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Himachal: हाईकोर्ट ने कहा- भूमि अधिग्रहण कलेक्टर को जिला अदालत के आदेश को चुनौती देने का अधिकार नहीं

संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला। Published by: Krishan Singh Updated Fri, 03 Apr 2026 06:00 AM IST
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सार

हाईकोर्ट ने भूमि अधिग्रहण से जुड़े एक मामले मे फैसला दिया है कि भूमि अधिग्रहण कलेक्टर (एलएसी) एक अर्ध-न्यायिक प्राधिकरण के रूप में कार्य करता है, इसलिए उसे जिला अदालत (रेफरेंस कोर्ट) की ओर से पारित मुआवजे की वृद्धि के आदेश के खिलाफ अपील दायर करने का कानूनी अधिकार नहीं है।

High Court States: Land Acquisition Collector Has No Right to Challenge District Court's Order
अदालत(सांकेतिक)। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

 हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने भूमि अधिग्रहण से जुड़े एक मामले मे फैसला दिया है कि भूमि अधिग्रहण कलेक्टर (एलएसी) एक अर्ध-न्यायिक प्राधिकरण के रूप में कार्य करता है, इसलिए उसे जिला अदालत (रेफरेंस कोर्ट) की ओर से पारित मुआवजे की वृद्धि के आदेश के खिलाफ अपील दायर करने का कानूनी अधिकार नहीं है। न्यायाधीश सुशील कुकरेजा की अदालत ने अपील को खारिज करते हुए कहा कि कलेक्टर एक अर्ध-न्यायिक प्राधिकरण है जिसने मूल आदेश पारित किया था। जब कोई उच्च न्यायालय (रेफरेंस कोर्ट) उस आदेश को बदल देता है, तो मूल आदेश देने वाला अधिकारी खुद उस फैसले के खिलाफ अपील नहीं कर सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि एक अधिकारी जो खुद न्याय करने की भूमिका में हो, वह अपने ही मामले में एक पक्षकार बनकर ऊपरी अदालत में नहीं जा सकता।

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हाईकोर्ट ने माना कि कलेक्टर के पास जिला अदालत के आदेश को चुनौती देने की कोई कानूनी क्षमता नहीं है। एक अर्ध-न्यायिक अधिकारी को यह अनुमति नहीं दी जा सकती कि वह अपने ही कारण में न्यायाधीश बन जाए और उस आदेश को चुनौती दे जिसने उसके फैसले को बदला है। यह मामला वर्ष 1986 का है, जब शिमला के बालूगंज में एनसीसी कॉम्प्लेक्स और भवन के निर्माण के लिए सरकार ने लगभग 4976.8 वर्ग गज भूमि का अधिग्रहण किया था। भूमि अधिग्रहण कलेक्टर ने शुरू में जमीन, पेड़ों और ढांचे के लिए करीब 4 लाख रुपये का मुआवजा निर्धारित किया था। जमीन के मालिकों (दावेदारों) ने इस मुआवजे को कम बताते हुए जिला अदालत फॉरेस्ट शिमला में चुनौती दी। दिसंबर 2010 में कोर्ट ने मुआवजे की राशि को बढ़ाकर 411 रुपये प्रति वर्ग गज कर दिया। जिला अदालत के इस फैसले के खिलाफ भूमि अधिग्रहण कलेक्टर ने खुद हाईकोर्ट में अपील दाखिल की, जिस पर यह फैसला आया है।

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