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Bageshwar News: नरगोली में 38 घरों की बाखली में सिर्फ चार परिवार बाकी
संवाद न्यूज एजेंसी, बागेश्वर
Updated Sun, 22 Mar 2026 11:57 PM IST
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कांडा के नरगोली गांव में पलायन केकारण बंद और वीरान पड़े घर। संवाद
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बागेश्वर/कांडा। पलायन का असली दर्द सीमांत के गांवों में साफ दिखाई देता है। कांडा तहसील का नरगोली गांव इसी हकीकत की जीती-जागती कहानी है। जहां कभी आबादी और रौनक थी आज वहां खामोशी पसरी हुई है। सुविधाओं के अभाव से अब तक 114 परिवार गांव छोड़कर कस्बों और महानगरों में बस चुके हैं। इस गांव की 38 घरों की एक बाखली में सिर्फ चार परिवार बाकी हैं।
नरगोली गांव बागेश्वर जिले के कांडा तहसील मुख्यालय से करीब 35 किमी दूर और पिथौरागढ़ जिले की सीमा से सटा है। भौगोलिक रूप से भले नजदीक हो लेकिन सुविधाओं के लिहाज से आज भी दूर है। विकास की कमी धीरे-धीरे पूरे सामाजिक ताने-बाने को कमजोर कर रही है। यह बेड़ीनाग महज नौ किमी दूर है। ग्रामीणों की रोजमर्रा की जरूरतें भी वहीं से पूरी होती हैं लेकिन वहां तक जाने वाली सड़क बदहाल है। संचार सुविधा का अभाव अलग से समस्या खड़ी करता है। गांव में पानी और बिजली तो है लेकिन जंगली जानवरों के कारण खेतीबाड़ी करना मुश्किल होता जा रहा है। स्वास्थ्य सेवाओं के लिए लोगों को सीएचसी कांडा पर निर्भर रहना पड़ता है। प्रशासनिक अनदेखी ने इस गांव को धीरे-धीरे खाली कर दिया है।
स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी जिंदगी पर भारी
स्वास्थ्य सेवाओं की कमी गांव के लिए सबसे बड़ी समस्या बनी हुई है। बीते वर्षों में इसका दर्दनाक स्वरूप भी सामने आया। वर्ष 2010, 2011 और 2018 में तीन गर्भवती महिलाओं की अस्पताल पहुंचने से पहले ही मौत हो गई थी। हाल ही में ग्रामीण लाल सिंह रौतेला ने भी हायर सेंटर हल्द्वानी ले जाते समय रास्ते में दम तोड़ दिया। यह घटनाएं बताती हैं कि स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव किस तरह जानलेवा बन रहा है।
जो पढ़-लिख गए, वो नहीं लौटे
कभी नरगोली गांव क्षेत्र के बड़े गांवों में गिना जाता था। 70 के दशक में यहां करीब 90 परिवार रहते थे। शिक्षा के प्रति जागरूकता के चलते 1960 से 1975 के बीच यहां के करीब 20 युवाओं ने उच्च शिक्षा हासिल की और फिर रोजगार की तलाश में शहरों की ओर चले गए। 1986 तक गांव में 78 परिवार बचे। इसके बाद पलायन का सिलसिला तेज होता गया। आज स्थिति यह है कि गांव में केवल 39 परिवार रह गए हैं। बाकी घर साल में दो-तीन बार ही खुलते हैं जब प्रवासी अपने गांव लौटते हैं।
क्या कहते हैं ग्रामीण
सुविधाओं की कमी के कारण गांव खाली हो रहा है। अब भी लोगों के गांव छोड़ने का सिलसिला थमा नहीं है। बेड़ीनाग-नरगोली-खातीगांव सड़क से लोग आते-जाते हैं लेकिन इसकी बदहाली सुधारने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया जा रहा। -दरपान सिंह रौतेला, ग्रामीण
शिक्षा, स्वास्थ्य और नौकरी के लिए लोग गांव छोड़ रहे हैं। यहां रहने वालों को रोज जंगली सुअर और बंदरों से खेती बचाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है। खेत भी धीरे-धीरे बंजर हो रहे हैं। -गीता रौतेला, ग्रामीण
युवा पीढ़ी गांव से बाहर रह रही है। यहां केवल बुजुर्ग बचे हैं। सड़क, संचार, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और जंगली जानवर हर मोर्चे पर गांव जूझ रहा है। -इंदिरा रौतेला, ग्रामीण
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नरगोली गांव बागेश्वर जिले के कांडा तहसील मुख्यालय से करीब 35 किमी दूर और पिथौरागढ़ जिले की सीमा से सटा है। भौगोलिक रूप से भले नजदीक हो लेकिन सुविधाओं के लिहाज से आज भी दूर है। विकास की कमी धीरे-धीरे पूरे सामाजिक ताने-बाने को कमजोर कर रही है। यह बेड़ीनाग महज नौ किमी दूर है। ग्रामीणों की रोजमर्रा की जरूरतें भी वहीं से पूरी होती हैं लेकिन वहां तक जाने वाली सड़क बदहाल है। संचार सुविधा का अभाव अलग से समस्या खड़ी करता है। गांव में पानी और बिजली तो है लेकिन जंगली जानवरों के कारण खेतीबाड़ी करना मुश्किल होता जा रहा है। स्वास्थ्य सेवाओं के लिए लोगों को सीएचसी कांडा पर निर्भर रहना पड़ता है। प्रशासनिक अनदेखी ने इस गांव को धीरे-धीरे खाली कर दिया है।
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स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी जिंदगी पर भारी
स्वास्थ्य सेवाओं की कमी गांव के लिए सबसे बड़ी समस्या बनी हुई है। बीते वर्षों में इसका दर्दनाक स्वरूप भी सामने आया। वर्ष 2010, 2011 और 2018 में तीन गर्भवती महिलाओं की अस्पताल पहुंचने से पहले ही मौत हो गई थी। हाल ही में ग्रामीण लाल सिंह रौतेला ने भी हायर सेंटर हल्द्वानी ले जाते समय रास्ते में दम तोड़ दिया। यह घटनाएं बताती हैं कि स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव किस तरह जानलेवा बन रहा है।
जो पढ़-लिख गए, वो नहीं लौटे
कभी नरगोली गांव क्षेत्र के बड़े गांवों में गिना जाता था। 70 के दशक में यहां करीब 90 परिवार रहते थे। शिक्षा के प्रति जागरूकता के चलते 1960 से 1975 के बीच यहां के करीब 20 युवाओं ने उच्च शिक्षा हासिल की और फिर रोजगार की तलाश में शहरों की ओर चले गए। 1986 तक गांव में 78 परिवार बचे। इसके बाद पलायन का सिलसिला तेज होता गया। आज स्थिति यह है कि गांव में केवल 39 परिवार रह गए हैं। बाकी घर साल में दो-तीन बार ही खुलते हैं जब प्रवासी अपने गांव लौटते हैं।
क्या कहते हैं ग्रामीण
सुविधाओं की कमी के कारण गांव खाली हो रहा है। अब भी लोगों के गांव छोड़ने का सिलसिला थमा नहीं है। बेड़ीनाग-नरगोली-खातीगांव सड़क से लोग आते-जाते हैं लेकिन इसकी बदहाली सुधारने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया जा रहा। -दरपान सिंह रौतेला, ग्रामीण
शिक्षा, स्वास्थ्य और नौकरी के लिए लोग गांव छोड़ रहे हैं। यहां रहने वालों को रोज जंगली सुअर और बंदरों से खेती बचाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है। खेत भी धीरे-धीरे बंजर हो रहे हैं। -गीता रौतेला, ग्रामीण
युवा पीढ़ी गांव से बाहर रह रही है। यहां केवल बुजुर्ग बचे हैं। सड़क, संचार, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और जंगली जानवर हर मोर्चे पर गांव जूझ रहा है। -इंदिरा रौतेला, ग्रामीण