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पचास साल की उम्र के बाद यह काम हो सकता है खतरनाक

Sat, 20 Sep 2014 03:31 PM IST
Updated Sat, 20 Sep 2014 03:31 PM IST
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mantra japa after 50 year

पचास साल की उम्र तक पहुंचते पहुंचते मंत्रों का सस्वर पाठ बंद कर देना चाहिए। सिर्फ उपांशु अर्थात होंठ हिलते रहें और उच्चारण न हों, या मानस जब अर्थात होंठ भी न हिलें और मन ही मन जप तो किया जा सकता है पर मंत्र का उच्चारण करते हुए जप नहीं करना चाहिए।

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कारण बताते हुए वेदों के मर्मज्ञ श्रीपाद दामोदर सातवलेकर कहा करते थे कि मंत्रों का उच्चारण शुद्धता पूर्वक होना चाहिए। अगर उच्चारण में कहीं भी कोई गड़बड़ी हुई तो अनिष्ट और अनर्थ हो सकता है।
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उम्र बढ़ने के साथ स्वर तंत्रों के विकृत हो जाने की बात कहते हुए आयुर्वेद के मर्मज्ञ वैद्यराज जानकी शरण शर्मा ने कुछ रोगियों का हवाला दिया है।

कुछ रोगियों का उपचार करते हुए उन्होंने श्वास (अस्थमा), संधिवात (रूमेटिज्म) और हृदय रोग के शिकार लोगों के अनुभव बताए। रोग का कोई कारण समझ नहीं आ रहा था, अचानक उनका ध्यान रोगियों के दैनंदिन जीवन पर गया।

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जाप से रोग का क्या संबंध है?

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उनके दैनंदिन जीवन की जांच करते हुए उन्होंने पाया कि साधना उपासना के दौरान वे कुछ बीजमंत्रों का वाचिक जाप करते हैं। इससे दिक्कत हो रही है। वैद्यराज जानकी जी ने उन रोगियों से जाप रोकने को कहा और देखा कि कुछ ही दिनों में आराम होने लगा है।

जाप से रोग का क्या संबंध है? इसके उत्तर में जानकी जी का कहना है कि वाचिक जप में होठों के साथ, जीभ, दांत, तालु, नासिका, मूर्धा और कंठ आदि अंगों का उपयोग भी होता है।

उम्र बढ़ने पर ये अंग भी कमजोर होने लगते हैं। इस कारण मंत्रों का ठीक से उच्चारण नहीं हो पाता। उनमे विकार आने लगता है। विकृत उच्चारण से मंत्र कोई लाभ पहुंचाने के बजाय नुकसान देने लगता हैं।


इसलिए मंत्रों का बोल कर जप नहीं करना चाहिए

mantra japa after 50 year

इसलिए पचास के बाद आमतौर पर मंत्रों का बोल कर जप नहीं करना चाहिए। शास्त्रों ने इस उम्र में किसी भी तरह की नई और कठोर साधनाओं के लिए मना किया है।

आचार्य भगवानदेव एक छोटे से उदाहरण से समझाते हुए कहा है कि बढ़ती उम्र में दांत कमजोर पड़ने लगते हैं, जीभ लड़खड़ाने लगती है। मुंह मे ज्यादा लार बनने लगती है।

जो सोच समझ सकते हैं, उन्हें अपने अंग प्रत्यंगो में आए विकारों का ध्यान रखते हुए भी नई साधनाएं नहीं करना चाहिए। खासतौर पर इस तरह की साधनाओं से बचना ही चाहिए जिनमें स्वर और उन पर होने वाला बल आघात पर जोर दिया जाता हैं।


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