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Bihar Politics: बिहार NDA में कौन किस जिद पर अड़ा?
अमर उजाला डिजिटल डॉट कॉम Published by: आदर्श Updated Fri, 02 Jan 2026 10:28 PM IST
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बिहार की राजनीति में इन दिनों एक अजीब सी खामोशी है ठीक वैसी, जैसी अक्सर किसी बड़े सियासी टकराव से पहले दिखाई देती है। बाहर से शांति नजर आ रही है, लेकिन भीतर ही भीतर मोहरे सजा दिए गए हैं और बिसात पूरी तरह बिछ चुकी है। यह पूरा खेल राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के भीतर चल रहा है, जहां अब वर्चस्व की लड़ाई विधानसभा नहीं, बल्कि विधान परिषद और राज्यसभा की सीटों पर लड़ी जानी है।
एक तरफ विधानसभा चुनाव में महागठबंधन 202 के मुकाबले 35 सीटों पर सिमट चुका है और उसके पास फिलहाल करने को ज्यादा कुछ नहीं है। दूसरी तरफ एनडीए के अंदर सत्ता, संतुलन और भविष्य की राजनीति को लेकर हलचल तेज है। आने वाले महीनों में यह साफ दिखेगा कि गठबंधन के भीतर किसका पलड़ा भारी है और किसे किस बात का “मुआवजा” मिलता है।
बिहार में चार विधान परिषद सदस्य हालिया विधानसभा चुनाव में विधायक बन चुके हैं। पूर्व उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी तारापुर से और मंत्री मंगल पांडेय सीवान से भाजपा विधायक बने हैं। वहीं, भगवान सिंह कुशवाहा जगदीशपुर से और राधाचरण शाह उर्फ राधाचरण सेठ संदेश विधानसभा क्षेत्र से जदयू के विधायक चुने गए हैं। इसके चलते विधान परिषद की चार सीटें खाली हो गई हैं।
हालांकि खाली चार सीटें हुई हैं, लेकिन उपचुनाव केवल दो पर ही होंगे। सम्राट चौधरी की सीट का कार्यकाल 28 जून तक ही बचा है, जबकि भगवान सिंह कुशवाहा की सदस्यता 15 नवंबर तक थी और वह एक दिन पहले विधायक बन गए। इतने कम कार्यकाल के लिए उपचुनाव को औचित्यपूर्ण नहीं माना जा रहा। इन दोनों सीटों पर जून में खाली होने वाली छह विधान परिषद सीटों के साथ नियमित चुनाव होंगे।
इसका मतलब साफ है 28 जून को कुल आठ सीटों के लिए चुनाव होगा, जहां विधानसभा के 202 एनडीए विधायक मतदान करेंगे। संख्या बल को देखते हुए यह चुनाव महज औपचारिकता माना जा रहा है। असली कवायद प्रत्याशियों के चयन को लेकर है।
अब बात उन दो सीटों की, जिन पर उपचुनाव होना तय है। मंगल पांडेय के विधायक बनने से खाली हुई सीट का कार्यकाल 6 मई 2030 तक है, जबकि राधाचरण साह की सीट का कार्यकाल 7 अप्रैल 2028 तक। यानी चुने जाने वाले सदस्य करीब ढाई साल के लिए विधान परिषद पहुंचेंगे। यही वजह है कि इन सीटों को लेकर भीतरखाने खींचतान तेज है।
कम कार्यकाल वाली सीट जदयू के खाते की मानी जा रही है। अगर यह सीट पार्टी के पास रहती है, तो अंतिम फैसला नीतीश कुमार की इच्छा से ही होगा। दावेदारों की कतार लंबी है, लेकिन सभी जानते हैं कि चाबी मुख्यमंत्री के हाथ में है।
मई 2030 तक वाली सीट भाजपा के कोटे की है और यहीं असली दबाव है। इस सीट को राष्ट्रीय लोक मोर्चा के नेता उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश को देना लगभग मजबूरी बन चुका है। दीपक प्रकाश विधानसभा चुनाव नहीं लड़े थे, लेकिन नवंबर में मंत्री पद की शपथ ले चुके हैं। नियम के मुताबिक, अगर वे छह महीने के भीतर विधान परिषद या विधानसभा के सदस्य नहीं बने, तो मंत्री पद छोड़ना पड़ेगा। जून तक इंतजार संभव नहीं, इसलिए उपचुनाव वाली यह सीट उनके लिए जीवनरेखा मानी जा रही है।
यहीं से राज्यसभा की राजनीति भी शुरू हो जाती है। एनडीए के बाकी घटक दल साथ-साथ राज्यसभा सीटों की सौदेबाजी में जुटे हैं। नीतीश कुमार अपने पुराने और संगठन के कद्दावर साथी की वापसी को लेकर इच्छुक बताए जा रहे हैं। चिराग पासवान अपनी मां को राज्यसभा भेजने की तैयारी में हैं। भाजपा के कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के लिए भी राज्यसभा एक सुरक्षित विकल्प माना जा रहा है।
उपेंद्र कुशवाहा के लिए राज्यसभा में बने रहना राजनीतिक अस्तित्व का सवाल है, तो वहीं जीतन राम मांझी विधानसभा चुनाव में सीमित सीटों पर संतोष के बाद अपनी पार्टी के लिए राज्यसभा का रास्ता तलाश रहे हैं। साफ है कि खरमास के बाद बिहार की राजनीति में एनडीए के भीतर कई स्तरों पर बड़ा खेला होना तय है।
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