High Court: आत्महत्या के लिए उकसाने के अपराध में प्रमाण जरूरी, अन्य धाराओं के मामले में एफआईआर रद्द
उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने राजपुर थाने में दर्ज आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में प्राथमिक साक्ष्य के अभाव में एफआईआर और सभी आपराधिक कार्यवाहियां रद्द कर दीं।
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उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने व्यवस्था दी है कि आत्महत्या के लिए उकसाने के अपराध में उकसावा, साजिश या सहायता का प्राथमिक प्रमाण मिलना जरूरी है। केवल आर्थिक या व्यक्तिगत विवाद ही अपने आप में उकसावे का अपराध सिद्ध नहीं करते।
देहरादून के राजपुर थाने में दर्ज आत्महत्या के लिए उकसाने सहित अन्य धाराओं के मामले में एफआईआर और उससे जुड़ी सभी आपराधिक कार्यवाहियां रद्द करते हुए न्यायमूर्ति आशीष नैथानी ने संयुक्त रूप से चार याचिकाओं पर सुनवाई के बाद यह फैसला दिया। मामले के अनुसार 24 मई 2024 को थाना राजपुर, देहरादून में दर्ज एफआईआर पर अजय कुमार गुप्ता एवं अनिल कुमार गुप्ता ने अलग-अलग रिट याचिकाएं दायर की थीं।
सभी मामलों में आरोप एक ही एफआईआर से जुड़े थे। इन में आरोप लगाया गया था कि आवेदकों के आचरण और दबाव के कारण मृतक ने आत्महत्या की। एक कथित सुसाइड नोट पर आधारित था, जिसमें आवेदकों का नाम होने का दावा किया गया था। जांच के दौरान आत्महत्या के लिए उकसाने के अलावा जबरन वसूली, धोखाधड़ी और आपराधिक षड्यंत्र के आरोप भी जोड़े गए थे। सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि सुसाइड नोट की प्रमाणिकता स्पष्ट नहीं थी। कोर्ट ने माना कि जब पूरा मामला सुसाइड नोट पर आधारित है और उसी की प्रमाणिकता संदिग्ध है, तो मामला कानूनी रूप से कमजोर है। कोर्ट ने कहा कि आत्महत्या के लिए उकसाने के अपराध में स्पष्ट उकसावा, साजिश या जानबूझकर सहायता का प्रमाण होना जरूरी है। केवल आर्थिक या व्यक्तिगत विवाद अपने आप में उकसावे का अपराध सिद्ध नहीं करते। कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई प्रत्यक्ष या निकट संबंध नहीं दिखता, जिससे साबित हो कि आवेदकों की हरकतों ने मृतक को आत्महत्या के लिए मजबूर किया। कोर्ट ने माना कि एफआईआर और जांच सामग्री आरोप सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं है। इस आधार पर कोर्ट ने एफआईआर निरस्त करते हुए सभी लंबित आपराधिक कार्यवाहियां रद्द कर दीं।