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मुजफ्फरनगर: छह साल की बच्ची से दुष्कर्म करने वाले चाचा को उम्रकैद, अदालत बोली- दिव्यांगता माफी का आधार नहीं

Thu, 22 Oct 2026 01:09 PM IST
Dimple Sirohi न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुजफ्फरनगर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुजफ्फरनगर Published by: Dimple Sirohi Updated Thu, 22 Oct 2026 01:09 PM IST
सार

मुजफ्फरनगर की विशेष पॉक्सो अदालत ने छह साल की बच्ची से दुष्कर्म के दोषी चाचा को शेष प्राकृतिक जीवन तक सश्रम आजीवन कारावास की सजा सुनाई। 60 हजार रुपये का अर्थदंड पीड़िता को प्रतिकर के रूप में मिलेगा।

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Muzaffarnagar Court Sentences Uncle to Life Imprisonment for Raping 6-Year-Old Girl, Says Disability Is No Gro
- फोटो : सांकेतिक तस्वीर

विस्तार

मुजफ्फरनगर खतौली क्षेत्र में छह साल की मासूम से दुष्कर्म के दोषी दिव्यांग चाचा को शेष प्राकृत जीवन के लिए आजीवन सश्रम कारावास की सजा सुनाई गई। अपर जिला एवं सत्र न्यायालय/विशेष न्यायालय (पॉक्सो अधिनियम) संख्या-1 की पीठासीन अधिकारी मंजुला भालोटिया ने फैसले में लिखा कि यह कृत्य मानवीय संवेदनाओं को झकझोरने वाला है। मासूम के साथ दुष्कर्म केवल एक शरीर के विरुद्ध अपराध नहीं है, बल्कि यह मानवता और समाज की आत्मा पर किया गया प्रहार है। दिव्यांगता या पारिवारिक स्थिति दोषी की क्षमा का आधार नहीं बन सकती।

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वारदात 10 नवंबर 2024 को हुई। सुबह 10 बजे मासूम को पड़ोसी रिश्ते का चाचा हाथ पकड़कर अपने घेर में ले गया और दुष्कर्म किया। मजदूर माता-पिता जानकारी मिलने पर घर लौटे और खतौली थाने में प्राथमिकी दर्ज कराई। पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार किया और विवेचना के बाद आरोपपत्र दाखिल किया। विशेष पॉक्सो न्यायालय में केस की सुनवाई हुई। अभियोजन पक्ष ने सात और बचाव पक्ष ने दो गवाह पेश किए।
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बुधवार को दिव्यांग आरोपी पर दोष सिद्ध हुआ। अदालत ने लिखा कि दंड का निर्धारण करते समय अपराध की प्रकृति, पृष्ठभूमि और समाज पर पड़ने वाले प्रभाव के बीच संतुलन बनाना आवश्यक है।

इसके बाद दोषी को बीएनएस 2023 की धारा 65(2) और पॉक्सो अधिनियम 2012 की धारा 6 में दोषी को शेष प्राकृत जीवनकाल के लिए सश्रम आजीवन कारावास की सजा और 50 हजार रुपये अर्थदंड से दंडित किया गया।

धारा 137(2) के अंतर्गत दोषी को सात वर्ष के सश्रम कारावास और 10 हजार रुपये अर्थदंड की सजा सुनाई गई। दो सजाएं एक साथ चलेंगी। जुर्माने की संपूर्ण धनराशि 60 हजार रुपये पीड़िता को बतौर प्रतिकर दिए जाएंगे।

शोर मचाया...कोई नहीं आया बचाने
अदालत में छह साल की मासूम की गवाही सजा का आधार बनी। प्रतिपरीक्षा में पीड़िता ने कहा कि चाचा उसे घेर में ले गया था। शोर मचाने पर थप्पड़ मारे। कोई बचाने नहीं आया। वह खुद ही अपने घर पहुंची थी। बचाव पक्ष ने कहा कि माता-पिता के सिखाने पर बयान दिया गया लेकिन अदालत ने इस तर्क को पूरी तरह खारिज कर दिया।

इसलिए सजा...बच्चों की ओर न उठे आंख
अभियोजन की ओर से पैरवी करने वाले एडीजीसी फौजदारी विनय अरोरा और विक्रांत राठी ने बताया कि अदालत में बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि दोषी दिव्यांग है, उस पर माता-पिता की जिम्मेदारी है। जमीन के विवाद का हवाला भी दिया। इस पर अदालत ने कहा कि इस तरह अपराधों में निवारक सिद्धांत का लागू होना नितांत आवश्यक है, ताकि कोई अन्य व्यक्ति ऐसे अबोध बच्चों की ओर आंख उठाने का दुस्साहस न कर सके।
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