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Rare Caracals Spotted: भारत-पाक सीमा पर दिखे दुर्लभ कैराकल, जैसलमेर बना नए संरक्षण की उम्मीदों का केंद्र

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जैसलमेर Published by: जैसलमेर ब्यूरो Updated Wed, 25 Mar 2026 04:21 PM IST
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सार

Jaisalmer News: जैसलमेर में भारत-पाक सीमा के पास दुर्लभ कैराकल की मौजूदगी दर्ज हुई है। वन विभाग और Wildlife Institute of India की निगरानी में तीन कैराकल कैमरा ट्रैप में कैद हुए। एक को रेडियो कॉलर लगाया गया है, जिससे इसके ठिकाने और गतिविधियों पर नजर रखी जा रही है।

Rajasthan News: Rare Caracals Spotted at India-Pakistan Border Jaisalmer Becomes Hub of New Conservation Hopes
कैमरा ट्रैप में कैद हुआ दुर्लभ कैराकल (ब्लैक एंड व्हाइट), अन्य फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

राजस्थान के पश्चिमी छोर पर स्थित भारत-पाकिस्तान सीमा से सटे शुष्क मरुस्थलीय इलाकों में एक बेहद अहम वन्यजीव खोज सामने आई है। विलुप्ति की कगार पर पहुंच चुके दुर्लभ वन्य जीव कैराकल की मौजूदगी ने वन विभाग और वैज्ञानिकों में नई उम्मीद जगा दी है। जैसलमेर के सीमावर्ती क्षेत्र में इस प्रजाति की लगातार गतिविधियों के प्रमाण मिलने से यह इलाका अब संरक्षण के लिहाज से बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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मरुस्थलीय घासभूमि में मिला अनुकूल आवास
विशेषज्ञों के अनुसार, जैसलमेर का यह पूरा क्षेत्र शुष्क मरुस्थलीय घासभूमि (डेजर्ट ग्रासलैंड) का हिस्सा है, जो कैराकल के प्राकृतिक आवास के लिए अत्यंत उपयुक्त माना जाता है। यहां खुले मैदान, कम वनस्पति और छोटे शिकार जीवों की उपलब्धता इस प्रजाति के लिए आदर्श परिस्थितियां बनाती हैं।
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वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि लंबे समय से यह प्रजाति मानव गतिविधियों और आवास खत्म होने के कारण नजर नहीं आ रही थी, लेकिन अब इसके फिर से दिखने से संकेत मिलते हैं कि यह क्षेत्र उनके लिए सुरक्षित ठिकाना बन सकता है।

निगरानी के लिए हाईटेक इंतजाम
इस दुर्लभ जीव की मौजूदगी की पुष्टि के बाद वन विभाग और Wildlife Institute of India ने मिलकर संरक्षण प्रयासों को तेज कर दिया है। क्षेत्र में कुल 9 मोशन सेंसिंग कैमरा ट्रैप लगाए गए हैं, जो दिन-रात गतिविधियों पर नजर रख रहे हैं। इन कैमरों से मिले फुटेज ने कई अहम जानकारियां सामने रखी हैं, जिनमें कैराकल की आवाजाही, उसके शिकार के तरीके और रहने के पैटर्न को समझने में मदद मिल रही है।

रेडियो कॉलर से हो रही ट्रैकिंग
वन विभाग ने दो महीने पहले एक नर कैराकल को पकड़कर उसे रेडियो कॉलर लगाया और फिर सुरक्षित तरीके से जंगल में छोड़ दिया। इसके बाद उसकी हर मूवमेंट को ट्रैक किया जा रहा है। रेडियो कॉलर से प्राप्त डेटा के अनुसार, यह कैराकल भारत-पाकिस्तान सीमा से लगे विस्तृत क्षेत्र में विचरण कर रहा है। इससे यह भी स्पष्ट हुआ है कि इस प्रजाति का आवास सीमाओं से परे फैला हुआ है, जो संरक्षण के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग की जरूरत को भी दर्शाता है।

पढ़ें- Caracal Study Rajasthan: रेगिस्तान का ‘छोटा चीता’ कैमरे में कैद, कैरेकल पर बड़ा खुलासा!

तीन कैराकल की पुष्टि, बढ़ी उम्मीद
अब तक मिले कैमरा ट्रैप फुटेज में रेडियो कॉलर लगे कैराकल के अलावा एक अन्य नर और एक मादा कैराकल की मौजूदगी दर्ज की गई है। इस तरह क्षेत्र में कुल तीन कैराकल के होने की पुष्टि हो चुकी है।

इसके अलावा एक गुफा में दो नर कैराकल के एक साथ रहने के संकेत भी मिले हैं, जो इस प्रजाति के व्यवहार को समझने के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। आमतौर पर कैराकल एकाकी जीवन जीते हैं, ऐसे में यह व्यवहार शोध का विषय बन गया है।

Rajasthan News: Rare Caracals Spotted at India-Pakistan Border Jaisalmer Becomes Hub of New Conservation Hopes
इससे पहले बीकानेर में दिखी कैराकल कैट - फोटो : अमर उजाला

फूड चेन की भी हो रही पहचान
निगरानी के दौरान वैज्ञानिकों ने कैराकल की फूड चेन को भी आंशिक रूप से पहचान लिया है। यह जीव मुख्यतः छोटे स्तनधारियों, पक्षियों और सरीसृपों का शिकार करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि क्षेत्र में शिकार की पर्याप्त उपलब्धता इस प्रजाति के टिके रहने का एक बड़ा कारण हो सकती है।

संरक्षण के लिए बढ़ी सक्रियता
वन विभाग की टीमें लगातार क्षेत्र में गश्त कर रही हैं और कैराकल की गतिविधियों पर नजर बनाए हुए हैं। साथ ही स्थानीय लोगों को भी इस दुर्लभ जीव के महत्व के बारे में जागरूक किया जा रहा है, ताकि किसी प्रकार का खतरा न उत्पन्न हो।

पढ़ें- Jaisalmer News: सीमावर्ती इलाके में दुर्लभ कैराकल का शव मिलने से सनसनी, वन्यजीव संरक्षण पर उठे गंभीर सवाल

वन अधिकारियों के अनुसार, यदि इसी तरह निगरानी और संरक्षण प्रयास जारी रहे तो भविष्य में जैसलमेर क्षेत्र कैराकल के लिए एक सुरक्षित और स्थायी आवास के रूप में विकसित हो सकता है।

जैसलमेर के सीमावर्ती मरुस्थलीय इलाके में कैराकल की मौजूदगी न केवल एक दुर्लभ खोज है, बल्कि यह भारत में वन्यजीव संरक्षण की दिशा में एक सकारात्मक संकेत भी है। अब जरूरत है निरंतर निगरानी, वैज्ञानिक शोध और स्थानीय सहयोग की, ताकि इस खूबसूरत और दुर्लभ प्रजाति को विलुप्त होने से बचाया जा सके।

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