AI की रेस में महिलाएं पीछे: रिपोर्ट में 131वें नंबर पर देश, क्या भेदभाव बढ़ाएगी तकनीक? जानें विशेषज्ञ की चिंता
जहां एआई को भविष्य की सबसे ताकतवर तकनीक माना जा रहा है। वहीं, भारत के लिए एक चिंताजनक खबर सामने आई है। भारत जेंडर गैप इंडेक्स 2026 में 131 वें स्थान पर है और एआई की दुनिया में भी महिलाएं बड़े फैसले लेने और तकनीक बनाने वाली भूमिका में पीछे हैं। जब एआई तय करेगा कि किसे मौका मिले और किसे नहीं, तो क्या महिलाओं के साथ भी भेदभाव होगा? आइए जानते हैं इस बारे में एक्सपर्ट्स क्या कहते हैं...
विस्तार
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को काम आसान बनाने, नई नौकरियां पैदा करने और बेहतर फैसले लेने वाली तकनीक के तौर पर देखा जा रहा है, लेकिन क्या इस बदलाव का फायदा महिलाओं को भी बराबरी से मिलेगा? विशेषज्ञों को आशंका है कि अगर एआई को विकसित करने और इस्तेमाल करने में महिलाओं की भागीदारी नहीं बढ़ी, तो यह तकनीक समाज में पहले से मौजूद लैंगिक असमानता को और गहरा कर सकती है। इसका असर नौकरी मिलने से लेकर बैंकिंग, स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा और सरकारी योजनाओं तक दिखाई दे सकता है।
वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF) के ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स 2026 में भारत 148 देशों में नहीं, बल्कि 145 अर्थव्यवस्थाओं के बीच जारी रैंकिंग में 131वें स्थान पर रहा। रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान को छोड़कर भारत अपने पड़ोसी देशों बांग्लादेश, नेपाल, भूटान और श्रीलंका से पीछे है। विशेषज्ञों का कहना है कि जब देश पहले से ही लैंगिक समानता की राह में चुनौतियों का सामना कर रहा है, तब AI के बढ़ते इस्तेमाल के बीच महिलाओं को पीछे छोड़ना एक नई समस्या बन सकता है।
ग्लोबल जेंडर गैप खत्म होने में लग सकते हैं 120 साल
- डब्ल्यूईएफ के अनुमान के अनुसार, दुनिया में पूरी लैंगिक समानता हासिल करने में अभी करीब 120 साल लग सकते हैं। दक्षिण एशिया के लिए यह अनुमान और लंबा है। मौजूदा रफ्तार जारी रहने पर इस क्षेत्र को बराबरी तक पहुंचने में करीब 149 साल लग सकते हैं।
- भारत के लिए रिपोर्ट में अलग से कोई समय-सीमा नहीं बताई गई है। हालांकि, भारत का जेंडर पैरिटी स्कोर 64.5 प्रतिशत है, जो दक्षिण एशिया के स्तर के आसपास और 69.2 प्रतिशत के वैश्विक औसत से कम है। इस आधार पर भारत के लिए भी लंबी चुनौती का संकेत मिलता है, लेकिन देश में पूरी बराबरी हासिल करने में कितने साल लगेंगे, इसका सटीक अनुमान उपलब्ध नहीं है।
- पॉपुलेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया की एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर पूनम मुत्तरेजा के मुताबिक, भारत ने महिलाओं के नेतृत्व वाले विकास को बढ़ावा देने के लिए कई वादे किए हैं, लेकिन नीतियों में दिखाई देने वाली महत्वाकांक्षा और जमीन पर उनकी वास्तविक स्थिति के बीच अब भी बड़ा अंतर है।
आर्थिक भागीदारी में भारत की स्थिति चिंताजनक
- मुत्तरेजा का मानना है कि भारत का प्रदर्शन आर्थिक भागीदारी और अवसरों के मामले में खास तौर पर चिंता पैदा करता है। इस श्रेणी में भारत 145 अर्थव्यवस्थाओं में 143वें स्थान पर है। उनका मानना है कि लड़कियों की शिक्षा के क्षेत्र में प्रगति हुई है, लेकिन शिक्षा का यह फायदा महिलाओं की आर्थिक भागीदारी, फैसले लेने की ताकत में उसी अनुपात में नहीं बदल पाया है।
- इस अंतर को कम करने के लिए सिर्फ मौजूदा सरकारी योजनाओं और कल्याणकारी कार्यक्रमों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा। महिलाओं की आर्थिक आजादी, सुरक्षा, बच्चों की देखभाल की सुविधाओं, प्रजनन संबंधी फैसले लेने की स्वतंत्रता और समान अवसरों में ज्यादा निवेश की जरूरत है।
- मुत्तरेजा ने यह भी कहा कि भारत में सभी राज्यों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति एक जैसी नहीं है। देश के अलग-अलग हिस्सों में मानव विकास का स्तर अलग है, इसलिए लैंगिक समानता हासिल करने की रफ्तार भी अलग-अलग हो सकती है। कुछ राज्य दूसरे राज्यों के मुकाबले जल्दी बराबरी हासिल कर सकते हैं।
एआई की दुनिया में महिलाओं को सिर्फ यूजर बनाकर न छोड़ें
- ट्रांसफॉर्म रूरल इंडिया (TRI) की जेंडर विशेषज्ञ डॉ. सीमा भास्करन का कहना है कि महिलाओं को एआई के डिजाइन और विकास में शामिल करना बेहद जरूरी है। उन्हें केवल इस तकनीक का इस्तेमाल करने वाले लोगों या इसके गलत इस्तेमाल से प्रभावित होने वाले तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए।
- इस चिंता की एक वजह यह है कि AI के विकास, प्रशिक्षण और इस्तेमाल से जुड़ी भूमिकाओं में महिलाओं की मौजूदगी समान नहीं है। WEF में इकोनॉमिक इन्क्लूजन की डायरेक्टर सिल्जा बैलर के मुताबिक, जिन नौकरियों पर एआई के वजह से कामकाम में बदलाव या रुकावट आने की आशंका है, उन्में महिलाओं का प्रतिनिधित्व ज्यादा है। दूसरी ओर, जिनमें AI कर्मचारियों की क्षमता बढ़ाने में मदद कर सकता है, वहां उनकी भागीदारी कम है।
- बैलर ने चेताया कि AI अर्थव्यवस्था में पहले से मौजूद लैंगिक विभाजन दोहराया जा सकता है। यानी मुख्य तकनीकी पदों पर पुरुषों की मौजूदगी ज्यादा रह सकती है, जबकि महिलाएं कम वेतन वाली सहायक भूमिकाओं में अधिक सीमित रह सकती हैं।
एआई बनाने वाली भूमिकाओं में महिलाएं कम क्यों?
- ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट 2026 के मुताबिक, डेटा एनोटेशन से जुड़े कामों में महिलाओं की हिस्सेदारी करीब आधी है, लेकिन एआई डेवलपर्स और डिप्लॉयमेंट इंजीनियरों में उनकी हिस्सेदारी लगभग पांचवां हिस्सा है। डेटा एनोटेशन में एआई को सिखाने के लिए डेटा को पहचानने, वर्गीकृत करने और उस पर लेबल लगाने जैसे काम किए जाते हैं। वहीं, एआई डेवलपर्स सिस्टम बनाने और उन्हें बेहतर करने में भूमिका निभाते हैं, जबकि डिप्लॉयमेंट इंजीनियर एआई सिस्टम को वास्तविक कामकाज में लागू करने में मदद करते हैं।
- मुत्तरेजा के मुताबिक, महिलाएं एआई अर्थव्यवस्था में योगदान तो दे रही हैं, लेकिन उन भूमिकाओं में कम नजर आती हैं जो इस तकनीक को डिजाइन करती हैं, विकसित करती हैं और उसकी दिशा तय करती हैं।
- डॉ. सीमा भास्करन ने बताया कि भारत में विज्ञान, तकनीक, इंजीनियरिंग और गणित यानी STEM विषयों से स्नातक करने वालों में महिलाओं की हिस्सेदारी 40 से 43 प्रतिशत है। इसके बावजूद एआई क्षेत्र में उनकी कम मौजूदगी चिंता का विषय है।
- उनके मुताबिक, अगर एआई सिस्टम बनाने वाली टीमों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व कम रहा, तो ऐसे एल्गोरिदम और प्रोग्राम तैयार हो सकते हैं जो पुरुषों की जरूरतों और अनुभवों को ज्यादा ध्यान में रखें। इससे महिलाओं की जरूरतों के अनुरूप तकनीक विकसित करने की गुंजाइश कम हो सकती है। साथ ही, महिलाओं के हाथ से तकनीकी क्षेत्र में बेहतर अवसर निकलने का जोखिम भी बढ़ सकता है।
नौकरी, बैंकिंग और स्वास्थ्य सेवाओं में कैसे बढ़ सकता है भेदभाव?
- एआई का इस्तेमाल अब भर्ती प्रक्रिया, स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा, बैंकिंग और सरकारी सेवाओं जैसे क्षेत्रों में बढ़ रहा है। ऐसे में अगर किसी एआई सिस्टम को पक्षपाती डेटा पर प्रशिक्षित किया गया हो या उसके डिजाइन में कुछ समूहों के अनुभवों को पर्याप्त जगह न मिली हो, तो वह पुराने भेदभाव को दोहरा सकता है। जैसे मान लीजिए, नौकरी के लिए उम्मीदवारों की छंटनी करने वाला एआई सिस्टम कुछ लोगों के साथ अनुचित व्यवहार कर सकता है। बैंकिंग में स्वचालित सिस्टम कर्ज से जुड़े फैसलों को प्रभावित कर सकते हैं, जबकि स्वास्थ्य सेवाओं में गलत या अधूरे डेटा के आधार पर तैयार एआई टूल कुछ महिलाओं की जरूरतों को ठीक से समझने में नाकाम हो सकते हैं।
- मुत्तरेजा ने खास तौर पर गरीब, ग्रामीण और हाशिए पर रहने वाले समुदायों की महिलाओं के लिए इस जोखिम को गंभीर बताया। हालांकि, हर एआई सिस्टम पक्षपाती नहीं होता। जोखिम इस बात पर निर्भर करता है कि उसे किस डेटा से प्रशिक्षित किया गया है, कैसे बनाया गया है और उसकी नियमित जांच होती है या नहीं। उन्होंने सुझाव दिया कि ज्यादा लड़कियों और महिलाओं को उन्नत डिजिटल और एआई कौशल सिखाए जाएं। महिलाओं के लिए बेहतर वेतन वाली तकनीकी नौकरियों और नेतृत्व के पदों तक पहुंचने के रास्ते बनाए जाएं। साथ ही, सरकारी सेवाओं में इस्तेमाल होने वाले एआई सिस्टम की लैंगिक पक्षपात और जवाबदेही के लिहाज से जांच की जाए। उनके मुताबिक, डिजिटल सुविधाएं, किफायती प्रशिक्षण और करियर के मौके सिर्फ बड़े शहरों तक सीमित नहीं रहने चाहिए। छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों की महिलाओं को भी इन तक पहुंच मिलनी जरूरी है।
सिर्फ आर्थिक विकास से नहीं मिलेगी बराबरी
- मुत्तरेजा का कहना है कि आर्थिक विकास अपने आप लैंगिक समानता की गारंटी नहीं देता। इसके लिए महिलाओं की शिक्षा, रोजगार में भागीदारी, बच्चों और परिवार की देखभाल से जुड़ी सुविधाओं, सुरक्षा और राजनीतिक प्रतिनिधित्व में लगातार निवेश करना होगा।
- भारत के सामने बड़ी चुनौती यह है कि शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में हुई प्रगति का पूरा फायदा महिलाओं को आर्थिक आजादी और फैसले लेने की शक्ति के रूप में नहीं मिल पाया है। उन्होंने कहा कि सामाजिक मान्यताएं, बिना वेतन किए जाने वाले देखभाल के काम की ज्यादा जिम्मेदारी, आने-जाने पर पाबंदियां, रोजगार के असमान अवसर और लैंगिक हिंसा महिलाओं की पसंद और स्वतंत्रता को सीमित करते हैं।
- डॉ. सीमा भास्करन ने भी महिलाओं के खिलाफ हिंसा को एक बड़ी संरचनात्मक बाधा बताया। उनके मुताबिक, कानूनी व्यवस्था को मजबूत करना और राजनीतिक इच्छाशक्ति को प्रभावी नीतियों और कार्यक्रमों में बदलना जरूरी है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत की सामाजिक और सांस्कृतिक विविधता को देखते हुए हर क्षेत्र के लिए एक जैसे कार्यक्रम बनाना पर्याप्त नहीं है। योजनाएं अक्सर केंद्र स्तर पर तैयार होती हैं और पूरे देश में एक ही तरीके से लागू की जाती हैं। इससे कई जगहों पर उनका असर सीमित रह सकता है। स्थानीय जरूरतों और परिस्थितियों के मुताबिक कार्यक्रम तैयार करना जरूरी है।
एआई को बराबरी का अवसर बनाने की उम्मीद भी
एआई से जुड़े जोखिमों के बावजूद डब्ल्यूईएफ की सिल्जा बैलर भविष्य को लेकर पूरी तरह निराश नहीं हैं। उनका कहना है कि एआई अर्थव्यवस्था अभी आकार ले रही है। महिलाओं की कम भागीदारी का पुराना पैटर्न दोहराए जाने का खतरा जरूर है, लेकिन आज एआई को विकसित करने, लागू करने और अलग-अलग क्षेत्रों में इस्तेमाल करने को लेकर लिए गए फैसले एक अधिक समान अर्थव्यवस्था बनाने का मौका भी देते हैं। इसके लिए महिलाओं को तकनीकी शिक्षा, रोजगार और नेतृत्व में बराबर अवसर देना होगा। साथ ही, एआई सिस्टम में पक्षपात की पहचान करने और उसे दूर करने की व्यवस्था भी जरूरी है।