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Uttarkashi News: सांस्कृतिक विरासत और आस्था का प्रतीक है बिस्सू मेला
संवाद न्यूज एजेंसी, उत्तर काशी
Updated Thu, 16 Apr 2026 06:00 PM IST
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बंगाण व पर्वत क्षेत्र में धूमधाम से मनाया जा रहा
पुरोला। बंगाण व पर्वत क्षेत्र के गांव-गांव में इन दिनों पौराणिक सांस्कृतिक विरासत और आस्था का प्रतीक बिस्सू मेला पूरे उत्साह और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। बैसाखी पर्व के साथ शुरू हुआ यह मेला आराकोट बंगाण के भुटाणु, जाकटा, चींवा और ढ़ड़ियार सहित कई गांवों में मनाया जा रहा है।
इसके अलावा बिस्सू मेला मोरी पर्वत क्षेत्र के लिवाड़ी, फिताड़ी, सट्टा, पुजेली, दौणी, खंयासणी व जखोल गांवों में स्थित महासू महाराज, सोमेश्वर महाराज और शिड़कुडिया महाराज के मंदिर परिसरों में एक सप्ताह तक भव्य रूप में आयोजित होगा। मेले के दौरान पारंपरिक रीति-रिवाजों के तहत गांव और पट्टी के साठी व पासांई दोनों तोक के बीच धनुष-बाण से प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती है।
प्रतियोगिता केवल खेल नहीं बल्कि क्षेत्र की खुशहाली, समृद्धि और लोक संस्कृति के संरक्षण का प्रतीक मानी जाती है। बैसाखी से पूर्व चारों महासू महाराज, सोमेश्वर व शिड़कुडिया देवता मंदिरों में ढोल-दमाऊं की थाप पर लोकनृत्य और पारंपरिक गीतों के माध्यम से श्रद्धालु अपनी आस्था और खुशी का इजहार करते हैं, जिससे पूरा क्षेत्र लोक रंग में रंगा नजर आता है।
मेले का सबसे आकर्षक और रोमांचक आयोजन ठोटे खेल है जो क्षेत्र की अनूठी पहचान है। खेल में प्रतिभागी धनुष-बाण के माध्यम से एक-दूसरे के घुटने के नीचे निशाना साधते हैं जिसे साहस और परंपरा का प्रतीक माना जाता है। चार महासु देवता के वजीर जयपाल बंगवाण, प्रमोद रावत, मनमोहन चौहान, हरीश चौहान और राजेंद्र चौहान ने बताया कि बिस्सू मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि क्षेत्र की पहचान, परंपरा, सामाजिक एकता और सांस्कृतिक धरोहर का जीवंत प्रतीक है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी लोगों को अपनी जड़ों से जोड़े रखता है।
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पुरोला। बंगाण व पर्वत क्षेत्र के गांव-गांव में इन दिनों पौराणिक सांस्कृतिक विरासत और आस्था का प्रतीक बिस्सू मेला पूरे उत्साह और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। बैसाखी पर्व के साथ शुरू हुआ यह मेला आराकोट बंगाण के भुटाणु, जाकटा, चींवा और ढ़ड़ियार सहित कई गांवों में मनाया जा रहा है।
इसके अलावा बिस्सू मेला मोरी पर्वत क्षेत्र के लिवाड़ी, फिताड़ी, सट्टा, पुजेली, दौणी, खंयासणी व जखोल गांवों में स्थित महासू महाराज, सोमेश्वर महाराज और शिड़कुडिया महाराज के मंदिर परिसरों में एक सप्ताह तक भव्य रूप में आयोजित होगा। मेले के दौरान पारंपरिक रीति-रिवाजों के तहत गांव और पट्टी के साठी व पासांई दोनों तोक के बीच धनुष-बाण से प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती है।
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प्रतियोगिता केवल खेल नहीं बल्कि क्षेत्र की खुशहाली, समृद्धि और लोक संस्कृति के संरक्षण का प्रतीक मानी जाती है। बैसाखी से पूर्व चारों महासू महाराज, सोमेश्वर व शिड़कुडिया देवता मंदिरों में ढोल-दमाऊं की थाप पर लोकनृत्य और पारंपरिक गीतों के माध्यम से श्रद्धालु अपनी आस्था और खुशी का इजहार करते हैं, जिससे पूरा क्षेत्र लोक रंग में रंगा नजर आता है।
मेले का सबसे आकर्षक और रोमांचक आयोजन ठोटे खेल है जो क्षेत्र की अनूठी पहचान है। खेल में प्रतिभागी धनुष-बाण के माध्यम से एक-दूसरे के घुटने के नीचे निशाना साधते हैं जिसे साहस और परंपरा का प्रतीक माना जाता है। चार महासु देवता के वजीर जयपाल बंगवाण, प्रमोद रावत, मनमोहन चौहान, हरीश चौहान और राजेंद्र चौहान ने बताया कि बिस्सू मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि क्षेत्र की पहचान, परंपरा, सामाजिक एकता और सांस्कृतिक धरोहर का जीवंत प्रतीक है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी लोगों को अपनी जड़ों से जोड़े रखता है।

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