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Nainital: विलुप्त होने के कगार पर पहुंचे पटवा को वैज्ञानिकों ने दिया नया जीवन, शोध कार्य पूरा; ये हैं खूबियां

अमर उजाला नेटवर्क, नैनीताल Published by: Heera Updated Wed, 10 Jun 2026 12:22 PM IST
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सार

कुमाऊं विश्वविद्यालय ने आईयूसीएन की रेड लिस्ट में शामिल विलुप्तप्राय दुर्लभ पौधे पटवा को नया जीवन देने में सफलता हासिल की है। कुलपति प्रो. दीवान सिंह रावत और प्रो. तपन नैनवाल के नेतृत्व में विशेष प्रोजेक्ट के तहत यह उपलब्धि मिली है।

 

Kumaun University has completed research work on the conservation of Patwa
पटवा - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

कुमाऊं विश्वविद्यालय ने विलुप्त होने के कगार पर पहुंचे दुनिया के सबसे दुर्लभ और कीमती पौधों में से एक पटवा (मीजोट्रोपिस पेलिटा) को नया जीवन देने में सफलता हासिल की है। अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (आईयूसीएन) की रेड लिस्ट में शामिल इस पौधे को बचाने के लिए विवि के कुलपति प्रो. दीवान सिंह रावत और बायोटेक्नोलॉजी विभाग के प्रो. तपन नैनवाल की टीम ने एक विशेष प्रोजेक्ट के तहत पहल की है।

जंगलों की कटाई और प्राकृतिक रूप से नए पौधे पैदा करने की बेहद कमजोर क्षमता के कारण पटवा का अस्तित्व मिटने की कगार पर था। यह पौधा न सिर्फ पर्यावरण के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है बल्कि रिसर्च में इसमें रोगाणुरोधी (एंटी-माइक्रोबियल) गुण भी पाए गए हैं जिससे भविष्य में कई गंभीर बीमारियों की दवाइयां बनाई जा सकती हैं। इस बहुमूल्य वनस्पति को विलुप्त होने से बचाने के लिए वैज्ञानिकों ने प्रयोगशाला में आधुनिक इन-विट्रो और माइक्रोप्रोपेगेशन विधि का इस्तेमाल किया। इसकी मदद से लैब के भीतर नियंत्रित तापमान और पोषण में बेहद कम समय में एक ही पौधे से कई सारे नए और स्वस्थ पौधे तैयार किए गए ताकि इनकी संख्या तेजी से बढ़ाई जा सके। लैब में सफलता मिलने के बाद वैज्ञानिकों ने इन पौधों को उनके प्राकृतिक आवास में सुरक्षित रखने के लिए पटवाडांगर में पिछले महीने 80 पौधों का एक विशेष पटवा गार्डन तैयार किया है जहां अब इनकी विशेष देखरेख की जा रही है। प्रो. तपन नैनवाल के अनुसार पटवा पौधों के निरीक्षण में हार्निंग की पुष्टि हुई है।

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पटवाडांगर में ही पाया जाता है पटवा
दुर्लभ औषधीय पौधा पटवा देश में मुख्य रूप से नैनीताल के पटवाडांगर क्षेत्र में पाया जाता है। अत्यंत दुर्लभ और संकटग्रस्त वनस्पति की बहुतायत और विशिष्ट उपस्थिति के कारण ही इस स्थान का नाम पटवाडांगर पड़ा है। नेपाल के डोटी जिले की पहाड़ियों में भी इसकी मौजूदगी के प्रमाण हैं।

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ये हैं खूबियां
पटवा की मुख्य खूबी इसका एंटीऑक्सीडेंट और एंटीबैक्टीरियल होना है। पटवा के पत्तों से निकलने वाला तेल दवाओं में सिंथेटिक रसायनों की जगह ले सकता है। फार्मास्युटिकल उद्योगों के लिए इसके पत्तों का तेल प्राकृतिक एंटीऑक्सीडेंट का एक बड़ा और असरदार जरिया है।

उत्तराखंड की जैव विविधता हमारी पर्यावरणीय धरोहर और भविष्य की जैविक सुरक्षा का आधार है। यह शोध समाज, पर्यावरण और विज्ञान के समन्वय का उत्कृष्ट उदाहरण है। कुमाऊं विवि आने वाले समय में हिमालयी पारिस्थितिकी और स्थानीय संसाधनों पर आधारित शोधों को नई दिशा देने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। - प्रो. डीएस रावत, कुलपति कुमाऊं विवि

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