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Bageshwar News: कूड़े के ढेर ने बदली चील की फितरत, शिकार छोड़ बन रही मुर्दाखोर
संवाद न्यूज एजेंसी, बागेश्वर
Updated Sun, 05 Apr 2026 11:10 PM IST
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बागेश्वर। शहरीकरण की तेज रफ्तार प्रकृति का संतुलन बिगाड़ने पर आमादा है। बढ़ती आबादी के साथ कूड़े के पहाड़ खड़े हो रहे हैं और इसका असर अब पक्षियों के व्यवहार तक पहुंच गया है। कभी आसमान से शिकार पर नजर गड़ाने वाली ब्लैक काइट प्रजाति की चील अब कूड़े के ढेरों पर भोजन तलाशती दिखाई दे रही है। वैज्ञानिकों के अनुसार यह बदलाव केवल एक पक्षी की आदत में परिवर्तन नहीं बल्कि जैव विविधता के लिए गंभीर चेतावनी है।
ब्लैक काइट उत्तराखंड समेत देशभर में पाई जाती है। कार्बेट के पक्षी विशेषज्ञ राजेश भट्ट बताते हैं कि शिकारी वर्ग का यह बड़ा पक्षी काफी ऊंचाई से अपने शिकार को पहचान लेता है। इसका मुख्य आहार चूहे, सांप, हिरण, बतख और खरगोश के छोटे बच्चे जैसे जीव होते हैं। अब यह चील अपने प्राकृतिक शिकार से दूर होकर कूड़े के ढेरों पर निर्भर होती जा रही है। यानी शिकारी की पहचान रखने वाला यह पक्षी धीरे-धीरे मुर्दाखोर और स्कैवेंजर की भूमिका अपनाने लगा है। महानगरों से लेकर छोटे कस्बों तक जहां भी कूड़े के ढेर हैं वहां चीलों का मंडराना आम दृश्य बनता जा रहा है। विशेषज्ञ मानते हैं कि पर्यावरण के प्रति मानवीय उदासीनता इस बदलाव का प्रमुख कारण है।
इनसेट
चीन, रुस, मंगोलिया की चील से हो रही प्रेरित
चीन, रुस और मंगोलिया से भी चील की उप प्रजातियां देश में प्रवास पर आती हैं। विदेश से आने वाली चीलें अक्सर अपना भोजन कूड़े के ढेर से ही तलाशती हैं। पिछले 11 साल से चील पर अध्ययन कर डाॅ. निशांत कुमार ने बताया कि शिकारी ब्लैक काइट भी अब इनका अनुसरण करने लगी हैं। चीलों का यह बदलता व्यवहार मनुष्य के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। कूड़े के ढेर में पाए जाने वाले घातक बैक्टीरिया को यह चील आबादी तक लाकर लोगों को बीमार कर सकती है। चील की बदलती भोजन प्रणाली से खेतों को नुकसान करने वाले चूहे, सांप जैसे जीवों की आबादी बढ़ने का भी खतरा है।
उत्तराखंड में पाई जाने वाली अन्य प्रमुख चील प्रजातियां
माउंटेन हॉक : मध्य हिमालय में पाई जाने वाली आक्रामक और साहसी चील जिसे सतंगू भी कहा जाता है।
स्टेपी चील : लोहाघाट और रामगढ़ जैसे क्षेत्रों में दिखाई देने वाली प्रवासी प्रजाति।
क्रेस्टेड सरपेंट ईगल : जंगलों, विशेषकर राजाजी क्षेत्र में पाई जाने वाली प्रमुख चील।
डस्की ईगल : हाल ही में उत्तराखंड में देखी गई दुर्लभ शिकारी प्रजाति।
कोट
शिकारी पक्षी ब्लैक काइट का कूड़े से भोजन छांटना प्रकृति और मनुष्य दोनों के लिए नुकसानदायक है। कूड़े के बढ़ते ढेर, डंप यार्ड और कचरा प्रबंधन के प्रति उदासीनता की समस्या को खत्म करने की पहल प्रत्येक नागरिक को करनी होगी। जैविक-अजैविक कूड़ा प्रबंधन के प्रति जागरूक होकर ही हम प्रकृति को उसके मूल स्वरूप में लाने में मदद कर सकते हैं। -डॉ. निशांत कुमार, डीबीटी/वेलकम ट्रस्ट इंडिया एलायंस फेलो, नेशनल सेंटर फॉर बायोलॉजिकल साइंसेज, टीआईएफआर, बंगलूरू
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ब्लैक काइट उत्तराखंड समेत देशभर में पाई जाती है। कार्बेट के पक्षी विशेषज्ञ राजेश भट्ट बताते हैं कि शिकारी वर्ग का यह बड़ा पक्षी काफी ऊंचाई से अपने शिकार को पहचान लेता है। इसका मुख्य आहार चूहे, सांप, हिरण, बतख और खरगोश के छोटे बच्चे जैसे जीव होते हैं। अब यह चील अपने प्राकृतिक शिकार से दूर होकर कूड़े के ढेरों पर निर्भर होती जा रही है। यानी शिकारी की पहचान रखने वाला यह पक्षी धीरे-धीरे मुर्दाखोर और स्कैवेंजर की भूमिका अपनाने लगा है। महानगरों से लेकर छोटे कस्बों तक जहां भी कूड़े के ढेर हैं वहां चीलों का मंडराना आम दृश्य बनता जा रहा है। विशेषज्ञ मानते हैं कि पर्यावरण के प्रति मानवीय उदासीनता इस बदलाव का प्रमुख कारण है।
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इनसेट
चीन, रुस, मंगोलिया की चील से हो रही प्रेरित
चीन, रुस और मंगोलिया से भी चील की उप प्रजातियां देश में प्रवास पर आती हैं। विदेश से आने वाली चीलें अक्सर अपना भोजन कूड़े के ढेर से ही तलाशती हैं। पिछले 11 साल से चील पर अध्ययन कर डाॅ. निशांत कुमार ने बताया कि शिकारी ब्लैक काइट भी अब इनका अनुसरण करने लगी हैं। चीलों का यह बदलता व्यवहार मनुष्य के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। कूड़े के ढेर में पाए जाने वाले घातक बैक्टीरिया को यह चील आबादी तक लाकर लोगों को बीमार कर सकती है। चील की बदलती भोजन प्रणाली से खेतों को नुकसान करने वाले चूहे, सांप जैसे जीवों की आबादी बढ़ने का भी खतरा है।
उत्तराखंड में पाई जाने वाली अन्य प्रमुख चील प्रजातियां
माउंटेन हॉक : मध्य हिमालय में पाई जाने वाली आक्रामक और साहसी चील जिसे सतंगू भी कहा जाता है।
स्टेपी चील : लोहाघाट और रामगढ़ जैसे क्षेत्रों में दिखाई देने वाली प्रवासी प्रजाति।
क्रेस्टेड सरपेंट ईगल : जंगलों, विशेषकर राजाजी क्षेत्र में पाई जाने वाली प्रमुख चील।
डस्की ईगल : हाल ही में उत्तराखंड में देखी गई दुर्लभ शिकारी प्रजाति।
कोट
शिकारी पक्षी ब्लैक काइट का कूड़े से भोजन छांटना प्रकृति और मनुष्य दोनों के लिए नुकसानदायक है। कूड़े के बढ़ते ढेर, डंप यार्ड और कचरा प्रबंधन के प्रति उदासीनता की समस्या को खत्म करने की पहल प्रत्येक नागरिक को करनी होगी। जैविक-अजैविक कूड़ा प्रबंधन के प्रति जागरूक होकर ही हम प्रकृति को उसके मूल स्वरूप में लाने में मदद कर सकते हैं। -डॉ. निशांत कुमार, डीबीटी/वेलकम ट्रस्ट इंडिया एलायंस फेलो, नेशनल सेंटर फॉर बायोलॉजिकल साइंसेज, टीआईएफआर, बंगलूरू