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Shimla News: जिले में बागवानी की ओर बढ़ा किसानों का रुझान
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जिले में 10 वर्षों में 3,253 हेक्टेयर बढ़ा बागवानी का दायरा, सेब के साथ नए फल बने लोगों की पसंद
एक दशक में 7.14 फीसदी बढ़ा बागवानी क्षेत्र
एक्सक्लूसिव
अनिल पंवार
शिमला। जिले में किसान अब तेजी से बागवानी की ओर रुख कर रहे हैं। पारंपरिक खेती में बढ़ती उत्पादन लागत, जंगली जानवरों से फसलों को नुकसान और खेती में घटते मुनाफे के कारण किसान खेती छोड़ रहे हैं।
बीते एक दशक में जिले में करीब 3253 हेक्टेयर क्षेत्र में बागवानी का विस्तार हुआ है। जिले के कम ऊंचाई वाले क्षेत्रों में भी अब लोग हाई डेंसिटी बागवानी कर रहे हैं। बागवानी विभाग के अनुसार वर्ष 2015 से 2025 के बीच जिले में बागवानी का क्षेत्रफल 45,590 हेक्टेयर से बढ़कर 48,843 हेक्टेयर हो गया है। एक दशक में करीब 3,253 हेक्टेयर नए क्षेत्र में फलों के बगीचे लगाए गए हैं। 10 वर्षों में बागवानी क्षेत्र में 7.14 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। बागवान आधुनिक तकनीक से हाई डेंसिटी बागवानी कर अपनी आर्थिकी को मजबूत कर रहे हैं। किसान विभाग के सहयोग से बागवानी को प्राथमिकता दे रहे हैं। इसमें सेब के अलावा कई अन्य फल भी शामिल हैं।
हालांकि, विभाग के अनुसार जिले में सेब अब भी सबसे बड़ी बागवानी फसल है और इसका रकबा 42 हजार हेक्टेयर से अधिक हो चुका है। इसके अलावा कीवी, जापानी फल, प्लम, चेरी और अन्य नए नकदी फलों की बागवानी को लेकर भी लोगों का रुझान बढ़ा है। वहीं जिन फलों में लागत और मेहनत अधिक तथा मुनाफा कम है, उनकी बागवानी भी लोग छोड़ रहे हैं। विभाग के आंकड़ों के अनुसार जिले में बादाम, नाशपाती, चेरी, आड़ू और अखरोट जैसी कई पारंपरिक फसलों का रकबा घटा है। बागवानी विशेषज्ञों का मानना है कि बदलती जलवायु, बाजार की मांग और बेहतर आय देने वाली किस्मों की ओर किसानों के बढ़ते रुझान के कारण यह बदलाव आया है। जिले के 12 ब्लॉकों में बागवानी हो रही है। इसमें नारकंडा, ठियोग, जुब्बल, रोहड़ू, चिड़गांव, चौपाल, रामपुर, ननखड़ी, मशोबरा और बसंतपुर सहित अन्य क्षेत्र शामिल हैं। विभाग के अनुसार, अब इसका दायरा लगातार बढ़ रहा है। जिले में जुन्गा और इसके आसपास के क्षेत्रों में भी लोग बागवानी कर रहे हैं।
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क्या बोले किसान
शोघी निवासी दिनेश ठाकुर ने बताया कि सब्जियों और अन्य पारंपरिक फसलों में मेहनत और लागत दोनों अधिक हैं। बीते कई वर्षों से बाजार में उचित दाम भी नहीं मिल रहे हैं। यह घाटे का सौदा बन गया है। इसके कारण लोग बागवानी की ओर रुख कर रहे हैं। वर्ष 2025 में ही शोघी और जुन्गा के बीच खड़की नामक स्थान पर बगीचा लगाया था और एक साल में ही बगीचे से फसल मिल गई। इसके अच्छे दाम भी मिले हैं। फागू निवासी सोहन ठाकुर ने बताया कि इस क्षेत्र में अधिकांश परिवार पहले पारंपरिक खेती करते थे। यहां लोग गेहूं, मक्की और दालों की खेती करते थे, लेकिन खर्च लगातार बढ़ने और आमदनी कम होने के कारण धीरे-धीरे सभी ने जमीन पर सेब के पौधे लगाने शुरू कर दिए।
कोट
जिले में बागवानी विभाग बागवानी को बढ़ावा दे रहा है। विभाग बागवानों को आधुनिक पौध, तकनीक और योजनाओं के बारे में समय-समय पर जानकारी देता है। जिले में वर्ष 2025 तक 48,843 हेक्टेयर भूमि पर बागवानी हो रही है। 10 वर्षों में बागवानी का रकबा बढ़ा है।
-सुदर्शना नेगी, उप निदेशक, बागवानी विभाग
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एक दशक में 7.14 फीसदी बढ़ा बागवानी क्षेत्र
एक्सक्लूसिव
अनिल पंवार
शिमला। जिले में किसान अब तेजी से बागवानी की ओर रुख कर रहे हैं। पारंपरिक खेती में बढ़ती उत्पादन लागत, जंगली जानवरों से फसलों को नुकसान और खेती में घटते मुनाफे के कारण किसान खेती छोड़ रहे हैं।
बीते एक दशक में जिले में करीब 3253 हेक्टेयर क्षेत्र में बागवानी का विस्तार हुआ है। जिले के कम ऊंचाई वाले क्षेत्रों में भी अब लोग हाई डेंसिटी बागवानी कर रहे हैं। बागवानी विभाग के अनुसार वर्ष 2015 से 2025 के बीच जिले में बागवानी का क्षेत्रफल 45,590 हेक्टेयर से बढ़कर 48,843 हेक्टेयर हो गया है। एक दशक में करीब 3,253 हेक्टेयर नए क्षेत्र में फलों के बगीचे लगाए गए हैं। 10 वर्षों में बागवानी क्षेत्र में 7.14 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। बागवान आधुनिक तकनीक से हाई डेंसिटी बागवानी कर अपनी आर्थिकी को मजबूत कर रहे हैं। किसान विभाग के सहयोग से बागवानी को प्राथमिकता दे रहे हैं। इसमें सेब के अलावा कई अन्य फल भी शामिल हैं।
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हालांकि, विभाग के अनुसार जिले में सेब अब भी सबसे बड़ी बागवानी फसल है और इसका रकबा 42 हजार हेक्टेयर से अधिक हो चुका है। इसके अलावा कीवी, जापानी फल, प्लम, चेरी और अन्य नए नकदी फलों की बागवानी को लेकर भी लोगों का रुझान बढ़ा है। वहीं जिन फलों में लागत और मेहनत अधिक तथा मुनाफा कम है, उनकी बागवानी भी लोग छोड़ रहे हैं। विभाग के आंकड़ों के अनुसार जिले में बादाम, नाशपाती, चेरी, आड़ू और अखरोट जैसी कई पारंपरिक फसलों का रकबा घटा है। बागवानी विशेषज्ञों का मानना है कि बदलती जलवायु, बाजार की मांग और बेहतर आय देने वाली किस्मों की ओर किसानों के बढ़ते रुझान के कारण यह बदलाव आया है। जिले के 12 ब्लॉकों में बागवानी हो रही है। इसमें नारकंडा, ठियोग, जुब्बल, रोहड़ू, चिड़गांव, चौपाल, रामपुर, ननखड़ी, मशोबरा और बसंतपुर सहित अन्य क्षेत्र शामिल हैं। विभाग के अनुसार, अब इसका दायरा लगातार बढ़ रहा है। जिले में जुन्गा और इसके आसपास के क्षेत्रों में भी लोग बागवानी कर रहे हैं।
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क्या बोले किसान
शोघी निवासी दिनेश ठाकुर ने बताया कि सब्जियों और अन्य पारंपरिक फसलों में मेहनत और लागत दोनों अधिक हैं। बीते कई वर्षों से बाजार में उचित दाम भी नहीं मिल रहे हैं। यह घाटे का सौदा बन गया है। इसके कारण लोग बागवानी की ओर रुख कर रहे हैं। वर्ष 2025 में ही शोघी और जुन्गा के बीच खड़की नामक स्थान पर बगीचा लगाया था और एक साल में ही बगीचे से फसल मिल गई। इसके अच्छे दाम भी मिले हैं। फागू निवासी सोहन ठाकुर ने बताया कि इस क्षेत्र में अधिकांश परिवार पहले पारंपरिक खेती करते थे। यहां लोग गेहूं, मक्की और दालों की खेती करते थे, लेकिन खर्च लगातार बढ़ने और आमदनी कम होने के कारण धीरे-धीरे सभी ने जमीन पर सेब के पौधे लगाने शुरू कर दिए।
कोट
जिले में बागवानी विभाग बागवानी को बढ़ावा दे रहा है। विभाग बागवानों को आधुनिक पौध, तकनीक और योजनाओं के बारे में समय-समय पर जानकारी देता है। जिले में वर्ष 2025 तक 48,843 हेक्टेयर भूमि पर बागवानी हो रही है। 10 वर्षों में बागवानी का रकबा बढ़ा है।
-सुदर्शना नेगी, उप निदेशक, बागवानी विभाग