पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की अंदरूनी कलह थमती नजर नहीं आ रही है। विधानसभा चुनाव में हार के बाद पार्टी में टूट और तेज हो गई है। अब टीएमसी के वरिष्ठ नेता और उत्तर बंगाल विकास विभाग के पूर्व मंत्री रवींद्रनाथ घोष ने बागी नेता ऋतब्रत बनर्जी के गुट का दामन थाम लिया है। इतना ही नहीं, उन्होंने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को ऐसी सलाह दी है, जिसने राज्य की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है।
रविवार को बागी गुट में शामिल होने के बाद रवींद्रनाथ घोष ने दावा किया कि यदि ममता बनर्जी अपने भतीजे और टीएमसी सांसद अभिषेक बनर्जी को फिलहाल सक्रिय राजनीति से अलग कर दें, तो पार्टी छोड़ चुके अधिकांश नेता और कार्यकर्ता दोबारा टीएमसी में लौट सकते हैं। राजनीतिक जानकार इसे कूचबिहार समेत उत्तर बंगाल में टीएमसी के लिए बड़ा झटका मान रहे हैं। चर्चा है कि बागी गुट जल्द ही रवींद्रनाथ घोष को कूचबिहार जिला अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी सौंप सकता है।
पूर्व मंत्री ने विधानसभा चुनाव में पार्टी की हार के लिए सीधे तौर पर अभिषेक बनर्जी और चुनावी रणनीतिकार संस्था आई-पैक को जिम्मेदार ठहराया। उनका आरोप है कि अभिषेक की रणनीति के कारण 80 से अधिक मौजूदा विधायकों और कई मंत्रियों के टिकट काट दिए गए। इसके अलावा संगठन में बड़े पैमाने पर बदलाव किए गए, जिससे पुराने नेताओं और कार्यकर्ताओं में भारी नाराजगी पैदा हुई। घोष के मुताबिक, यही असंतोष चुनावी नतीजों में टीएमसी की हार की बड़ी वजह बना।
रवींद्रनाथ घोष ने पार्टी के नेतृत्व को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि अब यह स्पष्ट नहीं है कि टीएमसी की वास्तविक कमान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के हाथ में है या नहीं। उनके मुताबिक, पार्टी में निर्णय लेने की शक्ति कुछ चुनिंदा लोगों तक सीमित हो गई है और अनुभवहीन नेताओं को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंप दी गई हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कई मौकों पर ममता बनर्जी चाहकर भी अपनी इच्छा के अनुसार फैसले नहीं ले सकीं।
जब उनसे पूछा गया कि उन्होंने सीधे ममता बनर्जी से बातचीत करने के बजाय बागी गुट का साथ क्यों चुना, तो उन्होंने कहा कि वे किसी गुट में नहीं, बल्कि "असली टीएमसी" के साथ हैं। उनका दावा था कि उत्तर बंगाल के बड़ी संख्या में विधायक, नेता और कार्यकर्ता अब इस गुट के साथ हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि जिन नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे, उन्हें संगठन में अहम जिम्मेदारियां दी गईं, जबकि ईमानदार और जमीनी कार्यकर्ताओं की लगातार अनदेखी की गई।
इस बीच भाजपा ने भी टीएमसी की इस अंदरूनी लड़ाई पर हमला बोला है। केंद्रीय मंत्री और भाजपा नेता सुकांत मजूमदार ने तंज कसते हुए कहा कि टीएमसी अब दो नावों में बंट चुकी है और दोनों नावें डूबने वाली हैं। उन्होंने कहा कि पार्टी के नेता किसी भी गुट में जाएं, उनका राजनीतिक भविष्य एक जैसा ही रहने वाला है।
उधर, ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाला बागी गुट लगातार अपने संगठन का विस्तार कर रहा है। हाल ही में दो दिवसीय बैठक के बाद इस गुट ने अपनी समानांतर राज्य और जिला समितियों की घोषणा की। इससे पहले यह गुट ममता बनर्जी को पार्टी अध्यक्ष पद से हटाने, वरिष्ठ विधायक अरूप रॉय को अध्यक्ष बनाने और चुनाव आयोग से खुद को "असली टीएमसी" के रूप में मान्यता देने की मांग भी कर चुका है। बागी गुट ने पूर्व राज्यसभा सांसद शांतनु सेन को प्रमुख प्रवक्ता और पूर्व मंत्री अनुब्रत मंडल को बीरभूम जिला अध्यक्ष नियुक्त कर अपने राजनीतिक इरादे साफ कर दिए हैं। ऐसे में टीएमसी की अंदरूनी जंग अब और तेज होती दिखाई दे रही है।
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