Rajasthan News: देवस्थान के मंदिरों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव, फाइलों में अटके फंड
राजस्थान में मंदिरों और तीर्थस्थलों के विकास पर सरकारी रिपोर्ट ने चौंकाने वाले तथ्य उजागर किए हैं। 106.76 करोड़ रुपये स्वीकृत होने के बावजूद केवल 56% राशि जारी हुई। नतीजतन 29% परियोजनाएं शुरू ही नहीं हो सकीं और कई मंदिर बुनियादी सुविधाओं के अभाव से जूझ रहे हैं।
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विस्तार
राज्य योजना विभाग के मूल्यांकन संगठन द्वारा तैयार रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2018-19 से 2023-24 के बीच देवस्थान विभाग के अधीन मंदिरों और तीर्थस्थलों के विकास के लिए 111 परियोजनाएं स्वीकृत की गईं। इन पर 106.76 करोड़ रुपये का बजट मंजूर हुआ, लेकिन कार्यकारी एजेंसियों को केवल 59.80 करोड़ रुपये (56 प्रतिशत) ही जारी किए गए। इनमें से भी करीब 42.79 करोड़ रुपये खर्च हो सके।
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हर तीसरा प्रोजेक्ट अटका
रिपोर्ट का सबसे बड़ा निष्कर्ष यह है कि स्वीकृत 111 परियोजनाओं में से 32 परियोजनाएं (करीब 29 प्रतिशत) मार्च 2024 तक शुरू ही नहीं हो सकीं। केवल 62 कार्य पूरे हुए, जबकि 16 परियोजनाएं अब भी प्रगति पर हैं। इससे साफ है कि बजट स्वीकृति और जमीन पर काम शुरू होने के बीच बड़ा अंतर बना रहा।
मंदिरों में हालात चिंताजनक
अध्ययन के लिए चयनित 23 मंदिरों और तीर्थस्थलों में कई जगह गंभीर कमियां सामने आईं। कई प्राचीन मंदिरों के गर्भगृहों की छतें जर्जर मिलीं, चूना-प्लास्टर झड़ता पाया गया और श्रद्धालुओं के लिए सुरक्षा व्यवस्था अपर्याप्त रही।
प्रमुख धार्मिक स्थलों पीने का पानी भी नहीं
रिपोर्ट के अनुसार प्रमुख मंदिरों और तीर्थ स्थलों पर स्वच्छ पेयजल और शौचालयों की कमी है। त्योहारी सीजन में इन मंदिरों पर भारी भीड़ जुटती है लेकिन मंदिरों में पार्किंग और भीड़ प्रबंधन की व्यवस्था पर्याप्त नहीं है। मंदिर प्रांगण में सूचना पट्टों का अभाव है। सफाई कर्मचारियों की कमी के कारण गंदगी की समस्या बनी रहती है।
त्योहारों और मेलों के दौरान हादसों की आशंका बढ़ जाती है।
तकनीकी स्टाफ की कमी बनी बड़ी बाधा
रिपोर्ट में देवस्थान विभाग की प्रशासनिक और तकनीकी कमजोरियों को भी प्रमुख कारण बताया गया है। विभाग में अधिशासी और अधीक्षण अभियंता स्तर के कई पद स्वीकृत ही नहीं हैं। तकनीकी स्टाफ की कमी के कारण निर्माण कार्यों की गुणवत्ता जांच, नियमित निरीक्षण और मॉनिटरिंग प्रभावित होती है।
रिपोर्ट के मुताबिक समय पर निरीक्षण नहीं होने से कई निर्माण कार्य कुछ वर्षों में ही खराब होने लगते हैं, जिससे दोबारा मरम्मत पर अतिरिक्त खर्च करना पड़ता है।
विकास कार्यों की स्वीकृति, बजट जारी करने, भूमि विवाद, अतिक्रमण और विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय की कमी भी परियोजनाओं के अटकने की बड़ी वजह बनी। रिपोर्ट में कहा गया है कि देवस्थान विभाग, पीडब्ल्यूडी, आरएसआरडीसी और अन्य कार्यकारी एजेंसियों के बीच सूचना साझा करने की व्यवस्था प्रभावी नहीं है, जिससे कई परियोजनाएं फाइलों में उलझ जाती हैं।
प्रचार-प्रसार में भी पिछड़े धार्मिक स्थल
रिपोर्ट के अनुसार सोशल मीडिया और डिजिटल प्रचार के दौर में भी देवस्थान विभाग के अधीन आने वाले कई प्रमुख मंदिरों और तीर्थस्थलों का पर्याप्त प्रचार-प्रसार नहीं हो रहा। इससे धार्मिक पर्यटन की संभावनाएं भी प्रभावित हो रही हैं।
देवस्थान विभाग के अधीन मंदिर एवं संपदाओं की स्थिति
देवस्थान विभाग के रिकॉर्ड के अनुसार प्रदेश में कुल 59,413 मंदिर पंजीकृत हैं। इनमें 390 राजकीय प्रत्यक्ष प्रभार श्रेणी, 203 राजकीय आत्मनिर्भर श्रेणी, 343 राजकीय सुपुर्दगी श्रेणी, 10,009 राजकीय सहायता प्राप्त श्रेणी तथा 48,466 वार्षिकी (एन्यूइटी) प्राप्त मंदिर शामिल हैं। इसके अलावा मंदिर मंडल अधिनियम के अंतर्गत 2 मंदिर आते हैं। कुल मंदिरों में से 59,260 मंदिर विभागीय नियंत्रण में हैं, जबकि 153 मंदिर ऐसे हैं जो नियंत्रण से बाहर या अन्य श्रेणियों में दर्ज हैं।
देवस्थान विभाग के पास 2,326 किराये योग्य संपदाएं और भवन भी हैं। इनमें 633 आवासीय भवन, 1,651 व्यावसायिक भवन और 42 अन्य संपदाएं शामिल हैं। इनमें से 2,135 संपदाएं विभागीय नियंत्रण में हैं, जबकि 191 संपदाएं नियंत्रण से बाहर या विवादित स्थिति में हैं। विभाग के अधीन 17 धर्मशालाएं भी पंजीकृत हैं, जिनमें से 11 विभागीय नियंत्रण में हैं और 6 अन्य श्रेणी में दर्ज हैं। इसके अलावा प्रदेश में 13,498 पंजीकृत धार्मिक प्रन्यास (ट्रस्ट) भी हैं, जिनका पंजीकरण देवस्थान विभाग के रिकॉर्ड में दर्ज है।