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Almora News: साल के पहले चंद्रग्रहण पर जागेश्वर धाम सहित कई मंदिरों के कपाट रहे बंद
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अल्मोड़ा/ जागेश्वर। होली पर साल का पहला चंद्रग्रहण लगा। सूतक काल में जागेश्वर धाम, रघुनाथ मंदिर समेत अन्य प्रमुख मंदिरों के कपाट बंद रहे। ग्रहण समाप्ति के बाद मंदिरों की विधिवत शुद्धि की गई इसके बाद कपाट खोले गए।
मंगलवार को अपराह्न 3:30 बजे से शाम 6:47 बजे तक चंद्रग्रहण लगा। शास्त्रों के अनुसार चंद्रग्रहण का सूतक ग्रहण प्रारंभ होने से ठीक नाै घंटे पहले शुरू हो जाता है। इसी परंपरा का पालन करते हुए अल्मोड़ा के मंदिरों में भी निर्धारित समय से पहले कपाट बंद कर दिए गए। सूतक काल लगते ही मंदिरों में नियमित पूजा-पाठ स्थगित रहा। इस दौरान घरों में भी मूर्ति पूजा नहीं हुई। नगर के खजांची बाजार स्थित श्री रघुनाथ मंदिर के पुजारी पंडित नीरज लोहनी बताया कि सुबह 6:10 बजे तक मंदिर में आरती कर ली थी। इसके बाद कपाट बंद किए गए। शाम को ग्रहण समाप्ति के बाद देवताओं की मूर्ति को स्नान कराकर शुद्धि किया गया। उसके बाद शाम की आरती हुई।
बताया हिंदू धर्म में सूतक काल का विशेष महत्व है। धार्मिक मान्यता है कि ग्रहण से पहले का समय वातावरण में नकारात्मक ऊर्जा के बढ़ने का संकेत देता है इसलिए इस अवधि में विशेष सावधानियां बरतने की सलाह दी जाती है। इधर चंद्रग्रहण के सूतक काल में विश्व प्रसिद्ध जागेश्वर धाम में मंगलवार की सुबह 6:22 बजे मंदिर के कपाट पूर्ण रूप से बंद कर दिए गए। मंदिर समिति और जागेश्वर धाम के पुजारी कैलाशानंद महाराज ने बताया कि ग्रहण काल में धार्मिक अनुष्ठान और दर्शन-पूजन वर्जित रहते हैं। इसी परंपरा का पालन करते हुए सभी मंदिरों के कपाट निर्धारित समय पर बंद किए गए। चंद्र ग्रहण की समाप्ति के बाद शुद्धिकरण प्रक्रिया हुई। इसके बाद मंदिरों के कपाट पुनः शाम की आरती व श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए गए।
रानीखेत के मंदिरों के कपाट दिनभर बंद
रानीखेत (अल्मोड़ा)। चंद्रग्रहण को देखते हुए नगर के प्रमुख मंदिरों के कपाट पूरे दिन बंद रहे। सूतक काल शुरू होने से पहले मंदिरों में विधि-विधान से पूजा-अर्चना संपन्न कर कपाट बंद कर दिए गए। नगर के पंचेश्वर महादेव मंदिर, नीलकंठ महादेव मंदिर, पिपलेश्वर महादेव मंदिर सहित सभी मंदिरों में सुबह से ही श्रद्धालुओं की आवाजाही रही। नीलकंठ महादेव मंदिर के पुजारी उमाशंकर पंत ने बताया कि सुबह सात बजे से पहले मंदिर में आरती और पूजा संपन्न कर ली गई थी। सूतक काल आरंभ होने से पूर्व ही मंदिर के कपाट बंद कर दिए गए। उन्होंने बताया कि ग्रहण के दिन सूतक काल से पहले स्नान और पूजा-पाठ किया जाता है। ग्रहण स्पर्श होने के बाद जप, पूजा और अर्चना की जाती है। ग्रहण समाप्ति के बाद स्नान कर जनेऊ बदली जाती है व भगवान की पूजा-अर्चना कर चंद्रमा के निमित्त दान किया जाता है। संवाद
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मंगलवार को अपराह्न 3:30 बजे से शाम 6:47 बजे तक चंद्रग्रहण लगा। शास्त्रों के अनुसार चंद्रग्रहण का सूतक ग्रहण प्रारंभ होने से ठीक नाै घंटे पहले शुरू हो जाता है। इसी परंपरा का पालन करते हुए अल्मोड़ा के मंदिरों में भी निर्धारित समय से पहले कपाट बंद कर दिए गए। सूतक काल लगते ही मंदिरों में नियमित पूजा-पाठ स्थगित रहा। इस दौरान घरों में भी मूर्ति पूजा नहीं हुई। नगर के खजांची बाजार स्थित श्री रघुनाथ मंदिर के पुजारी पंडित नीरज लोहनी बताया कि सुबह 6:10 बजे तक मंदिर में आरती कर ली थी। इसके बाद कपाट बंद किए गए। शाम को ग्रहण समाप्ति के बाद देवताओं की मूर्ति को स्नान कराकर शुद्धि किया गया। उसके बाद शाम की आरती हुई।
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बताया हिंदू धर्म में सूतक काल का विशेष महत्व है। धार्मिक मान्यता है कि ग्रहण से पहले का समय वातावरण में नकारात्मक ऊर्जा के बढ़ने का संकेत देता है इसलिए इस अवधि में विशेष सावधानियां बरतने की सलाह दी जाती है। इधर चंद्रग्रहण के सूतक काल में विश्व प्रसिद्ध जागेश्वर धाम में मंगलवार की सुबह 6:22 बजे मंदिर के कपाट पूर्ण रूप से बंद कर दिए गए। मंदिर समिति और जागेश्वर धाम के पुजारी कैलाशानंद महाराज ने बताया कि ग्रहण काल में धार्मिक अनुष्ठान और दर्शन-पूजन वर्जित रहते हैं। इसी परंपरा का पालन करते हुए सभी मंदिरों के कपाट निर्धारित समय पर बंद किए गए। चंद्र ग्रहण की समाप्ति के बाद शुद्धिकरण प्रक्रिया हुई। इसके बाद मंदिरों के कपाट पुनः शाम की आरती व श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए गए।
रानीखेत के मंदिरों के कपाट दिनभर बंद
रानीखेत (अल्मोड़ा)। चंद्रग्रहण को देखते हुए नगर के प्रमुख मंदिरों के कपाट पूरे दिन बंद रहे। सूतक काल शुरू होने से पहले मंदिरों में विधि-विधान से पूजा-अर्चना संपन्न कर कपाट बंद कर दिए गए। नगर के पंचेश्वर महादेव मंदिर, नीलकंठ महादेव मंदिर, पिपलेश्वर महादेव मंदिर सहित सभी मंदिरों में सुबह से ही श्रद्धालुओं की आवाजाही रही। नीलकंठ महादेव मंदिर के पुजारी उमाशंकर पंत ने बताया कि सुबह सात बजे से पहले मंदिर में आरती और पूजा संपन्न कर ली गई थी। सूतक काल आरंभ होने से पूर्व ही मंदिर के कपाट बंद कर दिए गए। उन्होंने बताया कि ग्रहण के दिन सूतक काल से पहले स्नान और पूजा-पाठ किया जाता है। ग्रहण स्पर्श होने के बाद जप, पूजा और अर्चना की जाती है। ग्रहण समाप्ति के बाद स्नान कर जनेऊ बदली जाती है व भगवान की पूजा-अर्चना कर चंद्रमा के निमित्त दान किया जाता है। संवाद