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सिंधु जल संधि पर भारत की दो टूक: राजदूत क्वात्रा बोले- पाकिस्तान ने खुद गिराई अपनी साख, पहले खत्म करे आतंकवाद
Sun, 02 Aug 2026 09:56 AM IST
Devesh Tripathi
पीटीआई, वॉशिंगटन
पीटीआई, वॉशिंगटन
Published by: Devesh Tripathi
Updated Sun, 02 Aug 2026 09:56 AM IST
सार
अमेरिका में भारत के राजदूत विनय मोहन क्वात्रा ने कहा है कि सिंधु जल संधि का आधार आपसी सद्भावना और विश्वास था, लेकिन पाकिस्तान के लंबे समय से अपनाए गए रवैये और सीमा पार आतंकवाद ने इस भावना को कमजोर कर दिया। उन्होंने कहा कि संधि को स्थगित रखने का भारत का फैसला इसी बदली हुई स्थिति का परिणाम है।
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अमेरिका में भारतीय राजदूत विनय मोहन क्वात्रा
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
अमेरिका में भारत के राजदूत विनय मोहन क्वात्रा ने कहा कि सिंधु जल संधि (आईडब्ल्यूटी) सद्भावना और मित्रता की भावना के साथ की गई थी, लेकिन पाकिस्तान ने पिछले कई दशकों में इस भावना को लगातार कमजोर किया। उन्होंने कहा कि भारत द्वारा संधि को स्थगित रखने का फैसला केवल उस वास्तविकता को स्वीकार करना है, जिसे पाकिस्तान के व्यवहार ने पहले ही नष्ट कर दिया था।
क्वात्रा ने यह बात न्यूजवीक पत्रिका में प्रकाशित अपने लेख में कही। उनका यह लेख ऐसे समय आया है, जब हाल ही में पाकिस्तान ने भारत के 23 अप्रैल 2025 को सिंधु जल संधि को स्थगित रखने के फैसले के विरोध में एक सम्मेलन आयोजित किया था। भारत ने यह फैसला जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के एक दिन बाद लिया था, जिसमें पाकिस्तान से प्रशिक्षित आतंकियों ने 26 लोगों की हत्या कर दी थी।
'संधि की प्रस्तावना में सद्भावना और मित्रता की बात'
क्वात्रा ने लिखा, "यह याद रखना चाहिए कि संधि की प्रस्तावना में कहा गया है कि इसे 'सद्भावना और मित्रता की भावना' से संपन्न किया गया था। पाकिस्तान ने आधी सदी तक इस सद्भावना और मित्रता को खत्म करने का काम किया। संधि को स्थगित रखने का फैसला केवल उसी स्थिति को स्वीकार करता है, जिसे पाकिस्तान के आचरण ने पहले ही नष्ट कर दिया था।"
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'पाकिस्तान ने युद्ध और आतंकवाद का रास्ता चुना'
1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुई सिंधु जल संधि के तहत भारत को सिंधु बेसिन की छह नदियों में से तीन पर नियंत्रण मिला, जिनमें कुल जल का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा बहता है। वहीं, पाकिस्तान को उन नदियों पर अधिकार मिला, जिनमें करीब 80 प्रतिशत पानी बहता है। क्वात्रा ने कहा कि इस असंतुलन के कारण भारत के कई क्षेत्रों का विकास लंबे समय तक प्रभावित रहा, फिर भी भारत ने संधि का सम्मान किया।
उन्होंने कहा कि इसके जवाब में पाकिस्तान ने 1965, 1971 और 1999 में भारत के खिलाफ युद्ध छेड़े। इसके अलावा उसने सीमा पार आतंकवाद जारी रखा, जिसमें 2001 का संसद हमला, 2008 का मुंबई आतंकी हमला, 2016 के उरी और पठानकोट हमले, 2019 का पुलवामा हमला और 2025 का पहलगाम आतंकी हमला शामिल हैं।
'आतंकी ढांचा खत्म करे पाकिस्तान'
क्वात्रा ने कहा कि अगर पाकिस्तान वास्तव में भारत के साथ द्विपक्षीय मुद्दों पर सहयोग चाहता है, तो उसे सबसे पहले वर्षों में खड़े किए गए आतंकी ढांचे को खत्म करना होगा। उन्होंने कहा कि संधि के तहत भारत द्वारा शुरू की गई परियोजनाओं के मामले में पाकिस्तान ने लगातार बाधाएं खड़ी कीं और प्रशासनिक स्तर पर देरी की।
उन्होंने कहा कि पाकिस्तान ने तकनीकी बदलावों को ध्यान में रखते हुए संधि में संशोधन के भारत के प्रयासों का भी लगातार विरोध किया। इससे भारत अपनी जलविद्युत क्षमता का पूरा उपयोग नहीं कर सका।
'पाकिस्तान के रवैये से भारत का भरोसा टूटा'
क्वात्रा ने कहा, "धीरे-धीरे पाकिस्तान ने भारत का यह भरोसा खत्म कर दिया कि वह संधि के तहत अपने अधिकारों का प्रभावी ढंग से उपयोग कर सकता है या वर्तमान परिस्थितियों के अनुरूप बेहतर व्यवस्था की उम्मीद कर सकता है।" उन्होंने कहा कि जो लोग भारत और पाकिस्तान के बीच फिर से बातचीत की वकालत करते हैं, वे या तो इतिहास से अनजान हैं या फिर यह मानते हैं कि बार-बार एक ही तरीका अपनाकर अलग परिणाम मिलने की उम्मीद करना उचित है।
क्वात्रा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस बयान का भी जिक्र किया, जिसमें उन्होंने कहा था, "आतंक और बातचीत साथ-साथ नहीं चल सकते... आतंक और व्यापार साथ-साथ नहीं चल सकते... पानी और खून एक साथ नहीं बह सकते।"
'पानी की कमी के लिए खुद जिम्मेदार पाकिस्तान'
क्वात्रा ने कहा कि पाकिस्तान में पानी की कमी का कारण भारत नहीं, बल्कि इस्लामाबाद की खराब जल प्रबंधन व्यवस्था है। उन्होंने कहा, "भारत पर आरोप लगाने और धमकियां देने के बजाय पाकिस्तान सरकार को अपनी खराब जल उत्पादकता और जल प्रबंधन प्रणाली को सुधारने पर ध्यान देना चाहिए।"
उन्होंने यह भी कहा कि पाकिस्तान की हर घरेलू विफलता के लिए भारत को जिम्मेदार ठहराने की आदत अब पुरानी हो चुकी है और दुनिया को इस पर स्पष्ट रुख अपनाना चाहिए।
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क्वात्रा ने यह बात न्यूजवीक पत्रिका में प्रकाशित अपने लेख में कही। उनका यह लेख ऐसे समय आया है, जब हाल ही में पाकिस्तान ने भारत के 23 अप्रैल 2025 को सिंधु जल संधि को स्थगित रखने के फैसले के विरोध में एक सम्मेलन आयोजित किया था। भारत ने यह फैसला जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के एक दिन बाद लिया था, जिसमें पाकिस्तान से प्रशिक्षित आतंकियों ने 26 लोगों की हत्या कर दी थी।
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'संधि की प्रस्तावना में सद्भावना और मित्रता की बात'
क्वात्रा ने लिखा, "यह याद रखना चाहिए कि संधि की प्रस्तावना में कहा गया है कि इसे 'सद्भावना और मित्रता की भावना' से संपन्न किया गया था। पाकिस्तान ने आधी सदी तक इस सद्भावना और मित्रता को खत्म करने का काम किया। संधि को स्थगित रखने का फैसला केवल उसी स्थिति को स्वीकार करता है, जिसे पाकिस्तान के आचरण ने पहले ही नष्ट कर दिया था।"
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'पाकिस्तान ने युद्ध और आतंकवाद का रास्ता चुना'
1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुई सिंधु जल संधि के तहत भारत को सिंधु बेसिन की छह नदियों में से तीन पर नियंत्रण मिला, जिनमें कुल जल का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा बहता है। वहीं, पाकिस्तान को उन नदियों पर अधिकार मिला, जिनमें करीब 80 प्रतिशत पानी बहता है। क्वात्रा ने कहा कि इस असंतुलन के कारण भारत के कई क्षेत्रों का विकास लंबे समय तक प्रभावित रहा, फिर भी भारत ने संधि का सम्मान किया।
उन्होंने कहा कि इसके जवाब में पाकिस्तान ने 1965, 1971 और 1999 में भारत के खिलाफ युद्ध छेड़े। इसके अलावा उसने सीमा पार आतंकवाद जारी रखा, जिसमें 2001 का संसद हमला, 2008 का मुंबई आतंकी हमला, 2016 के उरी और पठानकोट हमले, 2019 का पुलवामा हमला और 2025 का पहलगाम आतंकी हमला शामिल हैं।
'आतंकी ढांचा खत्म करे पाकिस्तान'
क्वात्रा ने कहा कि अगर पाकिस्तान वास्तव में भारत के साथ द्विपक्षीय मुद्दों पर सहयोग चाहता है, तो उसे सबसे पहले वर्षों में खड़े किए गए आतंकी ढांचे को खत्म करना होगा। उन्होंने कहा कि संधि के तहत भारत द्वारा शुरू की गई परियोजनाओं के मामले में पाकिस्तान ने लगातार बाधाएं खड़ी कीं और प्रशासनिक स्तर पर देरी की।
उन्होंने कहा कि पाकिस्तान ने तकनीकी बदलावों को ध्यान में रखते हुए संधि में संशोधन के भारत के प्रयासों का भी लगातार विरोध किया। इससे भारत अपनी जलविद्युत क्षमता का पूरा उपयोग नहीं कर सका।
'पाकिस्तान के रवैये से भारत का भरोसा टूटा'
क्वात्रा ने कहा, "धीरे-धीरे पाकिस्तान ने भारत का यह भरोसा खत्म कर दिया कि वह संधि के तहत अपने अधिकारों का प्रभावी ढंग से उपयोग कर सकता है या वर्तमान परिस्थितियों के अनुरूप बेहतर व्यवस्था की उम्मीद कर सकता है।" उन्होंने कहा कि जो लोग भारत और पाकिस्तान के बीच फिर से बातचीत की वकालत करते हैं, वे या तो इतिहास से अनजान हैं या फिर यह मानते हैं कि बार-बार एक ही तरीका अपनाकर अलग परिणाम मिलने की उम्मीद करना उचित है।
क्वात्रा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस बयान का भी जिक्र किया, जिसमें उन्होंने कहा था, "आतंक और बातचीत साथ-साथ नहीं चल सकते... आतंक और व्यापार साथ-साथ नहीं चल सकते... पानी और खून एक साथ नहीं बह सकते।"
'पानी की कमी के लिए खुद जिम्मेदार पाकिस्तान'
क्वात्रा ने कहा कि पाकिस्तान में पानी की कमी का कारण भारत नहीं, बल्कि इस्लामाबाद की खराब जल प्रबंधन व्यवस्था है। उन्होंने कहा, "भारत पर आरोप लगाने और धमकियां देने के बजाय पाकिस्तान सरकार को अपनी खराब जल उत्पादकता और जल प्रबंधन प्रणाली को सुधारने पर ध्यान देना चाहिए।"
उन्होंने यह भी कहा कि पाकिस्तान की हर घरेलू विफलता के लिए भारत को जिम्मेदार ठहराने की आदत अब पुरानी हो चुकी है और दुनिया को इस पर स्पष्ट रुख अपनाना चाहिए।