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मायूसी का मलबा: हड़बाड़ आपदा को एक साल...अब भी नहीं सूखे आंसू, सरकारी वादे फेल; लोग अभी भी पुनर्वास की ताक में

Fri, 31 Jul 2026 12:17 PM IST
Heera पंकज जोशी
पंकज जोशी Published by: Heera Updated Fri, 31 Jul 2026 12:17 PM IST
सार

हड़बाड़ गांव में आपदा को एक साल पूरा होने को है, लेकिन पीड़ित परिवारों के जख्म अब भी ताजा हैं। लोग स्थायी पुनर्वास का इंतजार कर रहे हैं। 

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One year since the Bageshwar Hasbad disaster
आपदा के एक वर्ष बाद भी हालात नहीं सुधरे - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

बागेश्वर जिले के हड़बाड़ गांव में आई विनाशकारी आपदा को एक वर्ष पूरा होने वाला है लेकिन प्रभावित परिवारों के जख्मों पर मरहम नहीं लग सका है। अधिकांश पीड़ित अब तक स्थायी पुनर्वास की प्रतीक्षा कर रहे हैं। दरकती जमीन, क्षतिग्रस्त सड़कें और अस्थायी आश्रयों में गुजर-बसर प्रशासनिक दावों पर सवाल खड़ा कर रही है।

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अमर उजाला की टीम ने हड़बाड़ गांव के प्रभावित लोगों का हाल जाना। बीते वर्ष 13-14 अगस्त की रात लगातार बारिश के चलते इस गांव में भूस्खलन से भारी तबाही हुई। कई मकान क्षतिग्रस्त हो गए। कुछ पूरी तरह ढह गए। खेतों को भी नुकसान पहुंचा। सात परिवारों के घर पूरी तरह उजड़ गए। आज भी गांव की टूटी सड़कें, दरकी दीवारें और खिसकती जमीन उस भयावह आपदा की गवाही दे रही हैं।

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गांव के प्राथमिक विद्यालय में बने राहत शिविर में दिन काट रहे पूरन राम बात करते-करते रुंआसे हो उठते हैं। हाथ जोड़कर कहते हैं कि कुछ कीजिए। एक साल से दान की राशन किट पर जीवन पल रहा है। दोबारा भारी बारिश होने पर हालात फिर गंभीर हो सकते हैं। राजस्व विभाग के अनुसार आपदा के बाद सुशील सिंह, जगदीश सिंह, गणेश सिंह, राम सिंह, प्रताप राम, रोहित, बलवंत राम और ललित सिंह सहित कई प्रभावित परिवारों को अस्थायी ठिकानों में शरण दी गई थी। ग्रामीणों का कहना है कि आपदा के बाद प्रशासन और जनप्रतिनिधियों ने कई आश्वासन दिए लेकिन समय बीतने के साथ गांव की सुध लेने कोई नहीं आया।

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ग्राम प्रधान संगठन के जिलाध्यक्ष दीपक खेतवाल कहते हैं कि ज्यादातर बेघर परिवार अब तक स्थायी पुनर्वास और पर्याप्त मुआवजे का इंतजार कर रहे हैं। प्रशासनिक प्रक्रिया इतनी धीमी है कि आपदा से ज्यादा सिस्टम की मार से लोग बेहाल हैं। वह कहते हैं कि जल्द प्रभावी कदम न उठाए गए तो बड़े स्तर पर आंदोलन किया जाएगा।

नेता-अफसर सबके दावे ढहे
आपदा के बाद विस्थापन और मुआवजे को लेकर कई घोषणाएं की गईं लेकिन अधिकांश दावे सरकारी पत्राचार और बयानबाजी तक ही सीमित रहे। कमला देवी, प्रताप राम आदि ग्रामीणों का कहना है कि अधिकारी समय-समय पर निरीक्षण और कार्रवाई का भरोसा देते हैं मगर जमीनी स्तर पर कोई जमीनी प्रगति दिखाई नहीं देती। जिन परिवारों के मकान पूरी तरह नहीं गिरे वे भी दरकती जमीन के कारण लगातार भय के बीच जीवन बिता रहे हैं।

पुनर्वास के लिए बन रहे घर भी दरक गएप्रशासन दावा कर रहा है कि संकट में आए सात परिवारों के विस्थापन की प्रक्रिया चल रही है। आपदा के वक्त खतरे की जद में आए इन परिवारों को प्रशासन ने तत्काल प्राथमिक विद्यालय, आंगनबाड़ी केंद्र और पंचायत भवन में शिफ्ट किया गया था। एसडीएम प्रियंका रानी ने बताया कि प्रभावितों के विस्थापन के लिए पांच परिवारों के पास अपनी भूमि थी जबकि दो परिवारों को सरकारी पट्टा देकर आवास निर्माण के लिए चार-चार लाख रुपये की धनराशि स्वीकृत की गई थी। मकानों के निर्माण से पहले भूगर्भीय जांच भी कराई गई थी लेकिन निर्माण के दौरान चार घरों में दरारें आने से स्थिति गंभीर हो गई।

 

 

जांच के रास्ते में घिसट रहीं मदद की फाइलें
प्रशासन का कहना है कि हड़बाड़ और लाहुरघाटी के गांव अति संवेदनशील हैं। पुनर्वास के लिए बन रहे मकानों की दीवारों में दरार आने के बाद डीएम ने लोक निर्माण विभाग, ग्रामीण निर्माण विभाग, जिला पंचायत की तकनीकी टीम, राजस्व विभाग और भूगर्भ वैज्ञानिकों की संयुक्त टीम गठित कर भूमि और निर्माण कार्य की उच्चस्तरीय जांच के निर्देश दिए हैं। जांच टीम ने अपनी रिपोर्ट डीएम को सौंप दी है।

क्या कहते हैं प्रभावित
हम रोज अपने टूटे घर और आंगन को देखते हैं। हर दिन यही उम्मीद रहती है कि शायद अब कोई हमारी सुध लेने आएगा। बच्चों के भविष्य की चिंता हर समय सताती है। गांव का हिस्सा लगातार नीचे खिसक रहा है। पूरा परिवार डर के साये में जी रहा है। -बसंती देवी, आपदा प्रभावित

आपदा का वह दिन आज भी याद कर सिहर उठता हूं। मेरा घर को बच गया लेकिन दो भाइयों के परिवार बेघर हो गए। उनके परिवार आज भी अस्थायी व्यवस्था के सहारे जीवन गुजार रहे हैं। मैंने पूरा जीवन देकर देश की सेवा की। अब अपनों के लिए मदद मिलने का इंतजार है। -उदय सिंह, पूर्व सैनिक

हड़बाड़ अति संवेदनशील क्षेत्र है। वहां पहले भी घटनाएं हो चुकी हैं इसलिए सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए राहत कार्य चल रहे हैं। प्रशासन इस प्रकरण को पूरी संवेदनशीलता के साथ प्राथमिकता पर ले रहा है। निर्माण कार्यों के मानकों, गुणवत्ता और पूर्व में हुए भूगर्भीय सर्वे की गहनता से जांच की जारी है। -अपूर्वा पांडेय, जिलाधिकारी, बागेश्वर

आपदा प्रभावितों का पुनर्वास और उनके घरों का सुरक्षित निर्माण हमारी सबसे पहली प्राथमिकता है। हड़बाड़ क्षेत्र के प्रभावित परिवारों को हरसंभव मदद और सुरक्षित आवास उपलब्ध कराने के लिए शासन-प्रशासन स्तर पर लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। निर्माण कार्य में किसी भी प्रकार की लापरवाही या गुणवत्ता से समझौता बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। -सुरेश गढि़या, भाजपा विधायक, कपकोट

हड़बाड़ आपदा में शासन और प्रशासन पूरी तरह विफल है। प्रभावित परिवार आज भी राहत शिविरों में दिन काट रहे हैं। सहायता के तौर पर महज चार-चार लाख रुपये प्रभावितों को मकान के देकर खानापूर्ति की गई। प्रशासन की ओर से कराई गई भूगर्भीय जांच पूरी फेल हुई। निर्माण के दौरान दरारें आ गईं जिसका खामियाजा प्रभावितों को भोगना पड़ रहा है। -ललित फर्स्वाण, पूर्व कांग्रेस विधायक, कपकोट

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