MGNREGA: हिमाचल में मनरेगा योजना के नए स्वरूप की होगी समीक्षा, रिपोर्ट तय करेगी आगे की राह
मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने योजना का अध्ययन कर प्रदेश के हितों के अनुरूप सुझाव तैयार करने के लिए पंचायती राज मंत्री अनिरुद्ध सिंह की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय समिति गठित करने के निर्देश दिए हैं।
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हिमाचल प्रदेश सरकार केंद्र सरकार की वीबी-जीराम-जी (मनरेगा के नए स्वरूप) योजना की विस्तृत समीक्षा करेगी। मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने योजना का अध्ययन कर प्रदेश के हितों के अनुरूप सुझाव तैयार करने के लिए पंचायती राज मंत्री अनिरुद्ध सिंह की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय समिति गठित करने के निर्देश दिए हैं। समिति में पंचायती राज विभाग के सचिव सी. पालरासू और निदेशक राघव शर्मा को भी सदस्य बनाया गया है। यह समिति 29 जून तक अपनी रिपोर्ट सौंपेगी, जिसके आधार पर राज्य सरकार नई योजना को लागू करने पर अंतिम निर्णय लेगी।
केंद्र सरकार के समक्ष मजबूती से उठाया जाएगा मामला
राज्य सरकार इस मुद्दे को केंद्र सरकार के समक्ष भी मजबूती से उठाएगी और योजना के तहत मिलने वाली राशि अग्रिम रूप से उपलब्ध कराने की मांग करेगी, ताकि मजदूरों के वेतन भुगतान में किसी प्रकार की बाधा न आए। राज्य सरकार का दावा है कि मनरेगा की जगह वीबी-जीराम-जी योजना लागू होने से हिमाचल प्रदेश के करीब 12 लाख श्रमिकों के हित प्रभावित हो सकते हैं। केंद्र सरकार ने सभी राज्यों को 30 जून तक नई योजना अधिसूचित करने के निर्देश दिए हैं और स्पष्ट किया है कि केवल अधिसूचना जारी करने वाले राज्यों को ही बजट आवंटित किया जाएगा।
हिमाचल सरकार का ये कहना
हिमाचल सरकार का कहना है कि वर्तमान स्वरूप में योजना के कई प्रावधान प्रदेश की भौगोलिक परिस्थितियों और श्रमिकों की आवश्यकताओं के अनुरूप नहीं हैं। मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को केंद्र सरकार के समक्ष राज्य का पक्ष प्रभावी ढंग से रखने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने कहा कि ग्रामीण श्रमिकों की आजीविका से जुड़े किसी भी विषय पर राज्य सरकार कोई समझौता नहीं करेगी। वर्तमान में हिमाचल के गैर-जनजातीय क्षेत्रों में मनरेगा मजदूरी दर 247 रुपये प्रतिदिन और जनजातीय क्षेत्रों में 309 रुपये प्रतिदिन है। सरकार का मानना है कि प्रदेश की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों, बढ़ती महंगाई और जीवन-यापन की लागत को देखते हुए यह दर पर्याप्त नहीं है। इसलिए केंद्र से मजदूरी दर में वृद्धि की मांग की जाएगी।
डिमांड आधारित नहीं रहना चाहिए योजना का मूल स्वरूप
मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि रोजगार गारंटी योजना का मूल स्वरूप मांग आधारित (डिमांड-बेस्ड) ही रहना चाहिए, जैसा कि मनरेगा में था। ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार उपलब्ध कराने की व्यवस्था किसी निर्धारित सीमा से बंधी नहीं होनी चाहिए। वर्ष 2024-25 में हिमाचल प्रदेश में मनरेगा के तहत लगभग 395 लाख मानव दिवस सृजित किए गए थे, जबकि वर्ष 2025-26 के लिए केंद्र सरकार ने केवल 250 लाख मानव दिवस का लक्ष्य निर्धारित किया है। सरकार का दावा है योजना के प्रस्तावित प्रावधानों के तहत यह संख्या और भी सीमित हो सकती है।
आउटसोर्स पर नियुक्त कर्मियों के भविष्य पर भी संकट
वर्तमान में योजना के तहत 1,194 कर्मचारी स्कीम आधारित, अनुबंध या आउटसोर्स आधार पर सेवाएं दे रहे हैं। मुख्यमंत्री ने कहा कि नई प्रणाली में इनके वेतन भुगतान और सेवा सुरक्षा को लेकर अनिश्चितता की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। वीबी-जीराम-जी के तहत केंद्र से मिलने वाला धन सीमित होगा और यह राशि एसएनए-स्पर्श प्रणाली के माध्यम से सीधे आएगी, न कि राज्य सरकार की ट्रेजरी में। इससे कर्मचारियों के वेतन भुगतान में कठिनाई होगी।