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Himachal: सेवा में आने के दो साल बाद जन्मतिथि में नहीं की जा सकती संशोधन की मांग, पढ़ें हाईकोर्ट के बड़े फैसले

Fri, 14 Aug 2026 06:15 AM IST
Krishan Singh संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला।
संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला। Published by: Krishan Singh Updated Fri, 14 Aug 2026 06:15 AM IST
सार

प्रदेश उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि सरकारी सेवा में आने के बाद जन्मतिथि में बदलाव के लिए नियम तय हैं और इसके तहत निर्धारित दो साल की समयावधि का कड़ाई से पालन किया जाना चाहिए। 

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विस्तार

हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि सरकारी सेवा में आने के बाद जन्मतिथि में बदलाव के लिए नियम तय हैं और इसके तहत निर्धारित दो साल की समयावधि का कड़ाई से पालन किया जाना चाहिए। प्रशिक्षित स्नातक शिक्षक (टीजीटी) सुरेश कुमार ने अपनी जन्मतिथि स्कूल और सेवा रिकॉर्ड में 30 अगस्त 1968 की बजाय एक अगस्त 1969 दर्ज होने का दावा करते हुए सिविल सूट दायर किया था। शिक्षक ने अदालत को बताया कि उसने एक ज्योतिषी को अपनी कुंडली दिखाई थी, जिसने उसकी सही जन्मतिथि एक सितंबर 1969 बताई। इसके बाद उसने संशोधन के लिए आवेदन किया था।

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निचली अदालत ने शिक्षक का दावा खारिज कर दिया था, लेकिन प्रथम अपीलीय अदालत ने शिक्षक के पक्ष में फैसला सुनाते हुए अपील मंजूर कर ली। न्यायमूर्ति राकेश कैंथला की अदालत ने सरकार की अपील पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि एचपी फाइनेंशियल रूल्स के नियम 7.1 के तहत सेवा में आने के 2 साल के भीतर ही जन्मतिथि में सुधार के लिए आवेदन करना अनिवार्य है। अदालत ने यह भी माना कि वर्ष 1985 में मैट्रिकुलेशन सर्टिफिकेट मिलने के तीन साल के भीतर या वयस्क होने के बाद तय समय सीमा में दावा न किए जाने के कारण यह मामला परिसीमन (लिमिटेशन) के दायरे से भी बाहर था। हाईकोर्ट ने प्रथम अपीलीय अदालत के फैसले को रद्द करते हुए निचली अदालत के फैसले को बहाल कर दिया और राज्य सरकार की अपील को मंजूर कर लिया है।

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ठेकेदारों पर जिम्मेदारी डाल पीड़ित परिवार को बेसहारा नहीं छोड़ सकते
वहीं हाईकोर्ट ने सिरमौर जिले में बिजली बोर्ड में काम के दौरान करंट लगने से हुई कर्मचारी की मौत के मामले में कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने मृतक की पत्नी की ओर से भेजे गए पत्र पर स्वतः संज्ञान लेते हुए जनहित याचिका दर्ज की है। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की पीठ ने बिजली बोर्ड की ओर से निजी ठेकेदारों पर जिम्मेदारी टालने की प्रवृत्ति पर गंभीर सवाल उठाए हैं। अदालत ने मामले में नोटिस जारी करते हुए जवाब तलब किया है। अगली सुनवाई 23 सितंबर को होगी। उल्लेखनीय है कि बिजली बोर्ड में बतौर इलेक्ट्रिशियन कार्यरत बारू राम की पांच जुलाई 2026 को काम करते समय चालू बिजली लाइन के संपर्क में आने से मौत हो गई थी। पत्नी की ओर से अदालत को एक भेजे गए प्रतिवेदन भेजा गया है, जिस पर अदालत ने यह संज्ञान लिया है। अदालत के समक्ष बिजली बोर्ड की ओर से दी गई टिप्पणियों में कहा गया कि यह काम निजी कंपनी को सौंपा गया था, जो अपनी संयुक्त उद्यम ठेकेदार कंपनी एआईआरएफ इंजीनियर प्राइवेट लिमिटेड और सब-कांट्रेक्टर निहाल इंफ्राटेक के माध्यम से काम करवा रही थी। अदालत ने इस रवैये पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि यह स्पष्ट है कि मृतक का परिवार पूरी तरह से बिना किसी राहत के रह गया है। बिजली बोर्ड सुरक्षा मानकों और वैधानिक दायित्वों की अनदेखी कर निजी ठेकेदारों पर जिम्मेदारी टाल रहा है, इसके कारण बारू राम की जान गई।

नालागढ़ में औद्योगिक क्षेत्र के लिए अधिग्रहित भूमि का मुआवजा संशोधित
प्रदेश उच्च न्यायालय ने बद्दी (नालागढ़) के बिलांवाली लबाना गांव में औद्योगिक क्षेत्र के विकास के लिए अधिग्रहित भूमि के मुआवजे से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। न्यायमूर्ति सुशील कुकरेजा की अदालत ने हिमाचल प्रदेश स्टेट इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन और अन्य की ओर से दायर अपीलों का निपटारा करते हुए निचली अदालत के मुआवजे के फैसले में संशोधन किया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि चूंकि पूरी भूमि को एक सार्वजनिक उद्देश्य (औद्योगिक क्षेत्र के विकास) के लिए एक एकल इकाई के रूप में अधिग्रहित किया गया था, इसलिए भूमि की किस्म और वर्गीकरण का महत्व समाप्त हो जाता है। इसके चलते मालिकों को उनकी भूमि के वर्गीकरण से परे 7,60,680 रुपये प्रति बीघा की एक समान दर से मुआवजा दिया जाएगा। कलेक्टर की ओर से आंकी गई सर्वोत्तम गुणवत्ता वाली भूमि के एक वर्ष के औसत मूल्य (8,45,200 रुपये प्रति बीघा) को आधार बनाते हुए, विकास शुल्क के रूप में 10 प्रतिशत की कटौती के बाद बाजार मूल्य 7,60,680 रुपये प्रति बीघा निर्धारित किया गया है। अदालत ने दोहराया कि जब भूमि को एक साझा सार्वजनिक उद्देश्य के लिए अधिग्रहित किया जाता है, तो विभिन्न श्रेणियों या सड़क से दूरी के आधार पर मुआवजे में अंतर नहीं किया जा सकता।

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