पितरों की शांति का अनोखा विधान: पिशाचमोचन… घोड़े का कान, गाय की पूंछ और भैंस का सींग छूकर अकाल मौत का तर्पण
पितृपक्ष में काशी में लाखों की संख्या में लोग पूर्वजों का तर्पण करने के लिए पहुंचते हैं। ऐसे में इन दिनों पिशाचमोचन पर हर दिन भारी संख्या में लोग पहुंच रहे हैं। यहां घोड़े का कान, गाय की पूछ और भैंस का सींग छूकर अकाल मौतों का तर्पण किया जा रहा है।
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आदि गंगा विमलोदत्त कुंड के किनारे पिशाचमोचन पर 20 हजार से ज्यादा लोग हर दिन पुरखाें और अकाल मौत के लिए 10 से 12 तरह के श्राद्ध कर्म कराने आ रहे हैं। नारायण बलि, त्रिपिंडी श्राद्ध और तर्पण अनुष्ठानों के बाद यहां दो ऐसे काम हैं जिनके बिना श्राद्ध-तर्पण की प्रक्रिया पूरी नहीं मानी जाती। ये है संजाब नस्ल के शक्ति घोड़े का कान छूना और पीपल के सूखे पेड़ पर अकाल मौत वाले व्यक्ति की फोटो फ्रेम लगाना। आत्माओं और पितरों की शांति की कामना का ये पिशाचमोचन का आखिरी पड़ाव और प्रक्रिया दोनों है।
पिशाचमोचन पर संजाब नस्ल के दो घोड़े पितृपक्ष के एक दिन पहले से खड़े हैं। इनका काम सालभर में सिर्फ श्राद्ध के 15 दिन होता है। बाकी दिन विवाह के लिए बुकिंग होती है। इसके अलावा इलाके में 10-15 पीपल के पेड़ हैं जिनपर कुछ 500 फोटो टंगे हैं।
वहां मौजूद पंडित अमित मिश्रा कहते हैं, ये उद्दंड आत्माओं की फोटो हैं। वे आत्माएं जो सुकून से विदा नहीं हुईं, जिनकी मौत अचानक हुई और जो भटकती रहीं। 30 साल पहले मर चुके गाजीपुर के मुख्तार की पत्नी और बेटी श्राद्ध कराने यहीं पहुंची थी। उनका कहना था कि वो हिंदू ही हैं लेकिन पति का नाम मुख्तार नाम था। पति सपने में आते थे और इससे उन्हें डर लगता था।
गरीब और धनवान सभी एक जगह बैठकर पारते हैं पिंडा
पिशाचमोचन में गरीब और धनवान सभी एक जगह बैठकर पिंडा पारते नजर आते हैं। इनमें नेता, जज, फिल्म स्टार और सम्पन्न परिवार भी शामिल हैं। यहां एक मृतक के तर्पण का रेट 15 से 20 हजार और कई बार 30 हजार रुपये तक चला जाता है। भीड़ ऐसी है कि कुंड के किनारों के अलावा आसपास बने पांच-छह भवनों में भी एक साथ इन 15 दिन श्राद्धकर्म कराया जाता है।
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यहां अकाल मौत से मुक्ति के लिए पीपल के पेड़ पर फोटो फ्रेम लगाकर पितरों को बैठाया जाता है। कील भी ठोकी जाती है, ये श्राद्ध पूजा के पैकेज में ही शामिल है। इसके अलावा घोड़े का कान, भैंस की सींग और गाय की पूंछ छूकर पितरों के नाम पर नियमित दान करने की भी परंपरा है। संजाब नस्ल के जिस घोड़े का कान पिशाचमोचन पर छुआ जा रहा है उसका नाम शक्ति है। ये घोड़ा हर दिन कम से कम 50 हजार रुपये कमा लेता है। एक व्यक्ति कम से कम 10 रुपये कान छूने के देता है।
सबसे महंगा श्राद्ध अकाल मौत के लिए नारायण बलि है
पिशाचमोचन में सबसे महंगा श्राद्ध अकाल मौत के लिए नारायण बलि है। पांच ब्राह्मणों से नारायण बलि का श्राद्ध कराने के 15 हजार रुपये, त्रिपिंडी श्राद्ध के 8 हजार रुपये और पार्वण श्राद्ध का खर्च 2500 रुपये है। गयातीर्थ और गया श्राद्ध का दाम तय नहीं है। 1100 से लेकर 2500 या इससे ज्यादा भी हो सकता है। यदि घर में एक साथ कई लोगों की मौत हो गई तो प्रति व्यक्ति श्राद्ध का खर्च देना होगा। हर किसी के लिए कम से कम 15-15 हजार रुपये देने होंगे। पांच की अकाल मौत हुई तो सबकी अलग-अलग नारायण बलि दी जाती है।
एक तर्पण में लगते हैं डेढ़ से दो घंटे
पिशाचमोचन में मुन्ना पंडा के परिवार के लोग ही प्रमुख महंत होते हैं। वरना यहां 400 पंडे 15 दिन के लिए खासतौर पर श्राद्ध करवाने का काम करते हैं। जिस स्थान पर बैठकर तर्पण कराते हैं उसका हर व्यक्ति से 500 रुपये किराया लिया जाता है। एक तर्पण में डेढ़ से दो घंटे लगते हैं। यहां काम सूर्योदय होते ही शुरू हो जाता है और आधी रात तक चलता है। ये सभी पंडे हाईटेक हैं। इनके पास वॉकी टॉकी है। पानी चाहिए, गोबर या फिर दूध वॉकी टॉकी से बात कर ऑर्डर कर दिया जाता है। सफाई करनेवाले को भी इसी से बुलाते हैं। यहां आनेवाले यजमान को खाली हाथ सिर्फ दक्षिणा लेकर आना होता है। सारा सामान पैकेज सहित यहीं मिल जाता है।
पिशाचमोचन के महंत मुन्नालाल पंडा के परिवार के नीरज पांडे बताते हैं कि यहां आधे से ज्यादा लोग अकाल मौत वाले ही होते हैं। मान्यता है कि पिशाचमोचन पर प्रेत बाधा से मुक्ति मिलती है। लोगों को आर्थिक, सामाजिक और शारीरिक दिक्कतों को दूर करने के लिए भी श्राद्धकर्म यहीं करना ही होता है।