छात्रसंघ चुनाव: 57 साल की विरासत पर चार साल का ब्रेक, क्या खत्म हो रही है राजस्थान की सबसे बड़ी लीडरशिप लैब?
Student Union Election: राजस्थान में 2022 के बाद से छात्रसंघ चुनाव नहीं हुए हैं। सरकार ने हाईकोर्ट में राष्ट्रीय शिक्षा नीति और शैक्षणिक कैलेंडर का हवाला देकर चुनाव टालने की बात कही है। इससे राजनीति को नया नेतृत्व देने वाली छात्र राजनीति के भविष्य पर सवाल खड़े हो गए हैं।
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राजस्थान की राजनीति में जब भी नए नेतृत्व की चर्चा होती है, सबसे पहले छात्रसंघ चुनावों का जिक्र आता है। यही वह मंच रहा है, जहां से निकले कई युवा आगे चलकर मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री, सांसद और विधायक बने। लेकिन पिछले चार वर्षों से यह मंच खामोश है। वर्ष 2022 के बाद प्रदेश में छात्रसंघ चुनाव नहीं हुए हैं। अब राजस्थान हाईकोर्ट में राज्य सरकार ने भी स्पष्ट कर दिया है कि मौजूदा शैक्षणिक सत्र में चुनाव कराना व्यावहारिक नहीं है। सरकार ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP), विश्वविद्यालयों के शैक्षणिक कैलेंडर और कुलपतियों की राय का हवाला देते हुए चुनाव टालने की दलील दी है। ऐसे में राजनीतिक गलियारों में यह सवाल तेज हो गया है कि क्या प्रदेश की राजनीति को जमीनी नेतृत्व देने वाली सबसे बड़ी नर्सरी धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है?
राजस्थान में छात्र राजनीति का औपचारिक अध्याय वर्ष 1967 में राजस्थान विश्वविद्यालय छात्रसंघ (RUSU) चुनावों से शुरू हुआ। इसके बाद जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय, मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय, महार्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय, कोटा विश्वविद्यालय, महाराजा गंगासिंह विश्वविद्यालय समेत प्रदेश के अधिकांश विश्वविद्यालयों और सरकारी कॉलेजों में नियमित रूप से छात्रसंघ चुनाव होने लगे। शुरुआत छात्र हितों के मुद्दों से हुई, लेकिन समय के साथ यह मंच प्रदेश की राजनीति की पहली प्रयोगशाला बन गया। एबीवीपी, एनएसयूआई और अन्य छात्र संगठनों के बीच मुकाबले ने इन चुनावों को सीधे राजनीतिक दलों से जुड़े चुनावों का स्वरूप दे दिया।
यहीं से निकले राजस्थान की राजनीति के बड़े चेहरे
पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के प्रमुख हनुमान बेनीवाल, वरिष्ठ भाजपा नेता राजेंद्र राठौड़, राजपाल सिंह शेखावत, रघु शर्मा, अशोक लाहौटी, महेंद्र चौधरी और विधायक रविंद्र सिंह भाटी जैसे कई नेताओं की राजनीतिक यात्रा छात्र राजनीति से शुरू हुई। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि छात्रसंघ चुनाव युवाओं को संगठन निर्माण, जनसंपर्क, चुनाव प्रबंधन, भाषण कला और जननेतृत्व का ऐसा व्यावहारिक अनुभव देते हैं, जो किसी राजनीतिक प्रशिक्षण संस्थान में संभव नहीं है। यही कारण है कि इन्हें विधानसभा और लोकसभा की राजनीति की पहली सीढ़ी माना जाता रहा है।
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चार साल से थमी नेतृत्व तैयार करने की प्रक्रिया
राजस्थान विश्वविद्यालय में आखिरी छात्रसंघ चुनाव वर्ष 2022 में हुए थे। इनमें निर्दलीय उम्मीदवार निर्मल चौधरी अध्यक्ष चुने गए थे। उन्होंने एनएसयूआई की बागी प्रत्याशी निहारिका जोरवाल को 1,400 से अधिक मतों से हराया था। यह लगातार पांचवीं बार था, जब राजस्थान विश्वविद्यालय में किसी निर्दलीय उम्मीदवार ने अध्यक्ष पद पर जीत दर्ज की। इसके बाद 2023, 2024, 2025 और अब 2026 में भी छात्रसंघ चुनाव नहीं हो सके। वर्ष 2023 में तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने विधानसभा चुनाव और राष्ट्रीय शिक्षा नीति का हवाला देते हुए छात्रसंघ चुनाव नहीं कराए। इसके बाद सत्ता परिवर्तन हुआ, लेकिन नई सरकार भी अब तक चुनाव कराने का फैसला नहीं ले सकी।
घोषणा पत्र में वादा, लेकिन अब तक फैसला नहीं
विधानसभा चुनाव 2023 के दौरान भाजपा ने अपने घोषणा पत्र में छात्रसंघ चुनाव कराने का वादा किया था। हालांकि सरकार बनने के बाद यह वादा अब तक पूरा नहीं हो सका। वर्ष 2025 में राज्य सरकार ने राजस्थान हाईकोर्ट में दाखिल हलफनामे में राष्ट्रीय शिक्षा नीति का हवाला देते हुए कहा कि शैक्षणिक सत्र शुरू होने के आठ सप्ताह के भीतर चुनाव कराना आवश्यक है। वहीं वर्ष 2026 में जुलाई से नया शैक्षणिक सत्र शुरू हो चुका है, लेकिन सरकार ने अब तक छात्रसंघ चुनाव कराने को लेकर कोई औपचारिक निर्णय नहीं लिया है। ऐसे में छात्र संगठनों और राजनीतिक हलकों में यह बहस तेज है कि क्या राजस्थान की राजनीति की सबसे बड़ी नेतृत्व तैयार करने वाली प्रयोगशाला अब इतिहास बनती जा रही है।