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Chitrakoot News: जल-प्रलय से बचाने के लिए तीन दशक पुराने शोध पर काम करें एमपी-यूपी सरकार
Wed, 02 Sep 2026 11:41 PM IST
कानपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, चित्रकूट
संवाद न्यूज एजेंसी, चित्रकूट
Updated Wed, 02 Sep 2026 11:41 PM IST
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फोटो 02 सीकेटीपी 24 पर्यावरणविद् गुंजन मिश्रा।
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चित्रकूट। धर्मनगरी में मंदाकिनी नदी के रौद्र रूप और हालिया बाढ़ से मची भारी तबाही के बीच डॉ. जीके कन्नन का वर्ष 1995 का शोध एक बार फिर चर्चा में है।
नदी के घटते पाट और बार-बार आ रही बाढ़ की विभीषिका को लेकर पर्यावरणविद गुंजन मिश्रा ने चित्रकूट को जल-प्रलय से बचाने के लिए वैज्ञानिक खाका पेश किया है। उन्होंने उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश सरकार से राजनीति और भौगोलिक सीमाओं से ऊपर उठकर अविलंब संयुक्त अंतरराज्यीय बेसिन प्रबंधन योजना लागू करने की मांग की है।
जलस्त्रोतों, पर्यावरण और खेती-किसानी के क्षेत्र में ढाई दशक से काम कर रहे पर्यावरणविद गुंजन मिश्रा ने बुधवार को कहा कि वर्ष 1995 में महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय के पर्यावरण वैज्ञानिक प्रो. गुरुदास अग्रवाल के मार्गदर्शन में डॉ. जीके कन्नन ने मंदाकिनी नदी के पारिस्थितिकीय प्रवाह, चौड़ाई, गहराई और सूक्ष्म जलीय जीव पर अध्ययन किया था।
तीन दशक पुराने उनके शोध का डेटा मंदाकिनी के प्राकृतिक हाइड्रोलॉजिकल स्वरूप और जल-धारण क्षमता का आधारभूत वैज्ञानिक दस्तावेज है। उसे लागू कर नदी के तलछट और बहाव के अवरोधों को वैज्ञानिक रूप से नियंत्रित किया जा सकता है।
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पर्यावरणविद ने स्पष्ट किया कि मंदाकिनी का उद्गम और प्रवाह सतना (मध्य प्रदेश) से लेकर चित्रकूट (उत्तर प्रदेश) तक फैला है। ऐसे में किसी एक राज्य के प्रयासों से न तो बाढ़ थमेगी और न नदी का प्रदूषण कम होगा। मध्य प्रदेश में होने वाले जलदोहन, अनियंत्रित निर्माण और अपशिष्ट निस्तारण का दुष्प्रभाव उत्तर प्रदेश के हिस्से में जलभराव और पारिस्थितिक क्षरण के रूप में दिखता है।
नदी की वास्तविक चौड़ाई और गहराई के 1995 के मानकों के आधार पर डी-सिल्टिंग और न्यूनतम प्रवाह सुनिश्चित करना दोनों राज्यों की सांविधानिक व नैतिक जिम्मेदारी है। रामघाट, परिक्रमा मार्ग और प्रमुख घाटों पर सीवेज शोधन व कचरा प्रबंधन के लिए दोनों राज्यों के नगर निकायों को एक समान मानक लागू करने होंगे।
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नदी किनारे 500 मीटर का जल-हरित सुरक्षा क्षेत्र विकसित हो
पर्यावरणविद ने मंदाकिनी नदी के दोनों किनारों पर 500 मीटर का जल-हरित संरक्षण और बाढ़ सुरक्षा क्षेत्र विकसित करने की मांग की है। उन्होंने कहा कि यह क्षेत्र केवल निर्माण रोकने के लिए नहीं बल्कि नदी, भूमि, जल और समुदाय के बीच संतुलन के लिए विकसित हो।
इसमें तालाबों-जलाशयों का पुनर्जीवन, देशी पौधों का रोपण, जैविक खेती, वर्षा जल संचयन, भूजल पुनर्भरण, प्राकृतिक नालों का संरक्षण और जैव विविधता संरक्षण को प्राथमिकता दी जाए। इससे नदी के संरक्षण के साथ बाढ़ का जोखिम घटेगा, भूजल बढ़ेगा और किसानों की आय में वृद्धि होगी।
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संरक्षण और बाढ़ नियंत्रण के तीन सूत्र
- संयुक्त मंदाकिनी नदी प्राधिकरण: दोनों राज्य सरकारें रिवर बोर्ड्स एक्ट के तहत एक स्वायत्त अंतर-राज्यीय प्राधिकरण गठित करें, जिसके पास नदी बेसिन पर अंतिम नीतिगत अधिकार हों।
- ई-फ्लो कानून व अतिक्रमण मुक्ति: प्रो. जीडी अग्रवाल व डॉ. कन्नन के अध्ययन के आधार पर हर मौसम के लिए न्यूनतम जल प्रवाह अधिसूचित हो और बाढ़ क्षेत्र से सभी पक्के निर्माण तत्काल हटाए जाएं।- साझा प्रदूषण नियंत्रण नीति: यूपी व एमपी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड औद्योगिक, सीवरेज व मेलों के दौरान जल-शोधन के साझा कड़े मानक लागू करें।
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मंदाकिनी केवल आस्था का केंद्र नहीं बल्कि चित्रकूट का जीवन-तंत्र है। हालिया बाढ़ प्रकृति की सीधी चेतावनी है कि हमने नदी के प्राकृतिक रास्तों को छीना है। अगर 1995 के वैज्ञानिक अध्ययन के आधार पर दोनों सरकारों ने संयुक्त नीति नहीं बनाई तो आने वाले वर्षों में जानमाल का नुकसान और भयानक रूप ले लेगा। - गुंजन मिश्रा, पर्यावरणविद।
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नदी के घटते पाट और बार-बार आ रही बाढ़ की विभीषिका को लेकर पर्यावरणविद गुंजन मिश्रा ने चित्रकूट को जल-प्रलय से बचाने के लिए वैज्ञानिक खाका पेश किया है। उन्होंने उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश सरकार से राजनीति और भौगोलिक सीमाओं से ऊपर उठकर अविलंब संयुक्त अंतरराज्यीय बेसिन प्रबंधन योजना लागू करने की मांग की है।
जलस्त्रोतों, पर्यावरण और खेती-किसानी के क्षेत्र में ढाई दशक से काम कर रहे पर्यावरणविद गुंजन मिश्रा ने बुधवार को कहा कि वर्ष 1995 में महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय के पर्यावरण वैज्ञानिक प्रो. गुरुदास अग्रवाल के मार्गदर्शन में डॉ. जीके कन्नन ने मंदाकिनी नदी के पारिस्थितिकीय प्रवाह, चौड़ाई, गहराई और सूक्ष्म जलीय जीव पर अध्ययन किया था।
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तीन दशक पुराने उनके शोध का डेटा मंदाकिनी के प्राकृतिक हाइड्रोलॉजिकल स्वरूप और जल-धारण क्षमता का आधारभूत वैज्ञानिक दस्तावेज है। उसे लागू कर नदी के तलछट और बहाव के अवरोधों को वैज्ञानिक रूप से नियंत्रित किया जा सकता है।
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पर्यावरणविद ने स्पष्ट किया कि मंदाकिनी का उद्गम और प्रवाह सतना (मध्य प्रदेश) से लेकर चित्रकूट (उत्तर प्रदेश) तक फैला है। ऐसे में किसी एक राज्य के प्रयासों से न तो बाढ़ थमेगी और न नदी का प्रदूषण कम होगा। मध्य प्रदेश में होने वाले जलदोहन, अनियंत्रित निर्माण और अपशिष्ट निस्तारण का दुष्प्रभाव उत्तर प्रदेश के हिस्से में जलभराव और पारिस्थितिक क्षरण के रूप में दिखता है।
नदी की वास्तविक चौड़ाई और गहराई के 1995 के मानकों के आधार पर डी-सिल्टिंग और न्यूनतम प्रवाह सुनिश्चित करना दोनों राज्यों की सांविधानिक व नैतिक जिम्मेदारी है। रामघाट, परिक्रमा मार्ग और प्रमुख घाटों पर सीवेज शोधन व कचरा प्रबंधन के लिए दोनों राज्यों के नगर निकायों को एक समान मानक लागू करने होंगे।
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नदी किनारे 500 मीटर का जल-हरित सुरक्षा क्षेत्र विकसित हो
पर्यावरणविद ने मंदाकिनी नदी के दोनों किनारों पर 500 मीटर का जल-हरित संरक्षण और बाढ़ सुरक्षा क्षेत्र विकसित करने की मांग की है। उन्होंने कहा कि यह क्षेत्र केवल निर्माण रोकने के लिए नहीं बल्कि नदी, भूमि, जल और समुदाय के बीच संतुलन के लिए विकसित हो।
इसमें तालाबों-जलाशयों का पुनर्जीवन, देशी पौधों का रोपण, जैविक खेती, वर्षा जल संचयन, भूजल पुनर्भरण, प्राकृतिक नालों का संरक्षण और जैव विविधता संरक्षण को प्राथमिकता दी जाए। इससे नदी के संरक्षण के साथ बाढ़ का जोखिम घटेगा, भूजल बढ़ेगा और किसानों की आय में वृद्धि होगी।
संरक्षण और बाढ़ नियंत्रण के तीन सूत्र
- संयुक्त मंदाकिनी नदी प्राधिकरण: दोनों राज्य सरकारें रिवर बोर्ड्स एक्ट के तहत एक स्वायत्त अंतर-राज्यीय प्राधिकरण गठित करें, जिसके पास नदी बेसिन पर अंतिम नीतिगत अधिकार हों।
- ई-फ्लो कानून व अतिक्रमण मुक्ति: प्रो. जीडी अग्रवाल व डॉ. कन्नन के अध्ययन के आधार पर हर मौसम के लिए न्यूनतम जल प्रवाह अधिसूचित हो और बाढ़ क्षेत्र से सभी पक्के निर्माण तत्काल हटाए जाएं।- साझा प्रदूषण नियंत्रण नीति: यूपी व एमपी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड औद्योगिक, सीवरेज व मेलों के दौरान जल-शोधन के साझा कड़े मानक लागू करें।
मंदाकिनी केवल आस्था का केंद्र नहीं बल्कि चित्रकूट का जीवन-तंत्र है। हालिया बाढ़ प्रकृति की सीधी चेतावनी है कि हमने नदी के प्राकृतिक रास्तों को छीना है। अगर 1995 के वैज्ञानिक अध्ययन के आधार पर दोनों सरकारों ने संयुक्त नीति नहीं बनाई तो आने वाले वर्षों में जानमाल का नुकसान और भयानक रूप ले लेगा। - गुंजन मिश्रा, पर्यावरणविद।

फोटो 02 सीकेटीपी 24 पर्यावरणविद् गुंजन मिश्रा।

फोटो 02 सीकेटीपी 24 पर्यावरणविद् गुंजन मिश्रा।

फोटो 02 सीकेटीपी 24 पर्यावरणविद् गुंजन मिश्रा।

फोटो 02 सीकेटीपी 24 पर्यावरणविद् गुंजन मिश्रा।

फोटो 02 सीकेटीपी 24 पर्यावरणविद् गुंजन मिश्रा।