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Pratapgarh : अन्याय प्रतिकार यात्रा निकालने की नहीं मिली अनुमति, प्रशासन ने निषेधाज्ञा लागू होने का दिया हवाला

संवाद न्यूज एजेंसी, प्रतापगढ़ Published by: विनोद सिंह Updated Sat, 31 Jan 2026 06:43 PM IST
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सार

ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य जगद्गुरु स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के साथ प्रयागराज माघ मेले में हुए अन्याय के विरुद्ध न्याय की संवैधानिक मांग को लेकर प्रस्तावित “अन्याय प्रतिकार यात्रा” को एसडीएम पट्टी ने अनुमति नहीं दी है।

Permission denied for protest march against injustice, administration cites imposition of prohibitory orders
अन्याय प्रतिकार यात्रा की अनुमति न मिलने नाराजगी जाहिर करते भारतीय युवा विद्यार्थी संगठन के लोग। - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
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ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य जगद्गुरु स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के साथ प्रयागराज माघ मेले में हुए अन्याय के विरुद्ध न्याय की संवैधानिक मांग को लेकर प्रस्तावित “अन्याय प्रतिकार यात्रा” को एसडीएम पट्टी ने अनुमति नहीं दी है। एसडीएम ने निषेधाज्ञा का हवाला देते हुए प्रतिकार यात्रा निकालने की अनुमति देने से इनकार कर दिया है। भारतीय युवा विद्यार्थी संगठन ने प्रशासन के इस निर्णय को मनमानापूर्ण बताते हुए नाराजगी जाहिर की है। साथ ही शांतिपूर्ण मार्च निकालने और अभियक्ति की स्वतंत्रता  का उल्लंघन करार दिया है। 

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यात्रा के संयोजक और संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजा सक्षम सिंह योगी ने कहा कि यात्रा की जानकारी और अनुमति पत्र दो दिन पूर्व ही प्रशासन को दिया जा चुका था। दो दिन तक अधिकारियों ने पत्र लंबित रखा। अनुमति मिलने का झूठा आश्वासन दिया गया और यात्रा की पूर्व संध्या पर अचानक एसडीएम ने फोन पर सूचित किया कि धारा 163 के कारण यात्रा की अनुमति नहीं दी जा सकती।
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यात्रा संयोजक एवं भारतीय युवा विद्यार्थी संगठन के संस्थापक और राष्ट्रीय अध्यक्ष राजा सक्षम सिंह योगी ने कहा कि यदि धारा 163 लागू ही थी, तो उसी समय सूचना क्यों नहीं दी गई। दो दिन तक भ्रम में क्यों रखा गया। यह प्रशासनिक दुर्भावना और मनमानी को दर्शाता है। यह यात्रा पूर्णतः शांतिपूर्ण, अहिंसक एवं कानून के दायरे में आयोजित की जा रही थी। न तो किसी कानून-व्यवस्था भंग होने की कोई ठोस आशंका व्यक्त की गई, न ही कोई लिखित, तथ्यात्मक अथवा विधिसम्मत कारण बताया गया।

इसके बावजूद यात्रा को रोका जाना यह सिद्ध करता है कि धारा 144 का प्रयोग कानून-व्यवस्था के लिए नहीं, बल्कि जन-आवाज़ को दबाने के लिए किया गया। यह निर्णय सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों, लोकतांत्रिक मूल्यों एवं न्यायिक मर्यादाओं का घोर उल्लंघन है। प्रश्न यह है कि यदि अन्याय के विरुद्ध शांतिपूर्ण विरोध भी प्रशासन को असुविधाजनक लगने लगे, तो क्या भारत लोकतंत्र से प्रशासनिक तानाशाही की ओर बढ़ रहा है।

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