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हिमालयी जलस्रोत हमारी जीवनरेखा : प्रो. रीतेश साह
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नैनीताल। हिंदू कुश हिमालयी क्षेत्र में प्राकृतिक जलस्रोतों के संरक्षण और पारंपरिक जल प्रबंधन पर हुई संगोष्ठी में विशेषज्ञों ने इन स्रोतों को सभ्यता और पारिस्थितिकी की जीवनरेखा बताया। यह संगोष्ठी सोमवार को कुमाऊं विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग और यूजीसी एमएमटीसी के संयुक्त आयोजन में हुई।
अंतरराष्ट्रीय एकीकृत पर्वतीय विकास केंद्र, काठमांडू के डॉ. संजीव कुमार भुचर मुख्य अतिथि रहे। उन्होंने कहा कि पर्वतीय समाज का इन स्रोतों से गहरा सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जुड़ाव है। डॉ. भुचर ने नेपाल की हिटी प्रणाली और पोखरी जैसी परंपराओं का उदाहरण दिया। उन्होंने पारंपरिक ज्ञान और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के मेल को महत्वपूर्ण बताया। मुख्य वक्ता राजेंद्र सिंह रावल ने भारत-नेपाल के साझा हिमालयी क्षेत्र में सीमावर्ती जल सहयोग को अनिवार्य बताया। उन्होंने जलवायु परिवर्तन और शहरीकरण को इन स्रोतों के अस्तित्व के लिए खतरा बताया। रावल ने दस्तावेजीकरण की आवश्यकता पर बल दिया।
प्रो. रीतेश साह ने मानसखंड की नौले, धारे और खाल-चाल जैसी पारंपरिक जल प्रणालियों को जीवन का आधार बताया। उन्होंने इन्हें क्षेत्र की अनमोल सांस्कृतिक धरोहर भी कहा। प्रो. पीसी तिवारी ने नौलों-धारों के पुनर्जीवन में स्थानीय समुदायों और युवाओं की भागीदारी को अनिवार्य बताया। उन्होंने डेटा-आधारित शोध, सुदृढ़ जल नीति और भारत-नेपाल के बीच द्विपक्षीय सहयोग को स्थायी समाधान का आधार माना। इस अवसर पर सपना महर और डॉ. किरण तिवारी को सर्वश्रेष्ठ प्रस्तुतीकरण का प्रमाणपत्र दिया गया।
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अंतरराष्ट्रीय एकीकृत पर्वतीय विकास केंद्र, काठमांडू के डॉ. संजीव कुमार भुचर मुख्य अतिथि रहे। उन्होंने कहा कि पर्वतीय समाज का इन स्रोतों से गहरा सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जुड़ाव है। डॉ. भुचर ने नेपाल की हिटी प्रणाली और पोखरी जैसी परंपराओं का उदाहरण दिया। उन्होंने पारंपरिक ज्ञान और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के मेल को महत्वपूर्ण बताया। मुख्य वक्ता राजेंद्र सिंह रावल ने भारत-नेपाल के साझा हिमालयी क्षेत्र में सीमावर्ती जल सहयोग को अनिवार्य बताया। उन्होंने जलवायु परिवर्तन और शहरीकरण को इन स्रोतों के अस्तित्व के लिए खतरा बताया। रावल ने दस्तावेजीकरण की आवश्यकता पर बल दिया।
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प्रो. रीतेश साह ने मानसखंड की नौले, धारे और खाल-चाल जैसी पारंपरिक जल प्रणालियों को जीवन का आधार बताया। उन्होंने इन्हें क्षेत्र की अनमोल सांस्कृतिक धरोहर भी कहा। प्रो. पीसी तिवारी ने नौलों-धारों के पुनर्जीवन में स्थानीय समुदायों और युवाओं की भागीदारी को अनिवार्य बताया। उन्होंने डेटा-आधारित शोध, सुदृढ़ जल नीति और भारत-नेपाल के बीच द्विपक्षीय सहयोग को स्थायी समाधान का आधार माना। इस अवसर पर सपना महर और डॉ. किरण तिवारी को सर्वश्रेष्ठ प्रस्तुतीकरण का प्रमाणपत्र दिया गया।