हिमाचल प्रदेश: हाईकोर्ट की टिप्पणी, इंदौरा पंचायत समिति चुनाव रोकना तानाशाही की छाप
अदालत ने कहा कि निष्पक्षता के नाम पर कार्यकारी शक्तियों का ऐसा प्रयोग तानाशाही की छाप छोड़ता है, जो चुनी हुई लोकतांत्रिक संस्थाओं के काम में सीधा रोड़ा है।
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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने पंचायत समिति इंदौरा के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का चुनाव रोकने पर कड़ा संज्ञान लिया है। न्यायाधीश ज्योत्सना रिवाल दुआ की अदालत ने उपमंडल अधिकारी (नागरिक)/कार्यकारी मजिस्ट्रेट इंदौरा के चुनाव टालने के फैसले को पूर्णतः शक्तिहीन, गैरकानूनी और लोकतांत्रिक सिद्धांतों के खिलाफ करार दिया है।
अदालत ने कहा कि पंचायती राज अधिनियम, 1994 के तहत किसी अधिकारी को शिकायत या जांच के नाम पर चुनाव रोकने का अधिकार नहीं है। चुनाव में धांधली या भ्रष्ट आचरण के आरोपों का निपटारा केवल चुनाव संपन्न होने के बाद चुनाव याचिका से ही हो सकता है।
अदालत ने कहा कि निष्पक्षता के नाम पर कार्यकारी शक्तियों का ऐसा प्रयोग तानाशाही की छाप छोड़ता है, जो चुनी हुई लोकतांत्रिक संस्थाओं के काम में सीधा रोड़ा है। अदालत ने राज्य सरकार के उस तर्क को खारिज कर दिया है, जिसमें कहा गया था कि एसडीएम ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 14 के तहत कार्यकारी मजिस्ट्रेट की शक्तियों का प्रयोग करते हुए निष्पक्षता बनाए रखने के लिए एसडीपीओ इंदौरा की जांच रिपोर्ट का इंतजार किया।
मामले की सुनवाई के दौरान अधिकारियों ने बताया कि जांच में कोई सबूत न मिलने पर चुनाव की तिथि 13 अगस्त तय कर दी गई है। हाईकोर्ट ने चुनाव कराने का निर्देश देते हुए मुख्य सचिव के माध्यम से सभी संबंधित अधिकारियों को इस फैसले की प्रति भेजने का आदेश दिया, जिससे भविष्य में इस तरह शक्तियों का दुरुपयोग न हो।
उल्लेखनीय है कि पंचायत समिति इंदौरा में चुनाव के बाद 26 निर्वाचित सदस्यों ने 8 जून को शपथ ली। इसके तुरंत बाद अध्यक्ष/उपाध्यक्ष का चुनाव होना था, लेकिन एक बाहरी व्यक्ति द्वारा धनबल और हॉर्स-ट्रेडिंग की शिकायत के आधार पर एसडीएम ने चुनाव की तारीख तय नहीं की। इस देरी के खिलाफ सदस्य अंकुश इंदौरिया ने याचिका दायर की थी।