प्रयोगशालाओं में भेजा गया है।
फाटक का कहना है कि जांच रिपोर्ट आने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा कि प्रसूताओं की किडनी फेल होने के पीछे दवाओं की कोई भूमिका है या नहीं। इससे पहले कोटा में प्रसूताओं की किडनी फेल होने के मामले में भी दवाओं की गुणवत्ता को लेकर जांच कराई गई थी। उस दौरान अस्पताल से 27 दवाओं के सैंपल लिए गए थे।
26 दवाएं सैम्पल में पास
अजय फाटक का कहना है कि कोटा से दवाओं के जो सैम्पल उठाए गए थे, उनकी जांच रिपोर्ट में खाद्य सुरक्षा एवं औषधि नियंत्रक आयुक्तालय ने 27 दवाओं के सैम्पल कोटा से उठाए गए थे, जिनमें 26 दवाएं गुणवत्ता मानकों के अनुरूप पाई गई थीं, जबकि ऑक्सीटोसिन का सैंपल निर्धारित मानकों पर खरा नहीं उतरने के कारण फेल पाया गया था।
ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन के सैंपल अमानक पाए जाने पर आयुक्तालय ने इस संबंध में अलर्ट नोटिस जारी करते हुए प्रदेशभर के अस्पतालों, मेडिकल स्टोर्स और दवा वितरकों को संबंधित बैच की बिक्री और उपयोग तत्काल रोकने के निर्देश दिए थे। लैब जांच में खुलासा हुआ था कि जो ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन बाजार में बेचा जा रहा था, उसमें ऑक्सीटोसिन तत्व ही मौजूद नहीं था। अब बीकानेर मामले में भी ऑक्सीटोसिन समेत अन्य दवाओं को विशेष रूप से जांच के दायरे में रखा गया है।
राजस्थान में मातृ मृत्यु दर की स्थिति
स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति पर नजर डालें तो सैंपल रजिस्ट्रेशन सर्वे (SRS) 2021-23 के अनुसार राजस्थान का मातृ मृत्यु अनुपात (MMR) 86 है। यह गुजरात (51) से अधिक, लेकिन हरियाणा (89), पंजाब (90), मध्य प्रदेश (142) और उत्तर प्रदेश (141) से कम है। यह आंकड़े बताते हैं कि राजस्थान ने मातृ मृत्यु दर में सुधार तो किया है, लेकिन सुरक्षित मातृत्व सुनिश्चित करने के लिए अभी भी स्वास्थ्य सेवाओं को और मजबूत करने की आवश्यकता है।
महिला स्वास्थ्य सेवाओं का नेटवर्क
राज्य में मातृ एवं महिला स्वास्थ्य सेवाओं के लिए कई प्रमुख सरकारी अस्पताल संचालित हैं। इनमें जयपुर का जनाना अस्पताल (महिला चिकित्सालय), जोधपुर का उम्मेद अस्पताल, बीकानेर के पीबीएम अस्पताल का महिला एवं प्रसूति विभाग, कोटा का जेके लोन एवं न्यू मेडिकल कॉलेज अस्पताल का प्रसूति विभाग, अजमेर का जवाहरलाल नेहरू अस्पताल, नागौर का बांगड़ अस्पताल तथा डीडवाना जिला अस्पताल का प्रसूति विंग प्रमुख हैं। इसके अलावा राज्य सरकार की स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत 9 महिला अस्पताल भी पंजीकृत हैं।
स्वास्थ्य बजट बढ़ा, लेकिन सवाल बरकरार
राजस्थान सरकार ने वित्तीय वर्ष 2026-27 में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के लिए 32,526 करोड़ रुपये का बजट प्रावधान किया है। यह वित्तीय वर्ष 2025-26 के संशोधित अनुमान 30,168 करोड़ रुपये की तुलना में करीब 8 प्रतिशत अधिक है। हालांकि हाल के महीनों में प्रसूताओं की मौत और संक्रमण के लगातार सामने आए मामलों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि बजट में वृद्धि के बावजूद जमीनी स्तर पर स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता, दवा आपूर्ति की निगरानी और अस्पतालों की जवाबदेही को और मजबूत बनाने की आवश्यकता है।
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राजस्थान में प्रसूताओं की अब तक हुई मौतों की घटनाओं में कुछ समानताएं दिखाई देती हैं, जैसे कोटा, बीकानेर, जोधपुर, नागौर और कुचामन में हुई प्रसूताओं की मौतों में सभी प्रसूताओं की तबीयत सिजेरियन डिलीवरी के बाद अचानक ही बिगड़ी। इन सभी अस्पतालों में आईसीयू संक्रमण और दवा पर शक के मामले भी सामने आए। यहां से दवा बैचों के सैंपल उठाए गए और उन पर रोक भी लगाई गई।
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सबसे बड़ी बात यह है कि लगभग सभी मामलों में कमेटियां बनाई गईं और अब तक किसी भी कमेटी की तरफ से रिपोर्ट सामने नहीं आई है कि ये मौतें आखिर हुईं कैसे? हालांकि अस्पताल प्रशासन और सरकार हर घटना को अलग-अलग कारणों से जोड़कर देख रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ जिन अस्पतालों में ये घटनाएं हुईं, वहां इस्तेमाल हो रही कुछ दवाओं के बैचों पर रोक लगाए जाने से संदेह और गहरा गया है।
कोटा में मौतों से शुरू हुआ विवाद
राजस्थान में प्रसूताओं की मौतों का विवाद की शुरुआत सबसे पहले कोटा से हुई। मई 2026 में कोटा के न्यू मेडिकल कॉलेज अस्पताल और जेके लोन अस्पताल में सिजेरियन डिलीवरी के बाद कई प्रसूताओं की तबीयत अचानक बिगड़ गई। शुरुआती जांच में संक्रमण और किडनी संबंधी जटिलताओं की आशंका जताई गई।
सबसे पहले न्यू मेडिकल कॉलेज अस्पताल में एक प्रसूता की मौत हुई और पांच अन्य गंभीर हालत में भर्ती हुईं। कुछ ही दिनों में जेके लोन अस्पताल में भी इसी तरह के मामले सामने आए। एक सप्ताह के भीतर दोनों अस्पतालों में प्रसव के बाद जटिलताओं से चार प्रसूताओं की मौत हो गई, जबकि कई अन्य महिलाओं को आईसीयू और वेंटिलेटर पर रखना पड़ा।
बीकानेर: एक जैसे लक्षणों ने बढ़ाई चिंता
कोटा में प्रसूताओं की मौतों के बाद बीकानेर के पीबीएम अस्पताल में सामने आए मामलों ने पूरे प्रदेश में मातृ स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर नई चिंता पैदा कर दी। जून की शुरुआत में अस्पताल में सिजेरियन और सामान्य प्रसव के बाद छह महिलाओं की तबीयत अचानक बिगड़ गई। इनमें कई महिलाओं में किडनी संक्रमण, अत्यधिक रक्तस्राव, प्लेटलेट्स की कमी, सांस लेने में दिक्कत और मल्टी ऑर्गन फेल्योर जैसे गंभीर लक्षण सामने आए, जिसके बाद उन्हें आईसीयू में भर्ती करना पड़ा।
मामले ने तब और गंभीर रूप ले लिया जब करीब 20 दिन तक वेंटिलेटर पर रहने के बाद एक प्रसूता प्रीति की मौत हो गई। इसके दो दिन बाद शारदा नायक नामक दूसरी महिला ने भी दम तोड़ दिया। इस तरह पीबीएम अस्पताल में इस प्रकरण से जुड़ी दो प्रसूताओं की मौत हो चुकी है, जबकि अन्य महिलाओं का इलाज लंबे समय तक चलता रहा।
घटनाओं के बाद स्वास्थ्य विभाग ने जांच शुरू कराई। ड्रग कंट्रोल विभाग ने अस्पताल से 31 दवाओं के नमूने जब्त कर उनकी जांच शुरू की। साथ ही ऑपरेशन थिएटर, आईसीयू, सर्जिकल उपकरणों और उपयोग में ली गई दवाओं की भी जांच कराई गई। हालांकि शुरुआती चरण में किसी एक दवा को सीधे तौर पर जिम्मेदार नहीं ठहराया गया लेकिन संदिग्ध दवाओं के बैचों के उपयोग पर रोक लगाई गई और नमूनों को परीक्षण के लिए भेजा गया।
जोधपुर: मौत नहीं, लेकिन एक साथ कई महिलाएं बीमार
कोटा और बीकानेर के बाद जोधपुर जिले के पावटा अस्पताल में भी प्रसव के बाद महिलाओं की तबीयत बिगड़ने का मामला सामने आया। 20 जून को अस्पताल में आठ महिलाओं की सिजेरियन डिलीवरी हुई थी। ऑपरेशन के कुछ घंटों बाद ही सभी महिलाओं में गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं दिखाई देने लगीं।
इनमें अत्यधिक रक्तस्राव, लो ब्लड प्रेशर, पेशाब कम होना, किडनी संक्रमण, सेप्टीसीमिया और मल्टी ऑर्गन प्रभावित होने जैसे लक्षण सामने आए। इनमें से दो महिलाओं की हालत बेहद गंभीर हो गई, जिन्हें डायलिसिस की जरूरत पड़ी और बाद में इन्हें एमडीएम अस्पताल तथा एम्स जोधपुर रैफर किया गया। अब तक इस मामले में किसी प्रसूता की मौत की पुष्टि नहीं हुई है, जबकि छह महिलाओं की हालत में सुधार बताया गया है।
घटना के बाद स्वास्थ्य विभाग ने एहतियातन बड़ा कदम उठाते हुए 25 दवाओं और इंजेक्शनों के उपयोग पर रोक लगा दी। जिन दवाओं, इंजेक्शनों, आईवी फ्लूड और अन्य उपभोग्य सामग्रियों का इस्तेमाल इन महिलाओं के उपचार और ऑपरेशन के दौरान किया गया था, उनके सभी नमूने जांच के लिए भेजे गए हैं। प्रारंभिक जांच में सोडियम लैक्टेट आईवी फ्लूड का एक बैच संदेह के घेरे में आया, जिसके उपयोग पर तत्काल रोक लगा दी गई। जब तक जांच रिपोर्ट नहीं आ जाती, संबंधित बैच और अन्य संदिग्ध दवाओं का इस्तेमाल बंद रखने के निर्देश दिए गए हैं।
नागौर-डीडवाना में मौत से बढ़ा विवाद
बीकानेर और जोधपुर के मामलों के बीच नागौर-डीडवाना क्षेत्र में भी प्रसूताओं की मौत ने बड़ा राजनीतिक और प्रशासनिक विवाद खड़ा कर दिया। डीडवाना-कुचामन जिले के बांगड़ अस्पताल में सिजेरियन डिलीवरी के बाद कई महिलाओं की तबीयत बिगड़ने के मामले सामने आए और इनमें से दो प्रसूताओं की मौत हो गई, जबकि अन्य महिलाओं का इलाज जयपुर और जोधपुर के उच्च चिकित्सा संस्थानों में कराया गया। मृतक महिलाओं के परिजनों ने इलाज में लापरवाही और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग को लेकर प्रदर्शन किया तथा 50 लाख रुपये मुआवजे और सरकारी नौकरी की मांग उठाई।
जांच के दौरान स्वास्थ्य विभाग, ड्रग कंट्रोल विभाग और मेडिकल विशेषज्ञों की टीमों ने अस्पताल में उपयोग की गई दवाओं, इंजेक्शनों, आईवी फ्लूड, सर्जिकल सामग्री और ऑपरेशन थिएटर से जुड़े नमूने लिए। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार नागौर-डीडवाना प्रकरण में करीब 25 दवाओं और चिकित्सा सामग्री के सैंपल जांच के लिए उठाए गए और संदिग्ध बैचों के उपयोग पर रोक लगाई गई।
ड्रग कंट्रोलर ने क्या कहा-
मामले में ड्रग कंट्रोलर अजय फाटक ने बताया कि टीम ने पीबीएम अस्पताल से कुल 27 प्रकार की दवाओं के सैंपल लिए हैं। इनमें ऑक्सीटोसिन, पेन किलर, आईवी फ्लूड्स तथा ऑपरेशन थिएटर में नियमित रूप से इस्तेमाल होने वाली अन्य महत्वपूर्ण दवाएं शामिल हैं। इन सभी सैंपलों को जांच के लिए जयपुर और कोलकाता स्थित प्रयोगशालाओं में भेजा गया है।
फाटक का कहना है कि जांच रिपोर्ट आने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा कि प्रसूताओं की किडनी फेल होने के पीछे दवाओं की कोई भूमिका है या नहीं। इससे पहले कोटा में प्रसूताओं की किडनी फेल होने के मामले में भी दवाओं की गुणवत्ता को लेकर जांच कराई गई थी। उस दौरान अस्पताल से 27 दवाओं के सैंपल लिए गए थे।
26 दवाएं सैम्पल में पास
अजय फाटक का कहना है कि कोटा से दवाओं के जो सैम्पल उठाए गए थे, उनकी जांच रिपोर्ट में खाद्य सुरक्षा एवं औषधि नियंत्रक आयुक्तालय ने 27 दवाओं के सैम्पल कोटा से उठाए गए थे, जिनमें 26 दवाएं गुणवत्ता मानकों के अनुरूप पाई गई थीं, जबकि ऑक्सीटोसिन का सैंपल निर्धारित मानकों पर खरा नहीं उतरने के कारण फेल पाया गया था।
ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन के सैंपल अमानक पाए जाने पर आयुक्तालय ने इस संबंध में अलर्ट नोटिस जारी करते हुए प्रदेशभर के अस्पतालों, मेडिकल स्टोर्स और दवा वितरकों को संबंधित बैच की बिक्री और उपयोग तत्काल रोकने के निर्देश दिए थे। लैब जांच में खुलासा हुआ था कि जो ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन बाजार में बेचा जा रहा था, उसमें ऑक्सीटोसिन तत्व ही मौजूद नहीं था। अब बीकानेर मामले में भी ऑक्सीटोसिन समेत अन्य दवाओं को विशेष रूप से जांच के दायरे में रखा गया है।
राजस्थान में मातृ मृत्यु दर की स्थिति
स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति पर नजर डालें तो सैंपल रजिस्ट्रेशन सर्वे (SRS) 2021-23 के अनुसार राजस्थान का मातृ मृत्यु अनुपात (MMR) 86 है। यह गुजरात (51) से अधिक, लेकिन हरियाणा (89), पंजाब (90), मध्य प्रदेश (142) और उत्तर प्रदेश (141) से कम है। यह आंकड़े बताते हैं कि राजस्थान ने मातृ मृत्यु दर में सुधार तो किया है, लेकिन सुरक्षित मातृत्व सुनिश्चित करने के लिए अभी भी स्वास्थ्य सेवाओं को और मजबूत करने की आवश्यकता है।
महिला स्वास्थ्य सेवाओं का नेटवर्क
राज्य में मातृ एवं महिला स्वास्थ्य सेवाओं के लिए कई प्रमुख सरकारी अस्पताल संचालित हैं। इनमें जयपुर का जनाना अस्पताल (महिला चिकित्सालय), जोधपुर का उम्मेद अस्पताल, बीकानेर के पीबीएम अस्पताल का महिला एवं प्रसूति विभाग, कोटा का जेके लोन एवं न्यू मेडिकल कॉलेज अस्पताल का प्रसूति विभाग, अजमेर का जवाहरलाल नेहरू अस्पताल, नागौर का बांगड़ अस्पताल तथा डीडवाना जिला अस्पताल का प्रसूति विंग प्रमुख हैं। इसके अलावा राज्य सरकार की स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत 9 महिला अस्पताल भी पंजीकृत हैं।
स्वास्थ्य बजट बढ़ा, लेकिन सवाल बरकरार
राजस्थान सरकार ने वित्तीय वर्ष 2026-27 में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के लिए 32,526 करोड़ रुपये का बजट प्रावधान किया है। यह वित्तीय वर्ष 2025-26 के संशोधित अनुमान 30,168 करोड़ रुपये की तुलना में करीब 8 प्रतिशत अधिक है। हालांकि हाल के महीनों में प्रसूताओं की मौत और संक्रमण के लगातार सामने आए मामलों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि बजट में वृद्धि के बावजूद जमीनी स्तर पर स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता, दवा आपूर्ति की निगरानी और अस्पतालों की जवाबदेही को और मजबूत बनाने की आवश्यकता है।