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UP Politics: Why did Owaisi become the reason for the split in Congress? Rashid Alvi's warning to Rahul Gandhi
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UP Politics: ओवैसी क्यों बने कांग्रेस में फूट की वजह? राहुल गांधी को राशिद अल्वी की चेतावनी!
अमर उजाला डिजिटल डॉट कॉम Published by: आदर्श Updated Sun, 25 Jan 2026 08:55 PM IST
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क्या कांग्रेस पार्टी में सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा है? क्या राहुल गांधी की नेतृत्व शैली से पार्टी के भीतर असंतोष बढ़ता जा रहा है? क्या कांग्रेस में नेताओं की आवाज अब हाई कमांड तक पहुंच ही नहीं पा रही? क्या मुस्लिम नेतृत्व की उपेक्षा से कांग्रेस अपनी सबसे बड़ी सेक्युलर ताकत खो रही है? और क्या यही वजह है कि असदुद्दीन ओवैसी जैसे नेता और मजबूत होते जा रहे हैं? क्या थरूर, शकील अहमद और अब राशिद अल्वी की नाराजगी कांग्रेस में किसी बड़े टूट की ओर इशारा कर रही है?
आज के इस वीडियो में हम बताएंगे- कांग्रेस के भीतर क्या सच में संवाद टूट चुका है? राहुल गांधी पर उठ रहे सवाल कितने गंभीर हैं? और क्या कांग्रेस के लिए यह सिर्फ अंदरूनी असंतोष है या फिर आने वाले चुनावों से पहले एक बड़ा सियासी खतरे का संकेत?
कांग्रेस पार्टी में अंदरूनी कलह अब सतह पर साफ दिखाई देने लगी है। शशि थरूर द्वारा पार्टी नेतृत्व के तौर-तरीकों पर सवाल उठाने के बाद अब एक के बाद एक वरिष्ठ नेता खुलकर अपनी नाराजगी जाहिर कर रहे हैं। शनिवार को कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शकील अहमद ने राहुल गांधी और पार्टी नेतृत्व पर गंभीर आरोप लगाए। इसके बाद अब कांग्रेस के एक और वरिष्ठ नेता राशिद अल्वी ने भी खुलकर पार्टी नेतृत्व को कठघरे में खड़ा कर दिया है।
राशिद अल्वी ने न सिर्फ पार्टी के भीतर संवाद की कमी पर सवाल उठाए, बल्कि मुस्लिम नेताओं की कथित उपेक्षा को लेकर भी कांग्रेस नेतृत्व को चेतावनी दी है। अल्वी का कहना है कि अगर पार्टी ने मुस्लिम नेतृत्व को नजरअंदाज करना जारी रखा, तो देश में असदुद्दीन ओवैसी जैसे नेताओं का राजनीतिक उभार और तेज होगा, जो कांग्रेस के लिए भविष्य में बड़ा राजनीतिक नुकसान साबित हो सकता है।
शकील अहमद के बयान के बाद जब राशिद अल्वी से प्रतिक्रिया मांगी गई, तो उन्होंने भी पार्टी के भीतर चल रही समस्याओं को खुलकर सामने रखा। राशिद अल्वी ने कहा,
“कांग्रेस पार्टी में एक बड़ी समस्या यह है कि कोई ऐसा मंच नहीं है, जहां नेता खुलकर मुद्दों पर चर्चा कर सकें। हाई कमांड से मिलना आम तौर पर मुश्किल होता है। अगर लोग अपनी चिंताएं जाहिर करना चाहते हैं, तो वे कहां जाएं?” उन्होंने आगे कहा कि पार्टी के अंदर संवाद की भारी कमी है और यही कांग्रेस की सबसे बड़ी अंदरूनी कमजोरी बनती जा रही है। “यह सच है कि कांग्रेस पार्टी के भीतर संवाद की कमी है। बहुत से लोग शिकायत करते हैं कि हाई कमांड से मिलना आसान नहीं है। इस कमी को खत्म किया जाना चाहिए, नहीं तो असंतोष और बढ़ेगा।”
इससे पहले बिहार कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शकील अहमद ने भी पार्टी नेतृत्व पर तीखा हमला बोला था। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस में आंतरिक लोकतंत्र कमजोर हो चुका है और फैसले एकतरफा तरीके से लिए जा रहे हैं।
शकील अहमद ने एक तीखी तुलना करते हुए कहा कि जैसे नेपाल में राजा के मुंह से निकली बात ही कानून होती थी, वैसे ही आज कांग्रेस में भी राहुल गांधी जो बोलते हैं, वही अंतिम फैसला माना जाता है। उन्होंने यह भी कहा कि सोनिया गांधी के दौर में पार्टी में संवाद की परंपरा थी।
“सोनिया गांधी सभी नेताओं को साथ लेकर चलती थीं। वह समय-समय पर नेताओं से मुलाकात करती थीं, लेकिन अब राहुल गांधी नेताओं से नहीं मिलते। इससे पार्टी के अंदर असंतोष बढ़ रहा है।”
राशिद अल्वी ने कांग्रेस में मुस्लिम नेताओं की कथित उपेक्षा को लेकर भी गंभीर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि हाल के वर्षों में कई मुस्लिम नेताओं ने कांग्रेस पार्टी छोड़ी है, लेकिन इस पर पार्टी नेतृत्व गंभीरता से ध्यान नहीं दे रहा है।
अल्वी ने कहा, “कई मुस्लिम नेताओं ने कांग्रेस पार्टी छोड़ दी है, लेकिन कोई यह नहीं देख रहा कि उनमें से एक भी नेता बीजेपी में शामिल नहीं हुआ। उन्होंने सत्ता के लालच में पार्टी नहीं छोड़ी।” उन्होंने यह भी कहा कि गैर-मुस्लिम नेताओं के मामले में तस्वीर अलग है। “जो गैर-मुस्लिम नेता कांग्रेस छोड़कर गए, वे अधिकतर सत्ता के लिए बीजेपी में शामिल हो गए। लेकिन मुस्लिम नेताओं ने सत्ता के लालच में नहीं, बल्कि उपेक्षा की वजह से पार्टी छोड़ी है।”
राशिद अल्वी ने कांग्रेस और अन्य सेक्युलर पार्टियों को साफ शब्दों में चेतावनी देते हुए कहा कि अगर मुस्लिम नेतृत्व को नजरअंदाज किया गया, तो असदुद्दीन ओवैसी जैसे नेता और मजबूत होंगे।
उन्होंने कहा, “अगर मुस्लिम नेतृत्व को लगातार नजरअंदाज किया जाता रहा, तो ओवैसी जैसे नेता देश में उभरते रहेंगे। आज ओवैसी एक शक्तिशाली राजनीतिक ताकत बनते जा रहे हैं।”
थरूर, शकील अहमद और अब राशिद अल्वी के बयानों से साफ है कि कांग्रेस पार्टी के भीतर असंतोष अब खुलकर सामने आ रहा है। यह न सिर्फ संगठनात्मक कमजोरी को उजागर करता है, बल्कि 2024 के बाद बदली राजनीतिक परिस्थितियों में कांग्रेस के सामने एक नई चुनौती भी खड़ी करता है।
पार्टी नेतृत्व के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या कांग्रेस इन अंदरूनी नाराजगियों को गंभीरता से लेकर संगठनात्मक सुधार करेगी, या फिर यह असंतोष आगे चलकर पार्टी के लिए और बड़े राजनीतिक नुकसान का कारण बनेगा।
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