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HP High Court: केंद्र सरकार सोती रही, देरी के आधार पर याचिका खारिज; जानें क्या है मामला

संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला। Published by: Ankesh Dogra Updated Tue, 03 Mar 2026 10:00 AM IST
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सार

केंद्र सरकार ने 2020 के एक पुराने आदेश को हिमाचल हाईकोर्ट में चुनौती दी थी जिसे हाईकोर्ट ने देरी के कारण दायर उस रिट याचिका को खारिज कर दिया है। जानें पूरा मामला...

HP High Court: Central government remained asleep, petition dismissed on grounds of delay
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
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विस्तार

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने देरी के कारण दायर उस रिट याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें केंद्र सरकार ने 2020 के एक पुराने आदेश को चुनौती दी थी।  अदालत ने कहा कि इतने लंबे समय तक केंद्र सरकार सोती रही। यदि सरकार लंबे समय तक अदालती आदेशों पर चुप्पी साधे रहती है, तो बाद में वह अपनी मर्जी से उन आदेशों को चुनौती नहीं दे सकती।
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मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने पाया कि केंद्र सरकार 2020 के आदेश के बाद वर्षों तक शांत बैठी रही। जब 2025 में ट्रिब्यूनल ने आदेश का पालन न होने पर सख्त रुख अपनाया और अवमानना जैसी स्थिति बनी, तब सरकार ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अदालत ने कहा है कि जब किसी आदेश को लंबे समय तक चुनौती नहीं दी जाती, तो उस पक्ष के पक्ष में एक कानूनी अधिकार बन जाता है जिसने केस जीता है।
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प्रशासनिक आदेशों या वरिष्ठता के दावों को उचित समय के भीतर चुनौती दी जानी चाहिए। अदालत ने कहा कि विभाग ने समय रहते कानूनी उपचार नहीं अपनाया और अब इस स्तर पर मेरिट के आधार पर मामले को दोबारा खोलने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

यह है मामला
यह मामला खेम राज वर्मा और अन्य बनाम भारत संघ से जुड़ा है। उत्तरदाताओं ने 1999 से 2004 के बीच अनुबंध के आधार पर संस्थान में कार्य किया था।  13 जुलाई 2015 को विभाग ने उनकी नियमितीकरण की मांग को ठुकरा दिया था। इसके खिलाफ कर्मचारी सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल गए थे। ट्रिब्यूनल ने 9 सितंबर 2020 को विभाग के आदेश को रद्द करते हुए निर्देश दिया था कि यदि मल्टी टास्किंग स्टाफ के पद खाली हैं, तो इन कर्मचारियों को वहां समायोजित किया जाए या भविष्य में नए सिरे से नियुक्ति के लिए उनके नाम पर विचार किया जाए।

जीएसटी अपील दायर करने को ट्रिब्यूनल का रुख करें : हाईकोर्ट
शिमला। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि प्रदेश में जीएसटी अपीलीय ट्रिब्यूनल का गठन हो चुका है। इसलिए करदाताओं को सीधे हाईकोर्ट के बजाय निर्धारित ट्रिब्यूनल के माध्यम से शिकायतों का निवारण करना चाहिए। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से अदालत को सूचित किया कि अब अपीलीय ट्रिब्यूनल का गठन किया जा चुका है। उन्होंने दलील दी कि अब याचिकाकर्ता के पास कानून के तहत अपील करने का एक विशिष्ट मंच उपलब्ध है, इसलिए यह याचिका विचारणीय नहीं है।

न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रंजन  शर्मा की खंडपीठ ने कहा कि ऐसी स्थिति में याचिकाकर्ता को सीधे हाईकोर्ट आने के बजाय जीएसटी अधिनियम के तहत अपीलीय ट्रिब्यूनल में अपील दायर करनी चाहिए। मैसर्स निप्सो लिमिटेड ने का तर्क था कि चूंकि जीएसटी अपीलीय ट्रिब्यूनल का गठन नहीं हुआ है, इसलिए उनके पास संविधान के अनुच्छेद 226 और 227 के तहत सीधे हाईकोर्ट आने के अलावा अन्य विकल्प नहीं है।
 

बौद्धिक दिव्यांगता अयोग्यता नहीं, विशेषज्ञ की राय सर्वोपरि 
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई उम्मीदवार हल्की बौद्धिक दिव्यांगता (माइल्ड इंटेलेक्चुअल डिसेबिलिटी) से ग्रसित है। उसे केवल इस आधार पर नौकरी से वंचित नहीं किया जा सकता कि वह अस्वस्थ दिमाग का है, जब तक कि मेडिकल विशेषज्ञ उसे कार्य के लिए अनफिट न घोषित कर दें।

न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की अदालत ने कहा कि पार्ट टाइम मल्टी टास्क वर्कर पॉलिसी 2020 के तहत बेंचमार्क दिव्यांगता वाले उम्मीदवारों को तब तक नहीं रोका जा सकता, जब तक विभाग विशेष रूप से उन्हें वर्जित न करे। अदालत ने प्रतिवादी रजनीश की नियुक्ति को बरकरार रखते हुए याचिकाकर्ता सीमा देवी की सेवाएं समाप्त करने के आदेश को सही ठहराया। लेकिन कोर्ट ने शिक्षा विभाग को निर्देश दिया है कि चूंकि याचिकाकर्ता भी दिव्यांग श्रेणी से हैं। उन्होंने लगभग 1 साल 9 महीने तक अपनी सेवाएं दी है। इसलिए बिलासपुर में अन्य पद खाली हो, तो उन्हें वहां समायोजित करने पर विचार किया जाए। 
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