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Kotdwar News: छावनी क्षेत्रों के पुनर्गठन की कवायद तेज, नीति आयोग ने शुरू किया अध्ययन
Fri, 26 Jun 2026 06:25 PM IST
देहरादून ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कोटद्वार
संवाद न्यूज एजेंसी, कोटद्वार
Updated Fri, 26 Jun 2026 06:25 PM IST
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सिविल क्षेत्रों के स्थानीय निकायों में विलय और छावनी कानूनों में संशोधन पर होगा मंथन
लैंसडौन। देश की ब्रिटिशकालीन छावनी व्यवस्था में व्यापक बदलाव की दिशा में केंद्र सरकार ने एक बार फिर पहल तेज कर दी है। नीति आयोग ने देश के प्रमुख शहरी छावनी क्षेत्रों के वर्तमान स्वरूप, उनकी उपयोगिता और आवश्यक सुधारों को लेकर अध्ययन शुरू किया है। इस पहल से छावनी क्षेत्रों में रहने वाले नागरिकों को लंबे समय से चली आ रही प्रशासनिक और कानूनी जटिलताओं से राहत मिलने की उम्मीद बढ़ गई है।
अखिल भारतीय कैंट सिटीजन वेलफेयर एसोसिएशन से जुड़े हितेश शर्मा ने बताया कि नीति आयोग शहरी क्षेत्रों की बड़ी सैन्य छावनियों में सुधार की संभावनाओं का विस्तृत अध्ययन कर रहा है। इसका उद्देश्य सैन्य परिसरों को आधुनिक सैन्य स्टेशनों के रूप में विकसित करना और छावनी के सिविल क्षेत्रों को संबंधित नगर निकायों या नगर पालिकाओं में शामिल करने की संभावनाओं का मूल्यांकन करना है। अध्ययन के दौरान छावनी अधिनियम और उससे जुड़े कानूनों में आवश्यक संशोधनों की भी सिफारिश की जाएगी।
इसके साथ ही सिविल क्षेत्रों के सुरक्षित और व्यवस्थित विलय के लिए कार्ययोजना तैयार की जाएगी। वर्तमान में छावनी क्षेत्रों के नागरिक इलाकों में पेयजल, सड़क, चिकित्सा, शिक्षा, भवन निर्माण और विभिन्न प्रकार के अनुमति संबंधी कार्य छावनी प्रशासन के अधीन होते हैं। इन कार्यों में नागरिकों को सैन्य नियमों का पालन करना पड़ता है जिससे कई बार विकास कार्य प्रभावित होते हैं।
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रक्षा मंत्रालय ने वर्ष 2022 में छावनी क्षेत्रों के सिविल हिस्सों को स्थानीय निकायों को हस्तांतरित करने की प्रक्रिया शुरू की थी। इस दिशा में हिमाचल प्रदेश की योल छावनी देश की पहली छावनी बनी जहां सिविल क्षेत्र का स्थानीय निकाय में विलय किया गया। हालांकि भूमि स्वामित्व, राजस्व और वित्तीय संसाधनों के बंटवारे जैसे मुद्दों पर रक्षा मंत्रालय और राज्य सरकारों के बीच सहमति नहीं बनने से अन्य 61 छावनियों में यह प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी।
हितेश शर्मा ने कहा कि सबसे बड़ी चुनौती छावनी क्षेत्रों की जटिल भूमि व्यवस्था है। ब्रिटिशकाल में ओल्ड ग्रांट और पट्टा प्रणाली के तहत दी गई भूमि का स्वामित्व केंद्र सरकार के पास है जबकि कई परिवार पीढ़ियों से इन भूखंडों पर रह रहे हैं। ऐसे में सिविल क्षेत्रों के स्थानीय निकायों में विलय के दौरान भूमि अधिकारों का स्पष्ट निर्धारण सबसे अहम मुद्दा होगा।
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लैंसडौन। देश की ब्रिटिशकालीन छावनी व्यवस्था में व्यापक बदलाव की दिशा में केंद्र सरकार ने एक बार फिर पहल तेज कर दी है। नीति आयोग ने देश के प्रमुख शहरी छावनी क्षेत्रों के वर्तमान स्वरूप, उनकी उपयोगिता और आवश्यक सुधारों को लेकर अध्ययन शुरू किया है। इस पहल से छावनी क्षेत्रों में रहने वाले नागरिकों को लंबे समय से चली आ रही प्रशासनिक और कानूनी जटिलताओं से राहत मिलने की उम्मीद बढ़ गई है।
अखिल भारतीय कैंट सिटीजन वेलफेयर एसोसिएशन से जुड़े हितेश शर्मा ने बताया कि नीति आयोग शहरी क्षेत्रों की बड़ी सैन्य छावनियों में सुधार की संभावनाओं का विस्तृत अध्ययन कर रहा है। इसका उद्देश्य सैन्य परिसरों को आधुनिक सैन्य स्टेशनों के रूप में विकसित करना और छावनी के सिविल क्षेत्रों को संबंधित नगर निकायों या नगर पालिकाओं में शामिल करने की संभावनाओं का मूल्यांकन करना है। अध्ययन के दौरान छावनी अधिनियम और उससे जुड़े कानूनों में आवश्यक संशोधनों की भी सिफारिश की जाएगी।
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इसके साथ ही सिविल क्षेत्रों के सुरक्षित और व्यवस्थित विलय के लिए कार्ययोजना तैयार की जाएगी। वर्तमान में छावनी क्षेत्रों के नागरिक इलाकों में पेयजल, सड़क, चिकित्सा, शिक्षा, भवन निर्माण और विभिन्न प्रकार के अनुमति संबंधी कार्य छावनी प्रशासन के अधीन होते हैं। इन कार्यों में नागरिकों को सैन्य नियमों का पालन करना पड़ता है जिससे कई बार विकास कार्य प्रभावित होते हैं।
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रक्षा मंत्रालय ने वर्ष 2022 में छावनी क्षेत्रों के सिविल हिस्सों को स्थानीय निकायों को हस्तांतरित करने की प्रक्रिया शुरू की थी। इस दिशा में हिमाचल प्रदेश की योल छावनी देश की पहली छावनी बनी जहां सिविल क्षेत्र का स्थानीय निकाय में विलय किया गया। हालांकि भूमि स्वामित्व, राजस्व और वित्तीय संसाधनों के बंटवारे जैसे मुद्दों पर रक्षा मंत्रालय और राज्य सरकारों के बीच सहमति नहीं बनने से अन्य 61 छावनियों में यह प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी।
हितेश शर्मा ने कहा कि सबसे बड़ी चुनौती छावनी क्षेत्रों की जटिल भूमि व्यवस्था है। ब्रिटिशकाल में ओल्ड ग्रांट और पट्टा प्रणाली के तहत दी गई भूमि का स्वामित्व केंद्र सरकार के पास है जबकि कई परिवार पीढ़ियों से इन भूखंडों पर रह रहे हैं। ऐसे में सिविल क्षेत्रों के स्थानीय निकायों में विलय के दौरान भूमि अधिकारों का स्पष्ट निर्धारण सबसे अहम मुद्दा होगा।