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Mahashivratri: संत के सपने ने खोला था राज, मिट्टी के टीले के नीचे दबा था 11वीं शताब्दी का शिव मंदिर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सिरोही
Published by: सिरोही ब्यूरो
Updated Sun, 15 Feb 2026 07:20 AM IST
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सार
Mahashivratri: सिरोही जिले के भैंससिंह गांव स्थित अतिप्राचीन शिव मंदिर का इतिहास परमारकालीन चंद्रावती नगरी से जुड़ा माना जाता है। इस मंदिर में मौजूद एक ऐसी बावड़ी है जिसका पानी कभी खत्म नहीं हुआ।
1000 साल पुराना मंदिर
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर हम आपको सिरोही जिले के आबूरोड उपखंड के भैंससिंह गांव स्थित एक अतिप्राचीन शिव मंदिर के बारे में बता रहे हैं। करीब पांच दशक पहले करवाई गई खुदाई में यह मंदिर अपने वर्तमान स्वरूप में बाहर आया था। इससे पहले यह मंदिर मिट्टी के टीले के नीचे दबा हुआ था। मंदिर परिसर में एक प्राचीन बावड़ी भी है, जिसमें आज तक कभी पानी नहीं सूखा।
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खुदाई में सामने आया मंदिर
आबूरोड-पालनपुर फोरलेन से लगभग तीन किलोमीटर दूर स्थित इस मंदिर तक निजी वाहन या ऑटो से पहुंचा जा सकता है। वर्ष 1975 में संत मंगलदास महाराज को स्वप्न में यहां प्राचीन शिवलिंग और मंदिर दबे होने का संकेत मिला। इसके बाद ग्रामीणों के सहयोग से खुदाई शुरू करवाई गई। खुदाई में मंदिर, प्राचीन बावड़ी और कई मूर्तियां सामने आईं। करीब दस वर्ष बाद, 1985 में महंत ओंकारदास महाराज के मार्गदर्शन में मंदिर का जीर्णोद्धार किया गया। पुराने स्तंभों और शिलाखंडों को जोड़कर मंदिर को पुनर्स्थापित किया गया।
कभी नहीं सूखी बावड़ी
मंदिर के गर्भगृह के सामने स्थित प्राचीन बावड़ी विशेष आकर्षण का केंद्र है। बताया जाता है कि आबूरोड क्षेत्र में कई बार अल्पवृष्टि के कारण जल संकट उत्पन्न हुआ, लेकिन इस बावड़ी का जलस्तर कभी नहीं घटा। बावड़ी में नीचे तक जाने के लिए सीढ़ियां बनी हुई हैं। सुरक्षा की दृष्टि से इसके चारों ओर लोहे की जालियां और गेट लगाए गए हैं।
आबूरोड-पालनपुर फोरलेन से लगभग तीन किलोमीटर दूर स्थित इस मंदिर तक निजी वाहन या ऑटो से पहुंचा जा सकता है। वर्ष 1975 में संत मंगलदास महाराज को स्वप्न में यहां प्राचीन शिवलिंग और मंदिर दबे होने का संकेत मिला। इसके बाद ग्रामीणों के सहयोग से खुदाई शुरू करवाई गई। खुदाई में मंदिर, प्राचीन बावड़ी और कई मूर्तियां सामने आईं। करीब दस वर्ष बाद, 1985 में महंत ओंकारदास महाराज के मार्गदर्शन में मंदिर का जीर्णोद्धार किया गया। पुराने स्तंभों और शिलाखंडों को जोड़कर मंदिर को पुनर्स्थापित किया गया।
कभी नहीं सूखी बावड़ी
मंदिर के गर्भगृह के सामने स्थित प्राचीन बावड़ी विशेष आकर्षण का केंद्र है। बताया जाता है कि आबूरोड क्षेत्र में कई बार अल्पवृष्टि के कारण जल संकट उत्पन्न हुआ, लेकिन इस बावड़ी का जलस्तर कभी नहीं घटा। बावड़ी में नीचे तक जाने के लिए सीढ़ियां बनी हुई हैं। सुरक्षा की दृष्टि से इसके चारों ओर लोहे की जालियां और गेट लगाए गए हैं।
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परिसर में अन्य मंदिर और धार्मिक स्थल
मंदिर परिसर में खुदाई में प्राप्त कई छोटे-छोटे मंदिर भी स्थापित हैं। यहां एक गौशाला का संचालन भी किया जा रहा है। समीप की पहाड़ी पर भगवान सूर्य की प्राचीन प्रतिमा तथा 11,111 शिवलिंग स्थापित हैं। श्रावण मास और महाशिवरात्रि पर यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है और वातावरण मेले जैसा हो जाता है।
1000 साल पुराना मंदिर
मंदिर का इतिहास परमारकालीन चंद्रावती नगरी से जुड़ा माना जाता है। 11वीं-12वीं शताब्दी में यहां परमार राजाओं की राजधानी थी। इस वंश के यशोधवल और धारावर्ष प्रतापी शासक रहे। चंद्रावती में शैव, वैष्णव और जैन मंदिरों के साथ भव्य राजप्रासादों का निर्माण हुआ था। वर्ष 1303 ईस्वी तक यह क्षेत्र परमारों के अधीन रहा, बाद में देवड़ा और चौहानों का शासन स्थापित हुआ। वर्ष 1405 में सिरोही राज्य की स्थापना तक यह स्थल देवड़ा चौहानों की राजधानी रहा। दिल्ली-गुजरात मार्ग पर स्थित होने के कारण समृद्ध चंद्रावती नगरी पर कई बार आक्रमण हुए, जिनमें अनेक मंदिर क्षतिग्रस्त हो गए। यहां प्राप्त शिल्पखंडों को चंद्रावती संग्रहालय में संरक्षित किया गया है। 1822 ईस्वी में ब्रिटिश इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड ने अपनी पुस्तक Annals and Antiquities of Rajasthan में यहां की स्थापत्य शैली और भव्यता का विस्तृत वर्णन किया है।
मंदिर परिसर में खुदाई में प्राप्त कई छोटे-छोटे मंदिर भी स्थापित हैं। यहां एक गौशाला का संचालन भी किया जा रहा है। समीप की पहाड़ी पर भगवान सूर्य की प्राचीन प्रतिमा तथा 11,111 शिवलिंग स्थापित हैं। श्रावण मास और महाशिवरात्रि पर यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है और वातावरण मेले जैसा हो जाता है।
1000 साल पुराना मंदिर
मंदिर का इतिहास परमारकालीन चंद्रावती नगरी से जुड़ा माना जाता है। 11वीं-12वीं शताब्दी में यहां परमार राजाओं की राजधानी थी। इस वंश के यशोधवल और धारावर्ष प्रतापी शासक रहे। चंद्रावती में शैव, वैष्णव और जैन मंदिरों के साथ भव्य राजप्रासादों का निर्माण हुआ था। वर्ष 1303 ईस्वी तक यह क्षेत्र परमारों के अधीन रहा, बाद में देवड़ा और चौहानों का शासन स्थापित हुआ। वर्ष 1405 में सिरोही राज्य की स्थापना तक यह स्थल देवड़ा चौहानों की राजधानी रहा। दिल्ली-गुजरात मार्ग पर स्थित होने के कारण समृद्ध चंद्रावती नगरी पर कई बार आक्रमण हुए, जिनमें अनेक मंदिर क्षतिग्रस्त हो गए। यहां प्राप्त शिल्पखंडों को चंद्रावती संग्रहालय में संरक्षित किया गया है। 1822 ईस्वी में ब्रिटिश इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड ने अपनी पुस्तक Annals and Antiquities of Rajasthan में यहां की स्थापत्य शैली और भव्यता का विस्तृत वर्णन किया है।