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हिमाचल: अनियंत्रित दोहन से अरलू की प्राकृतिक आबादी पर खतरा, शोध में खुलासा

राकेश राणा, संवाद न्यूज एजेंसी, मंडी। Published by: Krishan Singh Updated Fri, 22 May 2026 12:53 PM IST
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सार

 मंडी जिले में हुए एक शोध में खुलासा हुआ है कि इसके फलों और बीजों की लगातार तुड़ाई से पौधे का प्राकृतिक पुनर्जनन प्रभावित हो रहा है।

Himachal: Uncontrolled Exploitation Threatens Natural Population of Arlu—Research Reveals
अरलू की प्राकृतिक आबादी पर खतरा। - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
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विस्तार

किन्नौरी टोपी की सजावट से लेकर आयुर्वेदिक दवाओं तक इस्तेमाल होने वाला अरलू अब बढ़ती मांग और अनियंत्रित दोहन के कारण संकट की ओर बढ़ रहा है। मंडी जिले में हुए एक शोध में खुलासा हुआ है कि इसके फलों और बीजों की लगातार तुड़ाई से पौधे का प्राकृतिक पुनर्जनन प्रभावित हो रहा है। शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि यदि समय रहते संरक्षण और नियंत्रित दोहन की दिशा में कदम नहीं उठाए गए तो इसकी प्राकृतिक आबादी पर गंभीर असर पड़ सकता है। आईओएसआर जर्नल ऑफ एनवायरमेंटल साइंस टॉक्सिकोलॉजी एंड फूड टेक्नोलॉजी में प्रकाशित शोध वल्लभ राजकीय महाविद्यालय मंडी की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. तारा देवी सेन और एचपीयू के प्रो. संजीत सिंह ने किया है।  

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अरलू यानी ओरोक्साइलम इंडिकम हिमाचल के निचले और गर्म क्षेत्रों में पाया जाता है। इसके पंखनुमा बीज किन्नौरी टोपी और बौद्ध धार्मिक परंपराओं में विशेष महत्व रखते हैं। इसकी छाल, जड़, अन्य बीज और अन्य हिस्सों का उपयोग च्यवनप्राश, दशमूल व आयुर्वेदिक औषधियों में होता है।  शोधकर्ताओं ने जुलाई 2021 से सितंबर 2022 तक मंडी जिले में किसानों, व्यापारियों, वैद्यों और स्थानीय लोगों से बातचीत की। अध्ययन में सामने आया कि 85 प्रतिशत लोग इसके धार्मिक और सांस्कृतिक उपयोग से जुड़े हैं। जबकि 60 प्रतिशत लोग इसे औषधीय रूप में इस्तेमाल करते हैं। अध्ययन में कहा गया है कि अरलू के फल मंडी और बिलासपुर जैसे क्षेत्रों से खरीदकर किन्नौर, लाहौल और रिवालसर के मेलों में ऊंचे दामों पर बेचे जाते हैं। बड़े आकार के फल स्थानीय बाजार में 25 से 50 रुपये (प्रति) जबकि बाहरी बाजारों में 250 से 300 रुपये तक बिक रहे हैं। बढ़ती मांग के कारण इसके फलों और बीजों का अत्यधिक दोहन हो रहा है।

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लोगों में जागरूकता बढ़ाने पर जोर

शोध में बताया गया है कि अरलू के बीज हल्के होने के कारण प्राकृतिक रूप से दूर-दूर तक फैलते हैं, लेकिन परिपक्व फलों की लगातार तुड़ाई से बीज फैलाव की प्रक्रिया प्रभावित हो रही है। इसके चलते जंगलों में इसका प्राकृतिक विस्तार कम होता जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ ने भी इसे संवेदनशील औषधीय पौधों की श्रेणी में रखा है। शोधकर्ता वल्लभ राजकीय महाविद्यालय मंडी की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. तारा देवी सेन ने सुझाव दिया है कि बड़े स्तर पर पौधरोपण, नियंत्रित दोहन और लोगों में जागरूकता बढ़ाई जाए।

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