आर्कटिक में तनाव की चेतावनी: पुतिन ने समुद्री मार्ग में भारत की रुचि का जिक्र क्यों किया? NATO का भी उल्लेख
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने आर्कटिक के नॉर्दर्न सी रूट में भारत की बढ़ती रुचि का खास तौर पर जिक्र किया है। उन्होंने कहा कि भारत समेत कई देश इस समुद्री मार्ग पर रूस के साथ सहयोग को लेकर बातचीत कर रहे हैं। इसी बीच पुतिन ने आर्कटिक में बढ़ते कृत्रिम तनाव और नाटो के विस्तार को लेकर भी चेतावनी दी। भारत के लिए यह समुद्री मार्ग इतना अहम क्यों हो रहा है? आइए, सबकुछ विस्तार से जानते हैं...
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विस्तार
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने आर्कटिक क्षेत्र को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि रूस के साझेदार देशों में नॉर्दर्न सी रूट के साथ सहयोग को लेकर दिलचस्पी बढ़ रही है और भारत इस दिशा में प्रमुख देशों में शामिल है। पुतिन ने यह बात बुधवार को प्रशांत बेड़े के जवानों के साथ बैठक के दौरान कही। उनके बयान में भारत का जिक्र ऐसे समय हुआ है, जब रूस पश्चिमी प्रतिबंधों के बीच नए व्यापार और समुद्री रास्तों पर सहयोग बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।
नॉर्दर्न सी रूट क्या है और भारत के लिए क्यों अहम?
नॉर्दर्न सी रूट आर्कटिक क्षेत्र से होकर गुजरने वाला समुद्री मार्ग है। रूस लंबे समय से इस रास्ते की क्षमता का इस्तेमाल बढ़ाने पर जोर देता रहा है। पुतिन ने कहा कि रूस इस मार्ग के फायदे का इस्तेमाल अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून के दायरे में रहकर करने को तैयार है। भारत की बढ़ती रुचि का मतलब यह है कि नई दिल्ली इस मार्ग से जुड़ी संभावनाओं को व्यापार और रणनीतिक सहयोग के नजरिये से देख रही है।
पुतिन ने नाटो को लेकर क्या चेतावनी दी?
पुतिन ने नॉर्दर्न सी रूट में बढ़ती दिलचस्पी के साथ आर्कटिक में बढ़ते ‘कृत्रिम तनाव’ की भी चेतावनी दी। उन्होंने बाहरी देशों की गतिविधियों और नाटो के विस्तार का संकेत देते हुए कहा कि आर्कटिक में तनाव पैदा करने की कोशिशों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। रूस के लिए आर्कटिक क्षेत्र रणनीतिक रूप से बेहद अहम है और वह इस इलाके में अपनी मौजूदगी तथा हितों को लेकर लगातार सतर्क रहा है।
भारत, रूस और चीन की भूमिका क्या?
पुतिन ने कहा कि चीन, भारत और दूसरे देश रूस के साथ नॉर्दर्न सी रूट पर सहयोग को लेकर सक्रिय बातचीत कर रहे हैं। उन्होंने भारत को उन प्रमुख देशों में गिना जिनकी इस समुद्री मार्ग में दिलचस्पी बढ़ रही है। रूस के साथ भारत के पुराने रणनीतिक संबंधों और ऊर्जा सहयोग को देखते हुए आर्कटिक मार्ग आने वाले समय में दोनों देशों के लिए सहयोग का एक नया क्षेत्र बन सकता है।
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रूस पर पश्चिमी प्रतिबंधों का क्या असर?
यूक्रेन संघर्ष के बाद रूस पर अमेरिका और यूरोपीय देशों ने कई प्रतिबंध लगाए हैं। इन प्रतिबंधों के बीच रूस अपने व्यापार के लिए वैकल्पिक रास्तों और साझेदार देशों के साथ सहयोग बढ़ाने पर जोर दे रहा है। नॉर्दर्न सी रूट इसी रणनीति का अहम हिस्सा है। रूस चाहता है कि इस समुद्री रास्ते के जरिये एशियाई देशों के साथ संपर्क और व्यापार की संभावनाएं बढ़ें।
रूस की शैडो फ्लीट पर भी दबाव क्यों बढ़ा?
रूस के समुद्री व्यापार को लेकर यूरोपीय संघ की कार्रवाई भी तेज हुई है। पश्चिमी प्रतिबंधों से बचने और रूसी तेल के निर्यात में इस्तेमाल होने वाले संदिग्ध जहाजों के बेड़े को ‘शैडो फ्लीट’ कहा जाता है। यूरोपीय देशों ने ऐसे कई जहाजों की जांच और उन्हें रोकने की कार्रवाई बढ़ाई है। इसी मुद्दे पर पुतिन ने यूरोपीय देशों को कड़ी चेतावनी दी है।
रूसी जहाज रोके गए तो क्या होगा?
पुतिन ने कहा कि अगर यूरोपीय देश रूसी व्यापारिक जहाजों को जब्त करते हैं तो रूस इसका जवाब देगा। उन्होंने ऐसे कदम को ‘समुद्री डकैती और लूट’ करार दिया। पुतिन के मुताबिक, रूस की प्रतिक्रिया केवल उस समुद्री क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगी जहां उसके जहाजों को रोका गया है। उन्होंने कहा कि जवाबी कार्रवाई वहां की जा सकती है जहां रूस उसे जरूरी और उचित समझे।
आर्कटिक को लेकर टकराव क्यों बढ़ सकता?
आर्कटिक क्षेत्र में समुद्री मार्ग, प्राकृतिक संसाधन और सैन्य रणनीति तीनों महत्वपूर्ण हैं। जलवायु में बदलाव के कारण इस इलाके में समुद्री रास्तों के इस्तेमाल की संभावनाएं भी बढ़ी हैं। ऐसे में रूस के साथ चीन और भारत जैसे देशों की बढ़ती दिलचस्पी तथा नाटो की गतिविधियां इस क्षेत्र को रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का नया केंद्र बना सकती हैं। पुतिन का बयान इसी बढ़ते तनाव की ओर इशारा करता है।
भारत के लिए क्या मायने निकलते?
भारत के लिए नॉर्दर्न सी रूट केवल एक समुद्री रास्ता नहीं, बल्कि रूस और यूरोप के साथ व्यापार तथा रणनीतिक संपर्क की नई संभावना बन सकता है। रूस के साथ भारत की ऊर्जा और आर्थिक साझेदारी पहले से महत्वपूर्ण है। ऐसे में आर्कटिक क्षेत्र में सहयोग बढ़ने से भारत को भविष्य में नए समुद्री विकल्प मिल सकते हैं। हालांकि, इस पूरे क्षेत्र में बढ़ता सैन्य और राजनीतिक तनाव भारत के लिए भी सावधानी से आगे बढ़ने की चुनौती रहेगा।