इस्लामिक दबाव के आगे झुका बांग्लादेश?: भगवान राम की प्रतिमा के निर्माण पर रोक, मानवाधिकार संगठन ने जताई चिंता
बांग्लादेश के गाइबांधा जिले में भगवान राम की 81 फीट ऊंची प्रतिमा के निर्माण पर रोक लगा दी गई है। मानवाधिकार संगठन जेएमबीएफ ने आरोप लगाया है कि यह फैसला इस्लामिक कट्टरपंथी समूहों के दबाव में लिया गया। संगठन ने इसे धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यकों के अधिकारों का उल्लंघन बताया है तथा बांग्लादेश सरकार से मामले की स्वतंत्र जांच और हिंदू समुदाय की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की है।
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विस्तार
बांग्लादेश में भगवान राम की 81 फीट ऊंची प्रतिमा के निर्माण पर रोक लगाए जाने को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। गाइबांधा जिले के श्री श्री राधा गोविंद और काली मंदिर परिसर में बनने वाली इस प्रतिमा का काम इस्लामिक कट्टरपंथी समूहों के विरोध के बाद रोक दिया गया है। इस फैसले पर फ्रांस स्थित अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन जस्टिस मेकर्स बांग्लादेश इन फ्रांस ने कड़ी आपत्ति जताई है। संगठन का कहना है कि यह धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यकों के अधिकारों का गंभीर उल्लंघन है।
मानवाधिकार संगठन के मुताबिक, जून की शुरुआत में जैसे ही भगवान राम की प्रतिमा निर्माण की योजना सार्वजनिक हुई, स्थानीय इस्लामिक संगठनों ने इसका विरोध शुरू कर दिया। कई जगह प्रदर्शन हुए, प्रेस कॉन्फ्रेंस की गईं और स्थानीय प्रशासन को ज्ञापन सौंपे गए। बढ़ते दबाव और संभावित हिंसा की आशंका के बीच मंदिर प्रबंधन ने 12 जून को आधिकारिक तौर पर निर्माण कार्य स्थगित करने की घोषणा कर दी। संगठन ने दावा किया कि हिंदू समुदाय की सुरक्षा को लेकर बढ़ती चिंताओं के कारण यह फैसला लिया गया।
क्या धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन हुआ है?
जेएमबीएफ ने कहा है कि यह मामला बांग्लादेश के संविधान और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानूनों का सीधा उल्लंघन है। संगठन के अनुसार, बांग्लादेश का संविधान सभी नागरिकों को धर्म की स्वतंत्रता, कानून के समक्ष समानता और समान अधिकार की गारंटी देता है। इसके अलावा बांग्लादेश संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार संबंधी कई अंतरराष्ट्रीय संधियों का भी पक्षकार है। ऐसे में किसी धार्मिक परियोजना को दबाव में रोकना गंभीर चिंता का विषय है।
क्या कट्टरपंथी दबाव के कारण रोका गया निर्माण?
मानवाधिकार संगठन ने दावा किया कि इस्लामिक कट्टरपंथी समूहों के दबाव और भीड़ हिंसा की आशंका के कारण निर्माण कार्य रोका गया। संगठन ने कहा कि यदि किसी लोकतांत्रिक देश में सरकार या प्रशासन हिंसा की धमकी और चरमपंथी दबाव के आगे झुकता है, तो इससे कानून का शासन और लोकतांत्रिक व्यवस्था कमजोर होती है। संगठन ने बांग्लादेश सरकार से मामले की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है।
मीडिया की भूमिका पर क्यों उठे सवाल?
जेएमबीएफ ने यह भी आरोप लगाया कि बांग्लादेश के कई मुख्यधारा के मीडिया संस्थानों ने इस घटना की पूरी जानकारी प्रकाशित नहीं की। संगठन का कहना है कि कुछ मीडिया संस्थानों ने संभावित हिंसा, पत्रकारों की सुरक्षा और चरमपंथी समूहों की प्रतिक्रिया के डर से आत्म-सेंसरशिप अपनाई। इससे लोगों के सूचना के अधिकार और प्रेस की स्वतंत्रता पर भी सवाल खड़े होते हैं।
मानवाधिकार संगठन ने सरकार से क्या मांग की है?
जेएमबीएफ के संस्थापक और मानवाधिकार वकील शाहानूर इस्लाम ने कहा कि बांग्लादेश सरकार को धार्मिक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि सरकार को इस मामले की निष्पक्ष जांच करानी चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि देश में सभी समुदाय बिना किसी भय के अपने धर्म का पालन कर सकें। संगठन ने जोर देकर कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा किसी भी लोकतांत्रिक देश की बुनियादी जिम्मेदारी होती है।