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Jaunpur News: पूर्वांचल विवि में जल शोध भवन का निर्माण शुरू
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वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय परिसर में दूषित पानी से निदान के लिए जल शोध भवन का निर्माण शुरू हो गया है। पीएम उषा योजना (प्रधानमंत्री उच्चतर शिक्षा अभियान) के तहत विश्वविद्यालय को मिले 20 करोड़ रुपये ग्रांट में से 4 करोड़ जल शोध भवन के निर्माण पर खर्च किए जाएंगे।
यह शोध भवन जून माह तक बनकर तैयार हो जाएगा। इसके तैयार होने के बाद विश्वविद्यालय के गोद लिए गांवों के साथ-साथ पूर्वांचल में दूषित पानी की वैज्ञानिक जांच संभव हो सकेगी। पूर्वांचल के कई जिलों में दूषित जल के कारण बीमारियों के फैलने और मौत के मामले सामने आते रहते हैं।
इससे निपटने के लिए विश्वविद्यालय प्रशासन ने जल से जुड़ी समस्याओं के समाधान के लिए शोध केंद्र स्थापित करने का निर्णय लिया है। पीएम उषा योजना के तहत दिसंबर माह में ग्रांट मिलने के बाद भवन निर्माण कार्य को हरी झंडी मिल गई। शोध भवन के निर्माण के साथ ही विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से 10 सदस्यीय समिति का गठन किया गया है। इस समिति में शामिल विशेषज्ञ जल, मिट्टी और पौधों से जुड़े अलग-अलग पहलुओं पर शोध कार्य को आगे बढ़ाएंगे। भवन के तैयार होने के बाद विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों को शोध कार्य में सहूलियत मिलेगी और नई तकनीकों के विकास को भी बढ़ावा मिलेगा।
यह केंद्र प्रदेश का पहला केंद्र होगा जहां एक ही परिसर में जल, मिट्टी और पौधों पर शोध होगा। इसके लिए पूर्वांचल विश्वविद्यालय और स्वीडन की संस्था पीपुल्स वर्ल्ड कमीशन ऑन ड्राउट एंड फ्लड के बीच पहले ही समझौता हो चुका है। विश्वविद्यालय और पीपुल्स वर्ल्ड कमीशन ऑन ड्राउट एंड फ्लड के बीच 9 नवंबर को पांच वर्षों के लिए एमओयू पर हस्ताक्षर किए गए थे।
इस एमओयू के तहत विश्वविद्यालय परिसर में जल अनुसंधान संस्थान’ की स्थापना की जानी है। इस संस्थान में आधुनिक मशीनरी की स्थापना के साथ-साथ कर्मचारियों की नियुक्ति भी की जाएगी। जल अनुसंधान संस्थान के माध्यम से विश्वविद्यालय पूर्वी उत्तर प्रदेश, विशेषकर पूर्वांचल क्षेत्र में जल और मिट्टी से संबंधित अनुसंधान, शैक्षणिक गतिविधियों, जल कायाकल्प व जीर्णोद्धार, जलवायु परिवर्तन, जल विज्ञान, जल अभियांत्रिकी और जल प्रौद्योगिकी से जुड़ी शोध परियोजनाओं पर फोकस करेगा।
इससे न केवल विश्वविद्यालय को शैक्षणिक लाभ मिलेगा, बल्कि क्षेत्रीय स्तर पर भी जल प्रबंधन से जुड़ी गतिविधियों को मजबूती मिलेगी।
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यह शोध भवन जून माह तक बनकर तैयार हो जाएगा। इसके तैयार होने के बाद विश्वविद्यालय के गोद लिए गांवों के साथ-साथ पूर्वांचल में दूषित पानी की वैज्ञानिक जांच संभव हो सकेगी। पूर्वांचल के कई जिलों में दूषित जल के कारण बीमारियों के फैलने और मौत के मामले सामने आते रहते हैं।
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इससे निपटने के लिए विश्वविद्यालय प्रशासन ने जल से जुड़ी समस्याओं के समाधान के लिए शोध केंद्र स्थापित करने का निर्णय लिया है। पीएम उषा योजना के तहत दिसंबर माह में ग्रांट मिलने के बाद भवन निर्माण कार्य को हरी झंडी मिल गई। शोध भवन के निर्माण के साथ ही विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से 10 सदस्यीय समिति का गठन किया गया है। इस समिति में शामिल विशेषज्ञ जल, मिट्टी और पौधों से जुड़े अलग-अलग पहलुओं पर शोध कार्य को आगे बढ़ाएंगे। भवन के तैयार होने के बाद विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों को शोध कार्य में सहूलियत मिलेगी और नई तकनीकों के विकास को भी बढ़ावा मिलेगा।
यह केंद्र प्रदेश का पहला केंद्र होगा जहां एक ही परिसर में जल, मिट्टी और पौधों पर शोध होगा। इसके लिए पूर्वांचल विश्वविद्यालय और स्वीडन की संस्था पीपुल्स वर्ल्ड कमीशन ऑन ड्राउट एंड फ्लड के बीच पहले ही समझौता हो चुका है। विश्वविद्यालय और पीपुल्स वर्ल्ड कमीशन ऑन ड्राउट एंड फ्लड के बीच 9 नवंबर को पांच वर्षों के लिए एमओयू पर हस्ताक्षर किए गए थे।
इस एमओयू के तहत विश्वविद्यालय परिसर में जल अनुसंधान संस्थान’ की स्थापना की जानी है। इस संस्थान में आधुनिक मशीनरी की स्थापना के साथ-साथ कर्मचारियों की नियुक्ति भी की जाएगी। जल अनुसंधान संस्थान के माध्यम से विश्वविद्यालय पूर्वी उत्तर प्रदेश, विशेषकर पूर्वांचल क्षेत्र में जल और मिट्टी से संबंधित अनुसंधान, शैक्षणिक गतिविधियों, जल कायाकल्प व जीर्णोद्धार, जलवायु परिवर्तन, जल विज्ञान, जल अभियांत्रिकी और जल प्रौद्योगिकी से जुड़ी शोध परियोजनाओं पर फोकस करेगा।
इससे न केवल विश्वविद्यालय को शैक्षणिक लाभ मिलेगा, बल्कि क्षेत्रीय स्तर पर भी जल प्रबंधन से जुड़ी गतिविधियों को मजबूती मिलेगी।
