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Hindi News ›   Technology ›   ISRO & ESA Join Forces: Giant Leap Earth Observation Revolutionary FLEX Mission

ISRO-ESA : स्पेस रिसर्च में भारत-यूरोप की बड़ी साझेदारी, अर्थ ऑब्जर्वेशन मिशन के लिए ISRO-ESA ने मिलाया हाथ

टेक डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Jagriti Updated Sat, 07 Mar 2026 06:31 PM IST
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सार

Earth Observation Missions: अंतरिक्ष अनुसंधान को नई दिशा देने के लिए इसरो और ईएसए ने अर्थ ऑब्जर्वेशन मिशन के लिए एक नया समझौता किया है। इस एग्रीमेंट के तहत दोनों एजेंसियां संयुक्त रूप से कैलिब्रेशन, वैलिडेशन और वैज्ञानिक अध्ययन पर काम करेंगी। खासतौर पर ईसीए के आने वाले फ्लेक्स (फ्लोरोसेंस एक्सप्लोरर) मिशन को ध्यान में रखते हुए यह सहयोग पृथ्वी के पर्यावरण और वनस्पति अध्ययन के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
 

ISRO & ESA Join Forces: Giant Leap Earth Observation Revolutionary FLEX Mission
इसरो ईएसए समझौता 2026 - फोटो : isro
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विस्तार

अंतरिक्ष विज्ञान में अंतरराष्ट्रीय सहयोग लगातार बढ़ रहा है। इसी कड़ी में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी ने अर्थ ऑब्जर्वेशन मिशनों के लिए एक महत्वपूर्ण समझौता किया है। यह एग्रीमेंट जॉइंट कैलिब्रेशन, वैलिडेशन एक्टिविटी और वैज्ञानिक अध्ययन के लिए किया गया है, जिससे दोनों एजेंसियां मिलकर पृथ्वी से जुड़े डेटा और रिसर्च को और बेहतर बना सकेंगी। यह समझौता चार मार्च को वर्चुअल तरीके से साइन किया गया, जिसमें इसरो के साइंटिफिक सेक्रेटरी एम गणेश पिल्लई और ईएसए की अर्थ ऑब्जर्वेशन डायरेक्टर सिमोनेटा चेली शामिल रहीं।

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1978 से जारी है दोनों एजेंसियों का सहयोग
भारत और यूरोप की अंतरिक्ष एजेंसियों के बीच सहयोग नया नहीं है। दोनों संस्थाओं ने पहली बार 1978 में साझेदारी शुरू की थी, जिसे बाद में 2002 में फिर से रिन्यू किया गया। अब यह नया एग्रीमेंट आने वाले स्पेस मिशनों में डेटा साझा करने और वैज्ञानिक रिसर्च को मजबूत बनाने की दिशा में एक और बड़ा कदम माना जा रहा है।
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फ्लेक्स मिशन के लिए क्यों अहम है यह साझेदारी?
इस सहयोग का सबसे बड़ा फायदा ईएसए के आने वाले फ्लेक्स (फ्लोरोसेंस एक्सप्लोरर) मिशन को मिलेगा। यह मिशन पृथ्वी की वनस्पतियों की ओर से उत्सर्जित फ्लोरेसेंस सिग्नल को मापेगा। इस डेटा के जरिए वैज्ञानिक यह समझ पाएंगे कि पौधे कितनी प्रभावी तरीके से प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) कर रहे हैं। इससे  और भी कई महत्वपूर्ण जानकारियां मिल सकती हैं। जैसे:

  • पृथ्वी पर पौधों की सेहत का आकलन।
  • जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को समझना।
  • कृषि और पर्यावरण निगरानी में सुधार।
  • कार्बन चक्र (Carbon Cycle) का अध्ययन।

कैसे काम करेगा ISRO-ESA सहयोग?
इस साझेदारी के तहत दोनों एजेंसियां कई तकनीकी क्षेत्रों में साथ काम करेंगी। सैटेलाइट डेटा की कैलिब्रेशन और वैलिडेशन। यह पृथ्वी अवलोकन से जुड़ी संयुक्त वैज्ञानिक रिसर्च करेगी, जिसमें ग्राउंड स्टेशन और ट्रैकिंग नेटवर्क का सहयोग हाेगा। साथ ही डेटा विश्लेषण और मिशन सपोर्ट मिलेगा। इससे अंतरिक्ष से मिलने वाले डेटा की सटीकता और विश्वसनीयता बढ़ेगी।


पहले भी कई मिशनों में मिल चुका है साथ
भारत और यूरोप की अंतरिक्ष एजेंसियों के बीच सहयोग पहले भी कई मिशनों में देखने को मिला है। ईएसए ने भारत के प्रमुख मिशनों जैसे चंद्रयान, आदित्य एल 1 में ग्राउंड स्टेशन और ट्रैकिंग सपोर्ट दिया है। वहीं इसरो ने भी अपनी डीप स्पेस एंटीना फैसिलिटी के जरिए कई अंतरराष्ट्रीय मिशनों को तकनीकी सहयोग दिया है।

 भविष्य के स्पेस मिशनों के लिए क्या मायने?
एक्सपर्ट्स  का मानना है कि यह सहयोग आने वाले समय में पृथ्वी से जुड़े कई अहम मिशनों के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित होगा। इससे न केवल अंतरिक्ष अनुसंधान मजबूत होगा बल्कि जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण संरक्षण और कृषि अनुसंधान के लिए भी नई वैज्ञानिक जानकारी मिलेगी। इनका यह भी कहना है कि भारत और यूरोप की यह साझेदारी दिखाती है कि अंतरिक्ष विज्ञान में वैश्विक सहयोग ही भविष्य की सबसे बड़ी ताकत बनने वाला है।

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