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International Women's Day 2026: हिमाचल प्रदेश की बेटियों ने पेश की नजीर... बदल रहीं पहाड़ की तकदीर

संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला/सोलन/मंडी/कुल्लू/चौपाल/हमीरपुर/नाहन/चंबा/लाहौल स्पीति/धर्मशाला Published by: Ankesh Dogra Updated Sun, 08 Mar 2026 12:39 PM IST
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सार

International women's day 2026: दुनिया भर में 8 मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। बात हिमाचल की करें तो यहां की बेटियां विभिन्न क्षेत्रों में नजीर पेश कर रही हैं। जानें विस्तार से...

International Women's Day 2026 daughters of Himachal set an example changing fate of the mountains
हिमाचल की बेटियां। - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
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विस्तार

चुनौती देते पहाड़ों की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के बीच कड़ी मेहनत, समर्पण और दृढ़ संकल्प से हिमाचल की बेटियां विभिन्न क्षेत्रों में नजीर पेश कर रही हैं। चाहे वो शिक्षा का क्षेत्र हो या खेल का मैदान, राजनीति हो या प्रशासनिक सेवा, कृषि-बागवानी से लेकर उद्यमिता तक में बेटियां प्रतिभा का लोहा मनवा रही हैं। प्रदेश में महिला साक्षरता दर लगातार बढ़ रही है। इससे सामाजिक बदलाव भी तेजी से दिखाई दे रहा है। बेटियां परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत कर रही हैं। रूढि़यों को तोड़ प्रदेश की तकदीर बदल रही हैं। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर पेश है ऐसी ही कुछ महिलाओं की कहानी...
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बीस हजार महिलाओं का सहारा बनीं निर्मल
बेसहारा और जरूरतमंद महिलाओं को सहारा देने के लिए साल 2005 में शुरू हुआ सफर आज 20 हजार से ज्यादा महिलाओं का कारवां बन चुका है। यह सफर है निर्मल चंदेल का, जिन्होंने एकल महिला के तौर पर खुद समाज की बेसहारा और जरूरतमंद महिलाओं को सहारा देने फैसला लिया। करीब 20 वर्ष पहले सौ महिलाओं से निर्मल ने इस सफर की शुरुआत की। समाज में जो महिलाएं अकेले अपने हक के लिए संघर्ष कर रही हैं। उनके लिए निर्मल मददगार बनीं। आज 20, 876 एकल महिलाएं इनके समूह से जुड़ चुकी हैं और सशक्त हो रही हैं। हिमाचल के 8 जिलों के 23 खंडों की एकल महिलाओं को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक सहित आजीविका से जोड़कर आत्मनिर्भर बनने की राह दिखाई है। मंडी जिले से संबंध रखने वाली निर्मल चंदेल ने वर्ष 1990 में जब वह 25 वर्ष की थीं तब उन्होंने तिरस्कार से सम्मान तक का सफर शुरू किया।

स्वयं सहायता समूहों से जुड़ना शुरू किया। महिलाओं को अकाउंट्स सहित अन्य प्रशिक्षण दिया। लड़कियों की घटती संख्या पर जागरूकता कार्यक्रम किए। इसके बाद संगठन शुरू करने का निर्णय लिया। एकल महिलाओं के दर्द को समझते हुए 2005 में एकल नारी शक्ति संगठन की शुरूआत की। वर्ष 2005 में शिमला तक निर्मल चंदेल की अगुवाई में 45 किलोमीटर की पैदल निकाली गई। इस यात्रा में उस समय 105 महिलाओं ने भाग लिया था। इनके नारों की गूंज के बाद एकल नारी शक्ति संगठन की प्रदेश अध्यक्ष निर्मल चंदेल ने बताया कि उन्होंने संगठन इसी सोच के साथ शुरू किया था कि अगर वह एक एकल महिला को भी सहारा देकर सशक्त बना पाईं तो वह दस महिलाओं की शक्ति बन सकती हैं। 

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International Women's Day 2026 daughters of Himachal set an example changing fate of the mountains
मीना चंदेल की फूलों की खेती। - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
फूलों की खेती से सफलता की खुशबू फैला रहीं मीना
बिलासपुर जिले के बैरी दड़ोला गांव की मीना चंदेल ने यह साबित कर दिया है कि खेती के क्षेत्र में भी महिलाएं बड़ी सफलता हासिल कर सकती हैं। उन्होंने शिक्षक की नौकरी छोड़कर अपने पति सुनील चंदेल के साथ फूलों की खेती यानी फ्लोरीकल्चर का कार्य शुरू किया और आज इस क्षेत्र में एक सफल उद्यमी के रूप में पहचान बना चुकी हैं। मीना चंदेल के पति ने वर्ष 1999 में फूलों की खेती की शुरुआत की। वर्ष 2012 में उन्होंने नौकरी छोड़कर पूरी तरह से इस व्यवसाय में कदम रखने का निर्णय लिया। इसके बाद उन्होंने आधुनिक तकनीकों और नए प्रयोगों के साथ फ्लोरीकल्चर को आगे बढ़ाया। आज उनके फार्म का सालाना टर्नओवर करीब 70 लाख रुपये तक पहुंच चुका है। उन्होंने 400 से अधिक लोगों को फूलों की खेती का व्यवसाय शुरू करवाने में मार्गदर्शन दिया है, जबकि अपने फार्म में करीब 30 लोगों को रोजगार भी दिया हुआ है। मीना चंदेल को उनकी उपलब्धियों के लिए पांच राष्ट्रीय और दो क्षेत्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है।

पहाड़ की बेटी की रफ्तार का कमाल मोटर स्पोर्ट्स में चमक बिखेर रहीं श्रिया 
अंतरराष्ट्रीय रेसिंग ट्रैक तक पहुंचने का श्रिया लोहिया का सफर साहस, संघर्ष और दृढ़ संकल्प की कहानी है। सुंदरनगर की श्रिया लोहिया ने कम उम्र में ही मोटर स्पोर्ट्स जैसे चुनौतीपूर्ण खेल में कदम रखा। श्रिया ने रूढ़ीवादी सोच को तोड़ते हुए इस खेल की दुनिया में कदम रखा और अपनी अलग पहचान बनाई। राज्य में मोटर स्पोर्ट्स की सुविधाएं और प्रशिक्षण के अवसर सीमित होने के कारण श्रिया को अभ्यास और प्रतियोगिताओं के लिए लंबी यात्राएं करनी पड़ीं। पढ़ाई के साथ कठिन प्रशिक्षण और लगातार प्रतियोगिताओं में भाग लेना अपने-आप में बड़ी चुनौती रही। उन्होंने अपने सपने को कभी कमजोर नहीं पड़ने दिया। अपने जज्बे और मेहनत के दम पर श्रिया ने कम उम्र में ही कई महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की हैं। अब तक वह 120 से अधिक रेसिंग इवेंट्स में भाग ले चुकी हैं और 30 से अधिक पोडियम फिनिश हासिल कर चुकी हैं। वह भारत की सबसे कम उम्र की महिला फॉर्मूला-4 रेसर और देश की सबसे कम उम्र की ड्रिफ्ट ड्राइवर भी हैं। 

सीखने की ललक ने तारा को बना दिया लखपति दीदी
चौपाल विकास खंड की दूरदराज पंचायत किरण निवासी तारा चौहान ग्रामीण महिलाओं के सशक्तीकरण की मिसाल बनकर उभरी हैं। तारा चौहान अपनी आर्थिकी को मजबूत करने के लिए स्वयं सहायता समूह से जुड़ीं। समूह से जुड़ने के बाद तारा चौहान ने प्रशिक्षण और सीखने के अवसरों का पूरा लाभ उठाया। इसके बाद लखपति दीदी बन गईं। मेहनत और लगन के बल पर उन्होंने लोकओएस प्रणाली को भी अच्छी तरह सीखा। आगे चलकर लोकओएस की मास्टर ट्रेनर बनीं। आज वह राष्ट्रीय स्तर पर कई स्वयं सहायता समूहों को प्रशिक्षण दे रही हैं और समूहों को संचालित करने में मार्गदर्शन कर रही हैं। तारा चौहान वर्ष 2022 में स्वयं सहायता समूह से जुड़ीं। समूह से जुड़ने के बाद उन्होंने फूड प्रोसेसिंग की ट्रेनिंग ली।

सेब से चार और चटनी बनाना सीखा। अपने उत्पादों को हिम ईरा ब्रांड के तहत बेचना शुरू किया। उत्पादों को दिल्ली में सरस मेले में भी प्रदर्शित किया। उत्पादों को बेचकर तारा चौहान सालाना एक लाख रुपये से अधिक कमाने लगी। इसके बाद केंद्र सरकार की योजना के तहत लखपति दीदी घोषित किया गया। तारा चौहान के इस प्रेरक सफर को राष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिली। उन्हें भारत सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय की ओर गुरुग्राम में लखपति दीदी प्रेस कॉन्फ्रेंस में आमंत्रित किया गया। इस मंच पर हिमाचल प्रदेश का प्रतिनिधित्व करते हुए उन्होंने स्वयं सहायता समूहों की उपलब्धियों और महिलाओं के सशक्तीकरण की कहानी साझा की। तारा चौहान का मानना है कि यदि महिलाओं को सही अवसर, मार्गदर्शन और विश्वास मिले, तो वे न केवल अपने जीवन को बदल सकती हैं, बल्कि समाज में भी सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं। 

किसान की पत्नी के 3 उद्योग, कई को रोजगार
किसान की पत्नी ने खेती को उद्योग से जोड़कर जहां देश और विदेश में अपनी पहचान बनाई है। वहीं, युवाओं को रोजी रोटी देने का जरिया बनी हैं। वर्तमान में नीतू विज के बद्दी में तीन उद्योग हैं, इसमें 80 युवाओं को रोजगार मिला है। महिलाओं को इन उद्योगों में प्राथमिकता दी जाती है। हरियाणा के पंचकूला की रहने वाली नीतू ने अकेले अपने दम पर यह मुकाम हासिल किया है। नीतू का विवाह खेतीबाड़ी करने वाले रजनीश विज से हुआ है। नीतू ने शादी के बाद खेती को उद्योग से जोड़कर आगे बढ़ने की योजना बनाई। उन्होंने खेत में तैयार होने वाली एलोवेरा से स्वास्थ्यवर्धक जूस तैयार किया। 

42 की उम्र में रैकेट थाम दुनिया में छा गईं उर्वशी
धर्मशाला की उर्वशी ने 42 वर्ष की उम्र में बैडमिंटन खेलना शुरू किया और आज वह देश का प्रतिनिधित्व कर रही हैं। 50 वर्षीय उर्वशी थापा पहले एक स्कूल में अध्यापन कार्य करती थीं, लेकिन बेटे की बोर्ड परीक्षा की तैयारी को ध्यान में रखते हुए उन्होंने नौकरी छोड़ दी। इसी दौरान उन्होंने अपने खाली समय का उपयोग खेल में करने का फैसला किया और बैडमिंटन को अपनाया। शुरुआत शौक के तौर पर हुई। पहली बार उर्वशी ने जर्मनी में अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में भाग लिया। 2021 में वह भारत का नेतृत्व स्पेन में अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में कर चुकी हैं। उर्वशी ने काह कि यदि मन में दृढ़ संकल्प हो तो किसी भी उम्र में नई शुरुआत की जा सकती है। 

छह फीट बर्फ में चलकर किया अभ्यास, अब अंतरराष्ट्रीय स्कीयर्स
स्की चैंपियन आंचल कठिन परिश्रम की बदौलत आधी दुनिया के लिए प्रेरणा बनी हैं। उन्होंने भारत की झोली में कई पदक डाले हैं। हाल ही में औली में राष्ट्रीय शीतकालीन खेलों में आंचल ने दो और जम्मू में खेलो इंडिया में एक गोल्ड जीता। आंचल कुल्लू के मनाली से ताल्लुक रखती हैं। उनका जन्म 28 अगस्त 1996 को हुआ। आंचल ठाकुर ने 2018 में तुर्की में कांस्य पदक और 2021 में मोंटेनेग्रो में एक और कांस्य पदक जीतकर इतिहास रचा। दुबई में चार सिल्वर मेडल जीतकर भारत का नाम रोशन किया है। पांच साल की उम्र में खून जमा देने वाली ठंड, छह फीट बर्फ और घर से सोलंगनाला का तीन किलोमीटर का सफर। ऐसे हालात से जूझ कर प्रैक्टिस करने सोलंगनाला पहुंचना कठिन तो होता था लेकिन में पिता की अंगुली पकड़ते ही कठिन परिस्थितियां हल्की लगती थी।

बेसहारा महिलाओं को आश्रय दे रहीं विजया  
सोलन की विजया लांबा सरकारी नौकरी में होने के बावजूद विजया 15 वर्ष से बेसहारा महिलाओं का सहारा बन रही हैं। इस कार्य में उनके पति और बच्चे भी साथ दे रहे हैं। 15 वर्ष पहले उन्हें सड़क पर मानसिक रूप से बीमार बेसहारा महिला मिली। उन्होंने महिला को अपने घर लाया। उसका इलाज भी अपनी जेब से पैसे खर्च कर करवाने लगी। कुछ ही दिनों में महिला पूरी तरह ठीक हो गई और उन्होंने उसे एक घर भी दिलवा दिया। इसके बाद उन्होंने समाज सेवा और बेसहारा लोगों को सहारा देने की ठान ली। तब से लेकर अब तक इन्होंने 18 बेसहारा महिलाओं की मदद की है। विजया लांबा ने बताया कि बेसहारा महिलाओं और अन्य लोगों को अपने साथ ले जाती हैं। दवाएं और अन्य सुविधाएं भी तब तक देती हैं, जब तक वह ठीक नहीं हो जाते। विजया लांबा के इसी योगदान को देखते हुए इस बार महिला दिवस पर महिला एवं बाल विकास विभाग इन्हें सम्मानित करने जा रहा है।
 

158 अवाॅर्ड, संस्कृति की प्रचारक भी आश्वी
कांगड़ा की पंचरुखी तहसील के सलियाणा गांव की सात वर्षीय उभरती कलाकार आश्वी धीमान ने कम उम्र में बड़ी उपलब्धि हासिल की है। आश्वी धीमान को हिमाचली संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए जाना जाने लगा है। उन्होंने मात्र सात वर्ष की आयु में कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पहचान बनाई है। केवल 20 महीनों में ही 158 अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय अवाॅर्ड ले चुकी हैं। ओरिएंटल वर्ल्ड बुक आफ रिकाॅर्ड और यूनिवर्सल वर्ल्ड बुक ऑफ रिकाॅर्ड में भी नाम दर्ज करवा चुकी हैं। हाल ही में हिमाचल दिवस और गणतंत्र दिवस पर आश्वी को एक साथ दस सम्मान मिले। आश्वी हिमाचल की सांस्कृतिक विरासत को अपने प्रदर्शन के माध्यम से आगे बढ़ा रही हैं और प्रदेश की संस्कृति को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने का प्रयास कर रही हैं। आश्वी दूसरी की छात्रा हैं।

जूडो में बेटियों का हुनर निखार रहीं दिव्या
नेशनल सेंटर ऑफ एक्सीलेंस हमीरपुर महिला जूडो खिलाड़ियों की नई नर्सरी बनकर उभरा है। इस नर्सरी को तैयार करने का काम ओलंपियन दिव्या कर रही हैं। करीब ढाई वर्ष पहले बतौर सीनियर कोच सेंटर से जुड़ी दिव्या अब इसकी इंचार्ज हैं और उनकी अगुवाई में जिले की बेटियां राष्ट्रीय से लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर तक अपनी पहचान बना रही हैं। दिव्या के मार्गदर्शन में बीते एक वर्ष के दौरान सेंटर की चार जूडो खिलाड़ियों ने राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में पांच पदक जीते हैं। पिछले तीन वर्षों में जूडो में ही महिला खिलाड़ियों ने 14 पदक अपने नाम किए हैं। सेंटर के खिलाड़ियों ने अब तक कुल 33 पदक जीते हैं, इनमें से 27 पदक महिला खिलाड़ियों के खाते में हैं। वर्ष 2013 में उन्होंने कोच के रूप में कार्य शुरू किया। दिव्या बताती हैं कि स्कूल में जूडो खिलाड़ियों की कमी के चलते खेल शिक्षक ने उनका नाम भी प्रतियोगिता में डाल दिया था। वहीं, से खेल का सफर शुरू हुआ और फिर उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। 

जीनत ने 31 युवतियों के हाथ करवाए पीले
नाहन शहर के वार्ड नंबर एक ढाबों मोहल्ला की जीनत खान धर्म और जात देखे बिना जरूरतमंद लोगों की सहायता कर रही हैं। एक ओर जहां यह धार्मिक पर्वों में जरूरतमंद लोगों को राशन, पैसे, मिठाई, कपड़े और उपहार बांट रही हैं। वहीं बिना धर्म देखे जरूरतमंद लड़कियों की शादी भी करवा रही हैं। जीनत खान 18 साल से लोगों को मानवता और धार्मिक सद्भावना का पाठ पढ़ा रही हैं। वह हिंदुओं की दिवाली, लोहड़ी, करवाचौथ, होली पर समुदाय के लोगों को राशन, कपड़े, उपहार प्रदान करती हैं। वहीं, मुस्लिम पर्व ईद और राष्ट्रीय पर्वों गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस पर भी जरूरतमंद लोगों को खुशियां बांट रही हैं। इस कार्य में पेशे से ठेकेदार उनके पति शाहिद खान भी पूरा सहयोग कर रहे हैं। जीनत खान इन 18 वर्षों में हिंदू और मुस्लिम समुदाय से ताल्लुक रखने वाली जरूरतमंद 31 लड़कियों की शादी भी करवा चुकी हैं। शादी में कपड़े, फर्नीचर, भोजन जैसी अन्य व्यवस्थाएं पूरी की हैं।

जैविक बागवानी से दो लाख तक कमा रहीं सत्या
ठियोग के लाफूघाटी गांव की सत्या देवी जैविक बागवानी कर बागवानों के लिए मिसाल बनकर उभरी हैं। 55 वर्षीय सत्या देवी ने बताया कि जैविक बागवानी अपनाने से उनकी आय में भी 60 से 70 हजार रुपये सालाना तक की वृद्धि हुई है। साल में वह करीब डेढ़ से दो लाख रुपये वह कमा लेती हैं। आसपास की पंचायतों की महिलाएं भी सत्या देवी से जैविक बागवानी के तरीके सीखने के लिए आती हैं। सेब, प्लम, चेरी, अखरोट सहित जापानी फल के करीब 350 पौधे लगाए गए हैं। सेब के साथ वह मटर, राजमा फ्रांसबीन और धनिया की खेती भी करती हैं। 

नशे के खिलाफ महिलाओं की मुहिम बना पिंकी का अभियान
पिंकी शर्मा ने नशे जैसी गंभीर सामाजिक समस्या के खिलाफ मोर्चा संभाला है। बरमाणा क्षेत्र के लघट गांव की महिलाओं ने चिट्टे जैसे घातक नशे के खिलाफ जो साहसिक कदम उठाया। गांव में युवाओं के बीच नशे की समस्या को देखते हुए महिला मंडल की प्रधान पिंकी शर्मा के नेतृत्व में महिलाओं ने खुद आगे आकर जिम्मेदारी संभाली। महिलाओं ने गांव में रात-दिन गश्त शुरू की। महिलाओं की इस पहल की चर्चा धीरे-धीरे पूरे जिले और प्रदेश में फैल गई। चिट्टे के आदी युवाओं को रोकने पर महिला मंडल पर कई गंभीर धाराओं में पुलिस ने केस भी दर्ज किए। सरकार ने इस एफआईआर को निरस्त करने का आश्वासन दिया था, जो आज तक पूरा नहीं हुआ। 

चंपा ने मेलों में लड़ी कुश्ती, अब भारत के लिए खेल रहीं कबड्डी 
गांव के मेलों में कुश्ती के दांव आजमाने से शुरू हुआ सफर आज अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंच चुका है। चुराह उपमंडल के बघेईगढ़ गांव की चंपा ठाकुर ने कठिन परिस्थितियों और सीमित संसाधनों के बावजूद कबड्डी में जिले का नाम देशभर में रोशन कर रही हैं। चंपा ठाकुर बताती हैं कि उनके इस सफर में उनके पिता का सहयोग सबसे बड़ी ताकत रहा। राष्ट्रीय जूनियर कबड्डी प्रतियोगिता में चंपा ठाकुर ने गोल्ड मेडल जीता। पिता रमेश ठाकुर ने बताया कि उन्होंने हर कदम पर बेटी का हौसला बढ़ाया और आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। परिवार के इस समर्थन ने चंपा को हर चुनौती का सामना करने की ताकत दी। 

लाहौल-स्पीति में शासन और प्रशासन पर आधी आबादी की पूरी पकड़
लाहौल-स्पीति में शासन और प्रशासन की बागडोर पूरी तरह से महिलाओं के हाथ में है। जनप्रतिनिधियों से लेकर प्रशासनिक और पुलिस नेतृत्व तक महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां नारी शक्ति निभा रही है। राजनीतिक नेतृत्व की कमान विधायक अनुराधा राणा के हाथ में है। वहीं, जिला परिषद की अध्यक्ष बीना देवी हैं। 

प्रशासनिक स्तर पर उपायुक्त किरण भडाना जिले का नेतृत्व कर रही हैं, जबकि कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी पुलिस अधीक्षक शिवानी मेहला संभाल रही हैं। एसडीएम केलांग कुनिका एकर्ज, एसडीएम उदयपुर अलीशा चौहान, डीएसपी केलांग रश्मि शर्मा और एडीसी काजा शिखा सिमटिया अपने-अपने क्षेत्रों में प्रशासनिक जिम्मेदारियां निभा रही हैं। इस तरह जिले में शासन, प्रशासन और पुलिस व्यवस्था की प्रमुख कमान महिलाओं के हाथ में है। लाहौल-स्पीति में पहली बार किसी महिला को उपायुक्त के रूप में भी नियुक्ति मिली है। स्पीति उपमंडल काजा में भी एडीसी के पद पर महिला एचएएस अधिकारी शिखा सिमटिया तैनात हैं।

वन कटान, शराब परोसने पर लगाई पाबंदी
जनजातीय जिला लाहौल-स्पीति में महिलाएं केवल खेतीबाड़ी तक सीमित नहीं हैं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और समाज सुधार की अगुवाई भी कर रही हैं। घाटी की महिलाओं ने अपने स्तर पर जंगलों के कटान पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया है। कुछ पंचायतों में शादियों के दौरान शराब परोसने पर भी रोक लगा दी है। मूलिंग, क्वारिंग और मयाड़ सहित करीब एक दर्जन से अधिक महिला मंडलों ने जंगलों की कटाई पर सख्त रोक लगाने का निर्णय लिया है। महिलाओं के इस सामूहिक निर्णय के बाद कई क्षेत्रों में अवैध कटान पूरी तरह थम गया है। स्थानीय लोगों का कहना है कि इससे घाटी में जंगलों का दायरा धीरे-धीरे बढ़ने लगा है और पर्यावरण संतुलन को मजबूती मिल रही है। इसी तरह थिरोट और क्वारिंग महिला मंडलों ने शादियों में शराब परोसने पर पाबंदी लगाने का फैसला किया है। जहालमा पंचायत की प्रधान कृष्णा देवी, गौशाल पंचायत के प्रधान अजीत और गोंदला पंचायत के प्रधान सूरज ठाकुर ने कहा कि लाहौल घाटी में महिलाएं पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक सुधार में अहम भूमिका निभा रही हैं। उपायुक्त किरण भड़ाना ने कहा कि लाहौल-स्पीति में महिलाओं के बिना विकास और पर्यावरण संरक्षण की कल्पना संभव नहीं है। वनमंडलाधिकारी इंद्रजीत सिरा ने बताया कि स्थानीय महिलाएं पिछले कई दशकों से जंगलों को बचाने में सकारात्मक भूमिका निभा रही हैं।  
 
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