गाजीपुर। राष्ट्रीय आंदोलन में गाजीपुर के हाशिए पर रहे वर्गों की भूमिका और उनके योगदान पर बुधवार को स्वामी सहजानंद स्नातकोत्तर महाविद्यालय में राष्ट्रीय संगोष्ठी और अभिलेख प्रदर्शनी का आयोजन किया गया। मुख्य अतिथि बीएचयू के इतिहास के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. केशव मिश्रा ने कहा कि इतिहास केवल रटने का विषय नहीं, बल्कि वर्तमान को समझने और परिवर्तन की चेतना जगाने का माध्यम है।
विशिष्ट वक्ता इतिहासकार डॉ. उबैदुर्रहमान सिद्दीकी ने कहा कि गाजीपुर कभी पिछड़ा नहीं रहा, बल्कि यह ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और औद्योगिक दृष्टि से समृद्ध और नेतृत्वकारी जिला रहा है। 1857 की क्रांति में यहां का विद्रोह इतना उग्र था कि खौफ़ज़दा अंग्रेजों ने जिले को तीन हिस्सों में बांट दिया था। आज़ादी की असली नींव उच्च वर्ग ने नहीं, बल्कि नाई, जुलाहे, पासी और कहार जैसे सबाल्टर्न तबकों के गुमनाम नायकों ने रखी थी।
दयानंद सिंह चौहान ने जिले के राजस्व इतिहास पर प्रकाश डालते हुए बताया कि 1817 में गाजीपुर एक स्वतंत्र जिले के रूप में अस्तित्व में आया, जिसके पहले कलेक्टर रॉबर्ट बार्लो थे। शुरू में इसका दायरा आजमगढ़ और बलिया तक विस्तृत था। डॉ. शशिकेश गौड़ ने उपाश्रयी इतिहास लेखन कहा कि यह विमर्श उन उपेक्षित वर्गों की भूमिका को सामने लाता है। डॉ. अजीत राय ने जन-आंदोलनों को समझने के लिए मौखिक साक्ष्यों की महत्ता बताई। महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. विजय कुमार राय ने अतिथियों का स्वागत किया। आयोजन में प्राविधिक सहायक राकेश कुमार वर्मा, डॉ. अरविंद यादव, शिवकुमार यादव और अजय कुमार सिंह का योगदान रहा। संचालन डॉ. निवेदिता सिंह तथा डॉ. राकेश पांडेय ने आभार व्यक्त किया।