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ईरानी मिसाइल के निशाने पर थे ट्रंप: दावा- IRGC को पता थी लोकेशन, खुफिया एजेंसियों ने कैसे फेरा मंसूबे पर पानी?

Thu, 13 Aug 2026 05:40 AM IST
हिमांशु सिंह चंदेल वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वॉशिंगटन
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वॉशिंगटन Published by: हिमांशु सिंह चंदेल Updated Thu, 13 Aug 2026 05:40 AM IST
सार

Trump Missile Threat: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की तुर्किये यात्रा के दौरान एक गंभीर मिसाइली खतरे की आशंका सामने आई। अमेरिकी खुफिया एजेंसियों को जानकारी मिली कि ईरानी एजेंटों को अंकारा में ट्रंप की सटीक लोकेशन, यहां तक कि होटल की मंजिल तक की जानकारी थी। खतरे को देखते हुए ट्रंप को एयरफोर्स वन से गुप्त तरीके से निकालकर दूसरे सैन्य विमान में भेजा गया। आइए विस्तार से जानते हैं कि अमेरिका ने इस पूरे ऑपरेशन को कैसे अंजाम दिया? क्या एयरफोर्स वन को डिकॉय बनाकर खतरा टाल दिया गया?

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Trump Missile Threat Iran Knew His Exact Location US Intelligence Secretly Changed the Entire Plan
ईरान को ट्रंप की सटीक लोकेशन कैसे पता चली? - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

नाटो शिखर सम्मेलन के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सुरक्षा को लेकर एक गंभीर खतरे का दावा किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी खुफिया एजेंसियों को कई इनपुट मिले थे कि ईरान को तुर्किये की राजधानी अंकारा में ट्रंप के ठिकाने की सटीक जानकारी थी। बताया गया कि ईरानी एजेंटों को उस होटल की मंजिल तक की जानकारी थी, जहां ट्रंप ठहरे हुए थे। सुरक्षा अधिकारियों ने इसी दौरान ट्रंप को निशाना बनाने वाले संभावित सतह से हवा में मार करने वाले मिसाइल खतरे का भी पता लगाया।
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क्या ट्रंप को मिसाइल से निशाना बनाने की तैयारी थी?

खतरे का आकलन इतना गंभीर बताया गया कि अमेरिकी सुरक्षा अधिकारियों ने असाधारण सुरक्षा योजना तैयार की। रिपोर्ट के मुताबिक, नाटो सम्मेलन के आसपास एक व्यक्ति को कंधे से दागी जाने वाली मिसाइल के साथ भी देखा गया था। साथ ही ऐसी जानकारी सामने आई कि ट्रंप को ले जाने वाले विमान को निशाना बनाया जा सकता है। इसके बाद ट्रंप की आवाजाही को सार्वजनिक रूप से सामान्य दिखाते हुए उन्हें गुप्त तरीके से दूसरे विमान में भेजने की योजना बनाई गई।
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ट्रंप को एयरपोर्ट से गुप्त तरीके से कैसे निकाला गया?

सुरक्षा योजना के तहत ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से पुराने एयरफोर्स वन में सवार होने का दृश्य दिया। इसके बाद उन्हें एयरपोर्ट के अंदर एक कैटरिंग कंटेनर के जरिए गुप्त रूप से बाहर निकाला गया और सैन्य विमान से तुर्किये से बाहर ले जाया गया। दूसरी ओर, मूल एयरफोर्स वन को अंकारा से ब्रिटेन के लिए रवाना किया गया। इसमें विदेश मंत्री मार्को रुबियो, वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट और व्हाइट हाउस के वरिष्ठ सहयोगी स्टीफन मिलर तथा स्टीवन च्यूंग समेत कई अधिकारी मौजूद थे।
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क्या एयरफोर्स वन में बैठे लोगों को खतरे की जानकारी थी?

रिपोर्ट के मुताबिक, मूल एयरफोर्स वन में मौजूद सभी यात्रियों को खतरे की पूरी गंभीरता की जानकारी नहीं दी गई थी। 8 जुलाई को अंकारा से ब्रिटेन की उड़ान के दौरान यात्रियों को विमान की खिड़कियों के पर्दे बंद रखने का निर्देश दिया गया। बाद में ट्रंप गुप्त रूप से फिर एयरफोर्स वन में शामिल हो गए और कैमरों के सामने ऐसे दिखाई दिए, जैसे वह पूरे समय उसी विमान में रहे हों। इस पूरी कार्रवाई को लेकर पूर्व व्हाइट हाउस अधिकारियों के बीच भी सवाल उठे हैं।

क्या ट्रंप की सुरक्षा के लिए उठाया गया कदम सही था?

इस सुरक्षा अभियान को लेकर दो तरह की राय सामने आई है। कुछ पूर्व अधिकारियों का मानना है कि जिस विमान को डिकॉय बनाया गया, उसमें मौजूद लोगों को खतरे की जानकारी दी जानी चाहिए थी। वहीं, इस फैसले का बचाव करने वालों का तर्क है कि अमेरिकी राष्ट्रपति की सुरक्षा के लिए विश्वसनीय खतरे की स्थिति में असाधारण कदम उठाना जरूरी था। ट्रंप ने बाद में कहा कि उन्होंने सीक्रेट सर्विस के निर्देशों का पालन किया और इस दावे को खारिज किया कि विमान में मौजूद लोगों को जानबूझकर ज्यादा खतरे में डाला गया।
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