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UP: रोटी वाले बाबा और चूल्हे का भोजन, एलपीजी की किल्लत में बन गए सहारा; इस तरह भर रहे गरीबों का पेट
संवाद न्यूज एजेंसी, मथुरा
Published by: अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sat, 14 Mar 2026 10:54 AM IST
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सार
राधाकुंड के कुसुम सरोवर पर 'रोटी वाले बाबा' लकड़ी के चूल्हे पर भोजन बनाकर साधु-संतों और जरूरतमंदों को रोज खाना खिला रहे हैं।
कुसुम सरोवर पेड़ के नीचे चूल्हे पर रोटी बनाते बाबा रामदास शुक्ला
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विस्तार
देशभर में गैस सिलिंडरों की किल्लत से भले ही नाश्तों की दुकान और होटल-ढाबे बंद हो गए हैं पर गिरिराज परिक्रमा मार्ग में कोई संत, बेसहारा व परिक्रमार्थी भूखा नहीं सोता है। यहां रोटी वाले बाबा लकड़ी के चूल्हे पर रोटी बनाकर भूखों का पेट भर रहे हैं। रोटी वाले बाबा द्वारा भोजनालय की व्यवस्था कुसुम सरोवर पर की जा रही है। यहां बाबा रामदास ने एक पेड़ के नीचे चूल्हा बना रखा है। जहां वह अपने हाथों से भोजन बनाकर गरीबों का पेट भर रहे हैं।
बाबा रामदास प्रयागराज के रहने वाले है। वह गिरिराज परिक्रमा मार्ग स्थित गिरिराज संत सेवा आश्रम के महंत राधा मोहन दास रघुनाथ सिद्ध के सानिध्य में भोजनालय को एक दशक से चला रहे हैं। बाबा रामदास बताते हैं कि उनकी कभी इलाहाबाद हाईकोर्ट के सामने दाल-बाटी की दुकान थी। दुकान पर 30 कर्मचारी काम किया करते थे। एक दिन एक भूखा साधु रामदास शुक्ला की दुकान पर आया। बोला कि उसने पिछले चार दिन से कुछ नहीं खाया है। यह बात सुन रामदास के मन में विचार आया क्यों ना गिरिराज तलहटी पहुंच कर साधु-संत और भूखे रहने वाले लोगों की सेवा की जाए।
यह विचार आते ही रामदास अपनी प्रयागराज की दुकान को बंद कर गिरिराज तलहटी चले आए। घर पर पत्नी बच्चे और पूरा परिवार है। वह सभी को छोड़कर सन्यासी हो गए और पिछले दस वर्ष से कुसुम सरोवर पर भूखे लोगों की सेवा कर रहे हैं। उनका कहना है कि सभी व्यवस्थाएं गिरिराज महाराज की महिमा से होती है। वहीं बड़ी परिक्रमा में गया प्रसादजी की समाधि के निकट कुछ साधु-संत भी रसोई चला रहे हैं। इन रसोइयों में जाति का कोई भेद नहीं है। रोजाना सुबह शाम साधु, संत व लोगों की पंगत लग जाती है। बाबा साधु-संतों को भोजन कराने के साथ दक्षिण भी देते हैं।
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बाबा रामदास प्रयागराज के रहने वाले है। वह गिरिराज परिक्रमा मार्ग स्थित गिरिराज संत सेवा आश्रम के महंत राधा मोहन दास रघुनाथ सिद्ध के सानिध्य में भोजनालय को एक दशक से चला रहे हैं। बाबा रामदास बताते हैं कि उनकी कभी इलाहाबाद हाईकोर्ट के सामने दाल-बाटी की दुकान थी। दुकान पर 30 कर्मचारी काम किया करते थे। एक दिन एक भूखा साधु रामदास शुक्ला की दुकान पर आया। बोला कि उसने पिछले चार दिन से कुछ नहीं खाया है। यह बात सुन रामदास के मन में विचार आया क्यों ना गिरिराज तलहटी पहुंच कर साधु-संत और भूखे रहने वाले लोगों की सेवा की जाए।
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यह विचार आते ही रामदास अपनी प्रयागराज की दुकान को बंद कर गिरिराज तलहटी चले आए। घर पर पत्नी बच्चे और पूरा परिवार है। वह सभी को छोड़कर सन्यासी हो गए और पिछले दस वर्ष से कुसुम सरोवर पर भूखे लोगों की सेवा कर रहे हैं। उनका कहना है कि सभी व्यवस्थाएं गिरिराज महाराज की महिमा से होती है। वहीं बड़ी परिक्रमा में गया प्रसादजी की समाधि के निकट कुछ साधु-संत भी रसोई चला रहे हैं। इन रसोइयों में जाति का कोई भेद नहीं है। रोजाना सुबह शाम साधु, संत व लोगों की पंगत लग जाती है। बाबा साधु-संतों को भोजन कराने के साथ दक्षिण भी देते हैं।