HP High Court: पंचायतों के पुनर्गठन, विलय मामले में राज्य चुनाव आयोग को बनाया प्रतिवादी; जानें पूरा मामला
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने हिमाचल प्रदेश राज्य चुनाव आयोग को प्रतिवादी के रूप में शामिल करने के निर्देश दिए हैं। जानें क्या है पूरा मामला...
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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने मंगलवार को ग्राम पंचायत घुरट के विभाजन और नई ग्राम सभा के गठन को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई की। न्यायालय ने मामले की गंभीरता को देखते हुए हिमाचल प्रदेश राज्य चुनाव आयोग को इस याचिका में प्रतिवादी के रूप में शामिल करने के निर्देश दिए हैं। राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि नई ग्राम सभा का गठन और पंचायतों का पुनर्गठन कानून के प्रावधानों के तहत ही किया गया है।
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने किन्नौर जिले में सोरंग पावर प्राइवेट लिमिटेड जल विद्युत परियोजना के कारण विस्थापित और प्रभावित हुए परिवारों को रोजगार देने से जुड़े मामले में जांच का आदेश दिया है। अदालत ने उपायुक्त जिला किन्नौर को आदेश दिए हैं कि पुनर्वास परियोजना के प्रशासक होने के नाते वह सभी हितधारकों और संबंधित पक्षों को शामिल करते हुए कानून के अनुसार याचिकाकर्ताओं की शिकायतों की जांच करें और 12 सप्ताह के भीतर उचित निर्णय लें।
न्यायाधीश ज्योत्स्ना रिवाल दुआ की अदालत ने कहा कि उपायुक्त किन्नौर इस योजना के अधिकृत प्रशासक हैं, इसलिए यह उनकी जिम्मेदारी है कि वह सभी पक्षों को सुनकर उचित निर्णय लें। अदालत ने याचिकाकर्ता सुरजन कुमार सहित कुल 14 समान याचिकाओं पर एक साथ यह फैसला दिया है। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि वर्ष 2004 में राज्य सरकार और परियोजना प्रबंधन के बीच हुए समझौते के अनुसार प्रत्येक विस्थापित परिवार के एक सदस्य को रोजगार दिया जाना अनिवार्य था। वर्ष 2006 के कार्यान्वयन समझौते और 2007 की पुनर्वास योजना के बावजूद उन्हें रोजगार नहीं मिला। उन्होंने बताया कि निजी कंपनी और प्रशासन ने रोजगार की शर्तों का उल्लंघन किया है।
हाईकोर्ट ने कुल्लू जिले की राजकीय प्राथमिक पाठशाला(जीपीएस)ओल्वा के स्कूल के जीपीएस माटल में किए गए विलय के निर्णय को रद्द कर दिया है। न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रंजन शर्मा की खंडपीठ ने सरकार की ओर से विलय वापस लेने के लिखित आश्वासन के बाद इस याचिका का निपटारा कर दिया है। याचिकाकर्ता स्कूल प्रबंधन समिति की ओर से सरकार की ओर से जारी 17 अगस्त 2024 की अधिसूचना, जिसके तहत ओल्वा स्कूल का विलय माटल स्कूल में कर दिया गया था को चुनौती दी थी।अब सरकार ने इस निर्णय को वापस ले लिया है।शिक्षा निदेशक, हिमाचल प्रदेश ने 23 मार्च 2026 को एक पत्र के माध्यम से निर्देश जारी किए हैं कि राजकीय प्राथमिक पाठशाला ओल्वा आगामी आदेशों तक स्वतंत्र रूप से कार्य करती रहेगी। सरकार के इस आदेश के बाद स्कूल को फिलहाल राहत मिल गई है, लेकिन कोर्ट को यह भी बताया गया कि अगले शैक्षणिक सत्र की शुरुआत में स्कूल में छात्रों के नामांकन की समीक्षा की जाएगी, जिसके आधार पर भविष्य का निर्णय लिया जाएगा।
हिमाचल हाईकोर्ट में हिमालय ग्रीन कंपनी की ओर से प्रदेश में प्लास्टिक बैग बेचने पर लगे प्रतिबंध को हटाने को लेकर दायर याचिका को वापस ले लिया है। याचिका में प्रदेश सरकार की ओर से जारी 21 जनवरी 2025 की अधिसूचना को चुनौती दी गई थी, जिसके तहत राज्य सरकार ने उन प्लास्टिक बैगों की बिक्री और उपयोग पर भी रोक लगा दी है जो ईको-फ्रेंडली या बायोडिग्रेडेबल नहीं है।
सुनवाई के दौरान अदालत को सूचित किया कि अधिसूचना को चुनौती तो दी गई है लेकिन अधिनियम को नही।।न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रंजन शर्मा की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान पाया कि कंपनी की ओर से केवल अधिसूचना को चुनौती दी गई है लेकिन जिस एक्ट के तहत यह अधिसूचना लाई गई है उसे चुनौती नहीं दी गई है। कंपनी ने वर्तमान याचिका को वापस लेते हुए अदालत से गुहार लगाई कि उन्हें नए तरीके से याचिका को दायर करने की अनुमति दी जाए, जिसे अदालत ने स्वीकार किया। सरकार की ओर से महाधिवक्ता अनूप रतन बताया कि प्रदेश में कुछ प्लास्टिक उत्पादों को बेचने पर प्रतिबंध लगाया गया है। कंपनी जिस प्लास्टिक बैग को बेचने की अनुमति मांग रही है वह बायोडिग्रेडेबल नहीं है।
प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सरकारी टेंडर प्रक्रिया के दौरान तकनीकी शर्तों का पालन अनिवार्य है। न्यायालय ने ए श्रेणी के एक सरकारी ठेकेदार की ओर से दायर उन तीनों याचिकाओं को खारिज कर दिया है, इसमें उसने टेंडर प्रक्रिया से बाहर किए जाने को चुनौती दी थी। न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रंजन शर्मा की खंडपीठ ने कहा कि साझेदारी फर्म एक अलग कानूनी इकाई होती है। किसी व्यक्ति की ओर से व्यक्तिगत क्षमता में भरे गए टेंडर के लिए फर्म का जीएसटी नंबर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। याचिकाकर्ता ने दूसरे ठेकेदारों का उदाहरण दिया था जिनके टेंडर स्वीकार किए गए थे। कोर्ट ने पाया कि उन ठेकेदारों ने अपनी प्रोपराइटरशिप फर्मों के नंबर दिए थे, न कि किसी साझेदारी फर्म के। खंडपीठ ने माना कि वन निगम का निर्णय सही था और इसमें कोई पक्षपात व मनमानी नहीं की गई है।