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कौन हैं परवीन हुड्डा: 22 महीने का प्रतिबंध लगा, ओलंपिक का सपना टूटा...फिर किस तरह किया कमबैक और जीता स्वर्ण?
Fri, 02 Oct 2026 05:00 PM IST
स्वप्निल शशांक
स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला, आइची नागोया
स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला, आइची नागोया
Published by: स्वप्निल शशांक
Updated Fri, 02 Oct 2026 05:00 PM IST
सार
पदक छिनने, 22 महीने के प्रतिबंध और पेरिस ओलंपिक से बाहर होने के बाद परवीन हुड्डा ने 838 दिन बाद अंतरराष्ट्रीय बॉक्सिंग में वापसी की थी। वजन वर्ग बदला, खुद को फिर तैयार किया और अब एशियन गेम्स में 65 किग्रा वर्ग का स्वर्ण जीतकर अपनी अधूरी कहानी पूरी कर दी।
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परवीन हुड्डा
- फोटो : IANS
विस्तार
कभी स्कूल में लड़कों से भिड़ने वाली एक लड़की... फिर बॉक्सिंग रिंग में लड़ना सीखा। पिता बीमारी से जूझे तो बेटी ने रिंग में अपने सपने के लिए लड़ाई जारी रखी। एशियन गेम्स में पदक जीता, लेकिन बाद में वही पदक छिन गया। 22 महीने का प्रतिबंध लगा और पेरिस ओलंपिक खेलने का सपना भी टूट गया, लेकिन परवीन हुड्डा की कहानी का अंत वहां नहीं हुआ। 838 दिन तक अंतरराष्ट्रीय बॉक्सिंग से दूर रहने के बाद वापसी की और अब एशियन गेम्स में स्वर्ण पदक जीत लिया। 65 किग्रा वर्ग के फाइनल में जीत के साथ परवीन ने उस कहानी को नया अंत दिया, जिसमें कुछ समय पहले सब कुछ खत्म होता नजर आ रहा था।
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परवीन हुड्डा
- फोटो : PTI
स्कूल की लड़ाइयों से बॉक्सिंग रिंग तक
15 अप्रैल 2000 को हरियाणा के रोहतक के पास रुड़की गांव में जन्मीं परवीन का परिवार आर्थिक मुश्किलों से जूझता था। उनके पिता लखपत सिंह स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों के कारण भारी काम नहीं कर पाते थे। परिवार की आमदनी जमीन और भैंस के दूध की बिक्री से चलती थी। स्कूल में परवीन पढ़ाई में अच्छी थीं और उन्हें क्लास मॉनिटर भी बनाया गया था। लेकिन उनका स्वभाव तेज था। वह अक्सर अपनी कक्षा के लड़कों से भिड़ जाती थीं। कुछ लड़ाइयों में हारने के बाद उनके मन में विचार आया कि अगर लड़ना है तो सही तरीके से लड़ना सीखना चाहिए।
2011 में गांव के सरपंच सुधीर हुड्डा ने युवाओं को नशे और बेरोजगारी से दूर रखने के लिए मुफ्त हैंडबॉल और बॉक्सिंग अकादमी शुरू की। टीवी पर मैरी कॉम और विजेंदर सिंह जैसे मुक्केबाजों को देखकर परवीन पहले ही प्रभावित थीं। उन्होंने पिता से अकादमी जाने की अनुमति मांगी और यहीं से उनका बॉक्सिंग सफर शुरू हुआ।
15 अप्रैल 2000 को हरियाणा के रोहतक के पास रुड़की गांव में जन्मीं परवीन का परिवार आर्थिक मुश्किलों से जूझता था। उनके पिता लखपत सिंह स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों के कारण भारी काम नहीं कर पाते थे। परिवार की आमदनी जमीन और भैंस के दूध की बिक्री से चलती थी। स्कूल में परवीन पढ़ाई में अच्छी थीं और उन्हें क्लास मॉनिटर भी बनाया गया था। लेकिन उनका स्वभाव तेज था। वह अक्सर अपनी कक्षा के लड़कों से भिड़ जाती थीं। कुछ लड़ाइयों में हारने के बाद उनके मन में विचार आया कि अगर लड़ना है तो सही तरीके से लड़ना सीखना चाहिए।
2011 में गांव के सरपंच सुधीर हुड्डा ने युवाओं को नशे और बेरोजगारी से दूर रखने के लिए मुफ्त हैंडबॉल और बॉक्सिंग अकादमी शुरू की। टीवी पर मैरी कॉम और विजेंदर सिंह जैसे मुक्केबाजों को देखकर परवीन पहले ही प्रभावित थीं। उन्होंने पिता से अकादमी जाने की अनुमति मांगी और यहीं से उनका बॉक्सिंग सफर शुरू हुआ।
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25 किलो से भी कम वजन, ग्लव्स खरीदना भी मुश्किल
जब परवीन ने बॉक्सिंग शुरू की, तब उनका वजन 25 किलो से भी कम था। वह इतनी छोटी थीं कि कई बार कोच भी उन्हें नजरअंदाज कर देते थे। परिवार के लिए बॉक्सिंग ग्लव्स खरीदना भी आसान नहीं था। लेकिन रिंग में उनकी तेजी अलग नजर आती थी। वह विरोधी को आगे आने देतीं, उसके पंच से बचतीं और फिर तेजी से काउंटर करती थीं। धीरे-धीरे यही उनकी बॉक्सिंग शैली की पहचान बन गई।
2019 में मिली बड़ी पहचान
परवीन को बड़ी पहचान 2019 में मिली, जब सीनियर नेशनल ट्रायल्स में उन्होंने अनुभवी मुक्केबाज सरिता देवी को हरा दिया। इसके बाद उनका अंतरराष्ट्रीय सफर तेजी से आगे बढ़ा। 2019 में उन्होंने नेपाल में दक्षिण एशियाई खेलों का स्वर्ण जीता। 2021 में वह 63 किग्रा वर्ग में सीनियर नेशनल चैंपियन बनीं। 2022 में उन्होंने इस्तांबुल में आईबीए महिला विश्व मुक्केबाजी चैंपियनशिप में कांस्य और जॉर्डन में एशियाई बॉक्सिंग चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीता।
जब परवीन ने बॉक्सिंग शुरू की, तब उनका वजन 25 किलो से भी कम था। वह इतनी छोटी थीं कि कई बार कोच भी उन्हें नजरअंदाज कर देते थे। परिवार के लिए बॉक्सिंग ग्लव्स खरीदना भी आसान नहीं था। लेकिन रिंग में उनकी तेजी अलग नजर आती थी। वह विरोधी को आगे आने देतीं, उसके पंच से बचतीं और फिर तेजी से काउंटर करती थीं। धीरे-धीरे यही उनकी बॉक्सिंग शैली की पहचान बन गई।
2019 में मिली बड़ी पहचान
परवीन को बड़ी पहचान 2019 में मिली, जब सीनियर नेशनल ट्रायल्स में उन्होंने अनुभवी मुक्केबाज सरिता देवी को हरा दिया। इसके बाद उनका अंतरराष्ट्रीय सफर तेजी से आगे बढ़ा। 2019 में उन्होंने नेपाल में दक्षिण एशियाई खेलों का स्वर्ण जीता। 2021 में वह 63 किग्रा वर्ग में सीनियर नेशनल चैंपियन बनीं। 2022 में उन्होंने इस्तांबुल में आईबीए महिला विश्व मुक्केबाजी चैंपियनशिप में कांस्य और जॉर्डन में एशियाई बॉक्सिंग चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीता।
पिता कैंसर से लड़ रहे थे, बेटी रिंग में
2023 में हांगझोउ एशियन गेम्स से पहले परवीन को पता चला कि उनके पिता गले के तीसरे चरण के कैंसर से जूझ रहे हैं। परवीन ट्रेनिंग छोड़ने के बारे में सोचने लगी थीं। लेकिन पिता ने उन्हें रिंग में लड़ते रहने के लिए कहा। पिता बीमारी से लड़ रहे थे और बेटी अपने सपने के लिए रिंग में उतर रही थी। परवीन ने हांगझोऊ एशियन गेम्स में सेमीफाइनल तक का सफर तय किया और कांस्य पदक पक्का किया। इसी प्रदर्शन के साथ उन्होंने पेरिस ओलंपिक का सीधा कोटा भी हासिल कर लिया। उन्हें लगा था कि मुश्किल दौर पीछे छूट गया है। लेकिन इसके बाद उनके करियर में ऐसा मोड़ आया, जिसकी उन्होंने कल्पना भी नहीं की होगी।
पदक छिना, प्रतिबंध लगा और ओलंपिक सपना टूटा
व्हेयरअबाउट्स से जुड़े तीन उल्लंघनों के कारण परवीन पर 22 महीने का प्रतिबंध लगा। इसके बाद हांगझोउ एशियन गेम्स का कांस्य पदक भी उनसे वापस ले लिया गया। प्रतिबंध का सबसे बड़ा असर उनके ओलंपिक सपने पर पड़ा। वह पेरिस ओलंपिक में हिस्सा नहीं ले सकीं। एक तरफ एशियन गेम्स का पदक हाथ से चला गया, दूसरी तरफ ओलंपिक में खेलने का सपना भी टूट गया। जिस समय उनका करियर ऊंचाई की ओर बढ़ रहा था, उसी समय उन्हें अंतरराष्ट्रीय रिंग से लंबी दूरी बनानी पड़ी।
2023 में हांगझोउ एशियन गेम्स से पहले परवीन को पता चला कि उनके पिता गले के तीसरे चरण के कैंसर से जूझ रहे हैं। परवीन ट्रेनिंग छोड़ने के बारे में सोचने लगी थीं। लेकिन पिता ने उन्हें रिंग में लड़ते रहने के लिए कहा। पिता बीमारी से लड़ रहे थे और बेटी अपने सपने के लिए रिंग में उतर रही थी। परवीन ने हांगझोऊ एशियन गेम्स में सेमीफाइनल तक का सफर तय किया और कांस्य पदक पक्का किया। इसी प्रदर्शन के साथ उन्होंने पेरिस ओलंपिक का सीधा कोटा भी हासिल कर लिया। उन्हें लगा था कि मुश्किल दौर पीछे छूट गया है। लेकिन इसके बाद उनके करियर में ऐसा मोड़ आया, जिसकी उन्होंने कल्पना भी नहीं की होगी।
पदक छिना, प्रतिबंध लगा और ओलंपिक सपना टूटा
व्हेयरअबाउट्स से जुड़े तीन उल्लंघनों के कारण परवीन पर 22 महीने का प्रतिबंध लगा। इसके बाद हांगझोउ एशियन गेम्स का कांस्य पदक भी उनसे वापस ले लिया गया। प्रतिबंध का सबसे बड़ा असर उनके ओलंपिक सपने पर पड़ा। वह पेरिस ओलंपिक में हिस्सा नहीं ले सकीं। एक तरफ एशियन गेम्स का पदक हाथ से चला गया, दूसरी तरफ ओलंपिक में खेलने का सपना भी टूट गया। जिस समय उनका करियर ऊंचाई की ओर बढ़ रहा था, उसी समय उन्हें अंतरराष्ट्रीय रिंग से लंबी दूरी बनानी पड़ी।
परवीन हुड्डा
- फोटो : twitter
838 दिन बाद फिर पहने बॉक्सिंग ग्लव्स
परवीन ने हार नहीं मानी। प्रतिबंध के दौरान उन्होंने खुद को दोबारा तैयार किया और वजन वर्ग बदलने का फैसला किया। 2025 वर्ल्ड बॉक्सिंग कप फाइनल्स में उन्होंने 838 दिन बाद अंतरराष्ट्रीय बॉक्सिंग में वापसी की। 60 किग्रा वर्ग में उतरते हुए उन्होंने स्वर्ण पदक जीता। यह सिर्फ एक टूर्नामेंट में वापसी नहीं थी। यह उस मुक्केबाज की वापसी थी, जिसने अपना एशियन गेम्स पदक खोया था, ओलंपिक का सपना टूटते देखा था और करीब दो साल तक अंतरराष्ट्रीय रिंग से दूर रही थी।
एशियन गेम्स में फिर आया वही जुनून
2026 एशियन गेम्स में परवीन 65 किग्रा वर्ग में उतरीं। यहां उन्होंने एक-एक मुकाबला जीतकर फाइनल का टिकट हासिल किया। क्वार्टर फाइनल में उनका सामना उज्बेकिस्तान की नवबखोर खामिदोवा से हुआ। परवीन ने शानदार प्रदर्शन करते हुए मुकाबला 5-0 से जीता और पदक पक्का किया। इसके बाद सेमीफाइनल में चीन की ली शू उनके सामने थीं। परवीन ने यहां भी दबदबा बनाए रखा और 5-0 की जीत के साथ फाइनल में जगह बनाई। अब उनके सामने सिर्फ एक मुकाबला था और दांव पर एशियन गेम्स का स्वर्ण पदक।
परवीन ने हार नहीं मानी। प्रतिबंध के दौरान उन्होंने खुद को दोबारा तैयार किया और वजन वर्ग बदलने का फैसला किया। 2025 वर्ल्ड बॉक्सिंग कप फाइनल्स में उन्होंने 838 दिन बाद अंतरराष्ट्रीय बॉक्सिंग में वापसी की। 60 किग्रा वर्ग में उतरते हुए उन्होंने स्वर्ण पदक जीता। यह सिर्फ एक टूर्नामेंट में वापसी नहीं थी। यह उस मुक्केबाज की वापसी थी, जिसने अपना एशियन गेम्स पदक खोया था, ओलंपिक का सपना टूटते देखा था और करीब दो साल तक अंतरराष्ट्रीय रिंग से दूर रही थी।
एशियन गेम्स में फिर आया वही जुनून
2026 एशियन गेम्स में परवीन 65 किग्रा वर्ग में उतरीं। यहां उन्होंने एक-एक मुकाबला जीतकर फाइनल का टिकट हासिल किया। क्वार्टर फाइनल में उनका सामना उज्बेकिस्तान की नवबखोर खामिदोवा से हुआ। परवीन ने शानदार प्रदर्शन करते हुए मुकाबला 5-0 से जीता और पदक पक्का किया। इसके बाद सेमीफाइनल में चीन की ली शू उनके सामने थीं। परवीन ने यहां भी दबदबा बनाए रखा और 5-0 की जीत के साथ फाइनल में जगह बनाई। अब उनके सामने सिर्फ एक मुकाबला था और दांव पर एशियन गेम्स का स्वर्ण पदक।
फाइनल में जीता गोल्ड, पूरी हुई अधूरी कहानी
फाइनल में परवीन ने दबाव को खुद पर हावी नहीं होने दिया और स्वर्ण पदक अपने नाम कर लिया। जिस एशियन गेम्स में उनका पदक उनसे छिन गया था, उसी प्रतियोगिता में परवीन अब फिर लौटीं और इस बार सीधे गोल्ड जीत लिया। उनकी कहानी में दर्द के कई पड़ाव रहे। आर्थिक मुश्किलों से शुरुआत हुई, फिर पिता की बीमारी आई। इसके बाद एशियन गेम्स का पदक मिला, लेकिन वापस ले लिया गया। 22 महीने का प्रतिबंध लगा और पेरिस ओलंपिक का सपना टूट गया।
फिर 838 दिन का इंतजार खत्म हुआ।
परवीन ने वापसी की, वजन वर्ग बदला, खुद को दोबारा तैयार किया और अब एशियन गेम्स की चैंपियन बन गईं। जिस कहानी में कभी सब कुछ छिन गया था, उसका अंत अब सोने से हुआ है। 838 दिन बाद वापसी हुई थी। अब परवीन के हाथ में एशियन गेम्स का गोल्ड है।
फाइनल में परवीन ने दबाव को खुद पर हावी नहीं होने दिया और स्वर्ण पदक अपने नाम कर लिया। जिस एशियन गेम्स में उनका पदक उनसे छिन गया था, उसी प्रतियोगिता में परवीन अब फिर लौटीं और इस बार सीधे गोल्ड जीत लिया। उनकी कहानी में दर्द के कई पड़ाव रहे। आर्थिक मुश्किलों से शुरुआत हुई, फिर पिता की बीमारी आई। इसके बाद एशियन गेम्स का पदक मिला, लेकिन वापस ले लिया गया। 22 महीने का प्रतिबंध लगा और पेरिस ओलंपिक का सपना टूट गया।
फिर 838 दिन का इंतजार खत्म हुआ।
परवीन ने वापसी की, वजन वर्ग बदला, खुद को दोबारा तैयार किया और अब एशियन गेम्स की चैंपियन बन गईं। जिस कहानी में कभी सब कुछ छिन गया था, उसका अंत अब सोने से हुआ है। 838 दिन बाद वापसी हुई थी। अब परवीन के हाथ में एशियन गेम्स का गोल्ड है।