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मौसम की मार : सेब के पेड़ों में फ्लावरिंग कम, पत्ते ज्यादा
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जिला के रोहड़ू और ठियोग सहित मध्यम ऊंचाई वाले क्षेत्र प्रभावित
उत्पादन प्रभावित होने की आशंका ने बढ़ाई बागवानों की चिंता
संवाद न्यूज एजेंसी
शिमला। जिले के ऊपरी क्षेत्रों में इस बार सेब के बगीचों में अपेक्षित फ्लावरिंग न होने से बागवानों की चिंता बढ़ गई है। मौसम में आए असामान्य बदलाव के कारण पेड़ों में फूल कम और पत्तों की संख्या अधिक देखी जा रही है जिससे आगामी सीजन की पैदावार पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
बीते कुछ दिनों से हो रही बारिश और बर्फबारी के कारण तापमान में काफी गिरावट आ गई है। कई पेड़ों में तो बिल्कुल भी फूल नहीं हैं जबकि कुछ में थोड़े बहुत फूल नजर आ रहे हैं। जिला के रोहड़ू, ठियोग और कोटखाई सहित अन्य क्षेत्रों के बगीचों में इस तरह की समस्या देखने को मिल रही है। इसकी वजह से बागवान परागण के लिए मधुमक्खियों के बॉक्स भी नहीं लगा पा रहे हैं। रोहडू के बागवान चंद्र कुमार और मनोहर वर्मा ने बताया कि मार्च के अंतिम सप्ताह तक जहां बगीचों में अच्छी फ्लावरिंग होनी चाहिए थी, वहीं इस बार कई क्षेत्रों में पेड़ पूरी तरह पत्तों से भर गए हैं और फूल बहुत कम दिखाई दे रहे हैं। ऐसे में फसल उत्पादन को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है। यह स्थिति खासतौर पर मध्यम ऊंचाई वाले इलाकों में अधिक देखने को मिल रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि सेब की अच्छी पैदावार के लिए ठंड के मौसम में पर्याप्त चिलिंग आवर्स जरूरी होते हैं। यदि यह अवधि पूरी नहीं होती तो पेड़ों में फ्लावरिंग प्रभावित होती है और पत्तों की वृद्धि अधिक हो जाती है। इस साल मौसम में अनियमितता के चलते यही स्थिति देखने को मिल रही है। बीते कुछ दिनों से हुई बारिश और हिमपात के कारण तापमान में काफी गिरावट आ गई है। बागवानों का कहना है कि यदि आने वाले दिनों में मौसम अनुकूल नहीं रहा तो इसका सीधा असर उत्पादन पर पड़ेगा। कम फ्लावरिंग का मतलब है कि फल भी कम लगेंगे जिससे आमदनी प्रभावित हो सकती है।
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कोट
बीते वर्ष समय से पहले पत्तियां झड़ना कम फ्लावरिंग का मुख्य कारण
इस बार बगीचों में सेब के पेड़ों में कम फूल आने का मुख्य कारण यह है कि पिछले वर्ष क्रॉप ज्यादा होने की वजह से सेब की पत्तियां समय से पहले झड़ गई थीं। वहीं उसके कुछ समय बाद दोबारा नई पत्तियां और फूल आ गए थे जिसकी वजह से इस बार कम फ्लावरिंग हो रही है। इसकी सीधा असर पैदावार पर पड़ सकता है। इसके लिए विभाग की ओर से जारी शेड्युल को अपनाएं जिससे अगले वर्ष के लिए इस समस्या का निदान हो सकेगा।
-डॉ. उषा शर्मा, वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रभारी, कृषि विज्ञान केंद्र शिमला
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उत्पादन प्रभावित होने की आशंका ने बढ़ाई बागवानों की चिंता
संवाद न्यूज एजेंसी
शिमला। जिले के ऊपरी क्षेत्रों में इस बार सेब के बगीचों में अपेक्षित फ्लावरिंग न होने से बागवानों की चिंता बढ़ गई है। मौसम में आए असामान्य बदलाव के कारण पेड़ों में फूल कम और पत्तों की संख्या अधिक देखी जा रही है जिससे आगामी सीजन की पैदावार पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
बीते कुछ दिनों से हो रही बारिश और बर्फबारी के कारण तापमान में काफी गिरावट आ गई है। कई पेड़ों में तो बिल्कुल भी फूल नहीं हैं जबकि कुछ में थोड़े बहुत फूल नजर आ रहे हैं। जिला के रोहड़ू, ठियोग और कोटखाई सहित अन्य क्षेत्रों के बगीचों में इस तरह की समस्या देखने को मिल रही है। इसकी वजह से बागवान परागण के लिए मधुमक्खियों के बॉक्स भी नहीं लगा पा रहे हैं। रोहडू के बागवान चंद्र कुमार और मनोहर वर्मा ने बताया कि मार्च के अंतिम सप्ताह तक जहां बगीचों में अच्छी फ्लावरिंग होनी चाहिए थी, वहीं इस बार कई क्षेत्रों में पेड़ पूरी तरह पत्तों से भर गए हैं और फूल बहुत कम दिखाई दे रहे हैं। ऐसे में फसल उत्पादन को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है। यह स्थिति खासतौर पर मध्यम ऊंचाई वाले इलाकों में अधिक देखने को मिल रही है।
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विशेषज्ञों का मानना है कि सेब की अच्छी पैदावार के लिए ठंड के मौसम में पर्याप्त चिलिंग आवर्स जरूरी होते हैं। यदि यह अवधि पूरी नहीं होती तो पेड़ों में फ्लावरिंग प्रभावित होती है और पत्तों की वृद्धि अधिक हो जाती है। इस साल मौसम में अनियमितता के चलते यही स्थिति देखने को मिल रही है। बीते कुछ दिनों से हुई बारिश और हिमपात के कारण तापमान में काफी गिरावट आ गई है। बागवानों का कहना है कि यदि आने वाले दिनों में मौसम अनुकूल नहीं रहा तो इसका सीधा असर उत्पादन पर पड़ेगा। कम फ्लावरिंग का मतलब है कि फल भी कम लगेंगे जिससे आमदनी प्रभावित हो सकती है।
कोट
बीते वर्ष समय से पहले पत्तियां झड़ना कम फ्लावरिंग का मुख्य कारण
इस बार बगीचों में सेब के पेड़ों में कम फूल आने का मुख्य कारण यह है कि पिछले वर्ष क्रॉप ज्यादा होने की वजह से सेब की पत्तियां समय से पहले झड़ गई थीं। वहीं उसके कुछ समय बाद दोबारा नई पत्तियां और फूल आ गए थे जिसकी वजह से इस बार कम फ्लावरिंग हो रही है। इसकी सीधा असर पैदावार पर पड़ सकता है। इसके लिए विभाग की ओर से जारी शेड्युल को अपनाएं जिससे अगले वर्ष के लिए इस समस्या का निदान हो सकेगा।
-डॉ. उषा शर्मा, वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रभारी, कृषि विज्ञान केंद्र शिमला