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Himachal News: आईजीएमसी के डॉक्टरों के सामने आया दुर्लभ मामला, गर्भस्थ शिशु के मुंह में मिला परजीवी भ्रूण

Mon, 10 Aug 2026 12:24 PM IST
Ankesh Dogra अमर उजाला ब्यूरो, शिमला।
अमर उजाला ब्यूरो, शिमला। Published by: Ankesh Dogra Updated Mon, 10 Aug 2026 12:24 PM IST
सार

आईजीएमसी शिमला के डॉक्टरों के सामने गर्भावस्था से जुड़ा बेहद दुर्लभ मामला आया है। 20 वर्षीय महिला की 22 सप्ताह से पहले हुई सोनोग्राफी में भ्रूण के जबड़े में असामान्यता के साथ मुंह के अंदर की ओर निकली एक अलग संरचना दिखाई दी। विस्तृत इमेजिंग के बाद इसे ‘ओरल फीटस इन फीटू’ माना गया। केस रिपोर्ट हाल ही में अंतरराष्ट्रीय जर्नल ‘अल्ट्रासाउंड’ में प्रकाशित हुई है।

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igmc shimla rare fetus in fetu oral case
आईजीएमसी शिमला। - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क

विस्तार

गर्भ में पल रहे बच्चे के मुंह के अंदर एक और भ्रूण की मौजूदगी...। सुनने में यह हैरान करने वाला लगे, लेकिन आईजीएमसी शिमला के डॉक्टरों के सामने ऐसा दुर्लभ मामला सामने आया। गर्भवती महिला की करीब 22वें सप्ताह समय हुई अल्ट्रासाउंड जांच में भ्रूण के जबड़े के बीच में यह बड़ा दोष दिखाई दिया। इसी जगह से एक असामान्य मांसल संरचना मुंह के अंदर की ओर निकली हुई नजर आई। विस्तृत जांच में इसकी पहचान ‘फीटस इन फीटू’ के रूप में हुई।

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फीटस इन फीटू बेहद दुर्लभ स्थिति है। इसमें जुड़वा गर्भावस्था के दौरान एक अन्य भ्रूण का विकास सामान्य रूप से नहीं हो पाता और वह दूसरे विकसित हो रहे भ्रूण के शरीर के अंदर या उसके किसी हिस्से में मौजूद रह जाता है। यह आमतौर पर पेट के अंदर पाया जाता है, लेकिन इस मामले में इसकी स्थिति असामान्य थी। परजीवी भ्रूण (फीटस इन फीटू) का हिस्सा मुंह के निचले हिस्से से बाहर की ओर निकल रहा था और भ्रूण के निचले जबड़े में बीच की तरफ बड़ा दोष था। यह मामला पिछले साल सामने आया था। हालांकि, केस रिपोर्ट अंतरराष्ट्रीय जर्नल ‘अल्ट्रासाउंड’ में हाल ही में प्रकाशित हुई है।
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रिपोर्ट आईजीएमसी शिमला के रेडियोडायग्नोसिस विभाग की प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष डॉ. अनुपम झोबटा, एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. श्रुति ठाकुर, डॉ. चारुस्मिता ठाकुर के अलावा स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग की डॉ. कल्पना नेगी ने तैयार की। यही टीम इस मामले की चिकित्सीय उपचार में भी शामिल थी।

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20 वर्षीय महिला की 22 हफ्ते से कम गर्भावस्था में सोनोग्राफी की गई। जांच में जबड़े में असामान्यता के साथ उससे जुड़ी हुई एक अलग संरचना दिखाई दी। डॉक्टरों ने अल्ट्रासाउंड समेत अलग-अलग इमेजिंग तकनीकों से इसकी जांच की। जांच के बाद इसे ओरल फीटस इन फीटू माना गया। चूंकि गर्भ 22 सप्ताह से कम था तो उसका कानूनन गर्भपात कर प्रसूता की जान बचा ली गई। रेडियोडायग्नोसिस विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. श्रुति ठाकुर के अनुसार यदि ऐसी असामान्य संरचना बढ़ती रहती तो विकसित हो रहे भ्रूण को नुकसान पहुंचने के साथ प्रसव के दौरान और बाद में भी जटिलताएं पैदा हो सकती थीं। ब्यूरो

अधिकांश मामले बच्चों के जन्म के बाद
फीटस इन फीटू के अधिकांश मामले बच्चों के जन्म के बाद सामने आते हैं। गर्भावस्था के दौरान अल्ट्रासाउंड से इसकी पहचान होना ही दुर्लभ है और मुंह के अंदर फीटस इन फीटू मिलना उससे भी असामान्य स्थिति है।  डाॅक्टरों के मुताबिक ऐेसे मामले दुनिया में बेहद कम आते हैं।
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