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हिमाचल: हाईकोर्ट ने कहा- सरोगेसी से और प्राकृतिक रूप से जन्म देने वाली मां के बीच अंतर करना नारीत्व का अपमान

Fri, 07 Aug 2026 05:00 AM IST
Krishan Singh भारती मेहता, संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला।
भारती मेहता, संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला। Published by: Krishan Singh Updated Fri, 07 Aug 2026 05:00 AM IST
सार

 सरोगेसी से मां बनने वाली महिला सरकारी कर्मचारियों के मातृत्व अवकाश को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसी महिलाएं भी सामान्य जैविक मां की तरह 180 दिन के मातृत्व अवकाश की हकदार हैं। 

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Himachal High Court states that distinguishing between a mother who gives birth via surrogacy
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने सरोगेसी से मां बनने वाली महिला सरकारी कर्मचारियों के मातृत्व अवकाश को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसी महिलाएं भी सामान्य जैविक मां की तरह 180 दिन के मातृत्व अवकाश की हकदार हैं। हाईकोर्ट ने सरोगेसी से मां बनी महिला और प्राकृतिक रूप से जन्म देने वाली मां के बीच अंतर को नारीत्व का अपमान बताया। अदालत ने कहा कि मातृत्व का अधिकार और बच्चे की उचित देखभाल महिला के सम्मान और मौलिक अधिकारों से जुड़ा विषय है, जिसमें सरोगेसी के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जा सकता। न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की अदालत ने कहा कि मां तो मां ही होती है, चाहे वह प्राकृतिक रूप से जन्म दे या सरोगेसी से कमीशनिंग मदर बने।

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मातृत्व का अधिकार और बच्चे के सर्वांगीण विकास का अधिकार शामिल
संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) में मातृत्व का अधिकार और बच्चे के सर्वांगीण विकास का अधिकार शामिल हैं। मातृत्व अवकाश का उद्देश्य मां और नवजात शिशु दोनों का कल्याण सुनिश्चित करना है। इसका लक्ष्य उनके बीच भावनात्मक संबंध बनाना भी है। अदालत ने राज्य सरकार के दोहरे मापदंड पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब सीसीएस लीव रूल्स के तहत एक साल से छोटे बच्चे को गोद लेने पर 180 दिन की छुट्टी देती है, फिर सरोगेसी पर आपत्ति क्यों? यह याचिका डॉ. जूही मन्हास ने राज्य सरकार के उन आदेशों के खिलाफ दायर की थी, जिनके तहत विभाग ने सरोगेसी से पैदा हुए बच्चों के लिए उन्हें मातृत्व अवकाश देने से इन्कार कर दिया था। राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि केंद्रीय कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) की ओर से 18 जून 2024 को सरोगेसी मामलों में मातृत्व अवकाश से संबंधित जारी की गई अधिसूचना को अभी तक लागू नहीं किया है।

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छुट्टियों को मातृत्व अवकाश में दर्ज करने का आदेश
इस आधार पर याचिकाकर्ता का दो महीने का वेतन भी रोका गया है। हालांकि, अदालत ने इस दलील को पूरी तरह खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि वर्ष 2021 में ही हाईकोर्ट की डबल बेंच इस सिद्धांत को स्पष्ट तय कर चुकी है, ऐसे में डबल बेंच का फैसला राज्य सरकार पर पहले से ही बाध्यकारी है और अलग से अधिसूचना अपनाने का इंतजार करने की कोई आवश्यकता नहीं है।  अदालत ने याचिकाकर्ता के खिलाफ जारी विभागीय पत्रों को तुरंत प्रभाव से रद्द करते हुए सरकार को आदेश दिया कि याचिकाकर्ता को दोनों बच्चों के जन्म के समय ली गई 180-180 दिनों की छुट्टी को मातृत्व अवकाश के रूप में दर्ज किया जाए। साथ ही याचिकाकर्ता को जुलाई-अगस्त 2021 और सितंबर 2021 के 8 दिन का वेतन 2 माह में जारी करने का आदेश दिया।

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