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Himachal: हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला, बेटियों का पैतृक संपत्ति पर बेटों के समान ही जन्मजात अधिकार

Thu, 13 Aug 2026 05:00 AM IST
Krishan Singh संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला।
संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला। Published by: Krishan Singh Updated Thu, 13 Aug 2026 05:00 AM IST
सार

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हिंदू उत्तराधिकारी संशोधन अधिनियम -2005 के लागू होने से पहले जन्मी बेटी भी पैतृक संपत्ति में बेटे के समान अधिकार रखती है। इसके लिए यह जरूरी नहीं है कि संशोधन लागू होने की तारीख 9 सितंबर 2005 को उसके पिता जीवित रहे हों। 

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Significant himachal High Court ruling: Daughters have the same birthright as sons in ancestral property
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने पैतृक और संयुक्त हिंदू परिवार की संपत्ति पर बेटियों के अधिकार को लेकर अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हिंदू उत्तराधिकारी संशोधन अधिनियम -2005 के लागू होने से पहले जन्मी बेटी भी पैतृक संपत्ति में बेटे के समान अधिकार रखती है। इसके लिए यह जरूरी नहीं है कि संशोधन लागू होने की तारीख 9 सितंबर 2005 को उसके पिता जीवित रहे हों। न्यायमूर्ति राकेश कैंथला ने यह फैसला रोशन लाल (मृतक) के कानूनी वारिस बनाम बीरबल एवं अन्य मामले में सुनाया। कोर्ट ने निचली अपीलीय अदालत के फैसले में खामी न पाते हुए अपील खारिज कर दी।

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एक पक्ष की थी ये दलील
मामला मूल रूप से करतार चंद की संपत्ति के बंटवारे और उत्तराधिकार से जुड़ा है। सुनवाई के दौरान दूसरे पक्ष की ओर से दलील दी गई कि संपत्ति का मौखिक या पारिवारिक बंटवारा पहले ही हो चुका है। हिंदू उत्तराधिकार संशोधन अधिनियम 2005 केवल भविष्य के लिए (प्रोस्पेक्टिव) है, इसलिए यह पुराने मामलों या मृत पिता की संपत्तियों पर लागू नहीं होता। हाईकोर्ट ने इन तर्कों को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि कानूनन बेटियों को बेटों के समान जन्म से ही सहदायिकी (कोपार्शनरी) का दर्जा प्राप्त है। इसका अर्थ यह है कि बेटा हो या बेटी, दोनों का पैतृक संपत्ति पर समान अधिकार और दायित्व है।

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कोर्ट ने इन फैसले का हवाला दिया
विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा मामले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि सहदायिकी का अधिकार जन्म से मिलता है, इसलिए यह आवश्यक नहीं है कि अधिनियम में संशोधन लागू होने की तिथि पर बेटी के पिता जीवित हों। यदि बेटी का जन्म संशोधन से पहले हुआ है तो भी वह 9 सितंबर 2005 से इस अधिकार का दावा कर सकती है, बशर्ते कि उससे पहले कोई वैध और कानूनी रूप से पंजीकृत पारिवारिक विभाजन या संपत्ति का निपटान 20 दिसंबर 2004 से पहले न हुआ हो। अदालत ने स्पष्ट किया कि पूर्ववर्ती अदालतों और अपीलीय फैसलों में संपत्ति को संयुक्त हिंदू परिवार की सहदायिकी संपत्ति माना था, इसलिए बेटी भी बेटों की भांति अपने हिस्से की हकदार होगी।

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बेटियों के पैतृक संपत्ति के अधिकारों को लेकर कोई संशय नहीं रहना चाहिए: कोर्ट
निचली अदालत और प्रथम अपीलीय अदालत के तर्कों को सही मानते हुए हाईकोर्ट ने अपीलकर्ताओं की उस दलील को खारिज कर दिया, जिसमें बेटियों के अधिकार सीमित होने का दावा किया जा रहा था। हाईकोर्ट के इस फैसले के साथ ही यह कानूनी स्थिति साफ हो गई है कि बेटियों के पैतृक संपत्ति के अधिकारों को लेकर कोई संशय नहीं रहना चाहिए। बेटियां परिवार की बराबर की साझीदार हैं और उन्हें जन्मजात सहदायिकी का अधिकार प्राप्त है।

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