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Israel Palestine Conflict: 'इस्राइल को दे सकते हैं मान्यता अगर...', सऊदी अरब के विदेश मंत्री का बड़ा दावा
Wed, 17 Jan 2024 08:21 AM IST
ज्योति भास्कर
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, रियाद
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, रियाद
Published by: ज्योति भास्कर
Updated Wed, 17 Jan 2024 08:21 AM IST
सार
इस्राइल और हमास के हिंसक संघर्ष के बीच फलस्तीन को मान्यता का सवाल भी अहम है। हालांकि, कुछ देश इस्राइल को भी मान्यता नहीं देते। ताजा घटनाक्रम में सऊदी अरब के विदेश मंत्री प्रिंस फैसल बिन फरहान अल सऊद ने इस्राइल को मान्यता देने पर अहम बयान दिया है। उन्होंने व्यापक समझौते की बात कही है।
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सऊदी अरब के विदेश मंत्री प्रिंस फैसल बिन फरहान अल सऊद
- फोटो : ANI
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विस्तार
सऊदी के विदेश मंत्री ने कहा है कि उनका देश इस्राइल को मान्यता दे सकता है। उन्होंने कहा कि मान्यता देने से पहले व्यापक समझौता करना होगा। इसमें फलस्तीनी लोगों को भी राज्य का दर्जा देना होगा। विदेश मंत्री प्रिंस फैसल बिन फरहान अल सऊद का बयान इसलिए अहम माना जा रहा है क्योंकि बीते लगभग साढ़े तीन महीने से इस्राइल और हमास का हिंसक संघर्ष जारी है। सात अक्तूबर से शुरू हुई इस लड़ाई में अब तक 25 हजार से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है।
क्षेत्रीय शांति में इस्राइल की अहम भूमिका, मान्यता देने से पहले...
प्रिंस फैसल ने दावोस में विश्व आर्थिक मंच पर एक पैनल में कहा, 'सऊदी इस बात पर सहमत है कि क्षेत्रीय शांति के नजरिए से इस्राइल की भूमिका अहम है। हालांकि, फलस्तीनियों लोगों की मांग पूरी करना भी अहम है।' उन्होंने फलस्तीन को अलग राज्य की मान्यता देने का भी समर्थन किया। इस्राइल को राजनीतिक मान्यता देने के सवाल पर विदेश मंत्री ने कहा, सऊदी निश्चित रूप से इस्राइल को मान्यता देने पर विचार करेगा। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि इसके लिए व्यापक राजनीतिक समझौता जरूरी है।
मान्यता देना गाजा के संदर्भ में अधिक प्रासंगिक, अमेरिका सऊदी साथ
सऊदी अरब के विदेश मंत्री प्रिंस फैसल ने बताया कि फलस्तीन को अलग देश के रूप में मान्यता देकर क्षेत्रीय शांति का लक्ष्य हासिल करने के लिए अमेरिकी प्रशासन के साथ गंभीरता से काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह गाजा के संदर्भ में अधिक प्रासंगिक है।
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सऊदी के फैसले से अंतरराष्ट्रीय राजनीति में होगा बड़ा बदलाव
खबरों के मुताबिक अगर सऊदी इस्राइल को मान्यता देता है तो यह प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की बड़ी सफलता होगी। इससे पहले संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन और मोरक्को इस्राइल के साथ राजनतिक संबंध स्थापित कर चुके हैं। इसके बाद इस्राइल और सऊदी के बीच समान्यीकरण समझौता (normalisation deal) पश्चिम एशिया या मिडिल ईस्ट की भूराजनीतिक तस्वीर बदल सकता है।
इस्राइल की योजना पर अमेरिकी प्रभाव, युद्ध के 100 से अधिक दिन बीते
सऊदी की भूमिका इसलिए भी अहम है क्योंकि सुन्नी मुस्लिम समुदाय के शासन वाला यह देश दुनिया के सबसे ताकतवर मुल्कों में गिना जाता है। राजनीतिक-आर्थिक क्षमता के अलावा इसका धार्मिक प्रभाव भी काफी अधिक है। रिपोर्ट्स के मुताबिक अक्तूबर, 2023 में इस्राइल पर हमास के हमले के बाद शुरू हुए युद्ध के बाद सऊदी ने इस्राइल को मान्यता देने की योजना ठंडे बस्ते में डाल दी। खास बात ये भी है कि इस योजना को अमेरिका से भी समर्थन हासिल है। हालांकि, युद्ध के 100 से अधिक दिन बीतने के बाद सऊदी की सियासत से जुड़े सूत्रों ने बताया कि कूटनीतिक प्राथमिकताओं पर नए सिरे से विचार किया जा रहा है। समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक सऊदी इस्राइल संबंधों को सामान्य बनाने में थोड़ा लंबा वक्त लग सकता है। सऊदी इसे अमेरिकी रक्षा समझौते का सबसे बड़ा इनाम मानता है।
56 साल पहले शुरू हुआ संघर्ष
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक हमास के लड़ाकों को ईरान का भी समर्थन हासिल है। इस अप्रत्याशित हमले के बाद इस्राइल और सऊदी के नेताओं ने संकेत दिया था कि वे राजनयिक संबंध स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। 1967 में हुए युद्ध के बाद इस्राइल ने फलस्तीन के बड़े हिस्से पर कब्जा किया है। फलस्तीनी जनता की मांग है कि उनकी राजधानी पूर्वी येरुशलम होनी चाहिए। हालांकि, अमेरिका प्रायोजित वार्ता 10 साल से भी अधिक समय पहले खटाई में पड़ गई थी।
पश्चिम एशिया में अशांति का प्रमुख कारण?
शांति बहाल करने की अड़चनों में प्रमुख रूप से पश्चिमी देशों की तरफ से फलस्तीनी अधिकारियों-प्रशासकों को समर्थन, हमास के इस्लामिक समूह के बीच झगड़ा और भूभाग पर इस्राइल का कब्जा शामिल है। हमास इस्राइल के साथ सह-अस्तित्व को खारिज करता है। पश्चिमी एशिया में राजनीतिक बदलाव को समझते हुए सऊदी के विदेश मंत्री ने कहा, फलस्तन के साथ-साथ इस्राइल के लिए भी क्षेत्रीय शांति अहम है। फलस्तीन की जनता को इंसाफ मिलना चाहिए। सऊदी इसके लिए प्रतिबद्ध है।
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क्षेत्रीय शांति में इस्राइल की अहम भूमिका, मान्यता देने से पहले...
प्रिंस फैसल ने दावोस में विश्व आर्थिक मंच पर एक पैनल में कहा, 'सऊदी इस बात पर सहमत है कि क्षेत्रीय शांति के नजरिए से इस्राइल की भूमिका अहम है। हालांकि, फलस्तीनियों लोगों की मांग पूरी करना भी अहम है।' उन्होंने फलस्तीन को अलग राज्य की मान्यता देने का भी समर्थन किया। इस्राइल को राजनीतिक मान्यता देने के सवाल पर विदेश मंत्री ने कहा, सऊदी निश्चित रूप से इस्राइल को मान्यता देने पर विचार करेगा। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि इसके लिए व्यापक राजनीतिक समझौता जरूरी है।
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मान्यता देना गाजा के संदर्भ में अधिक प्रासंगिक, अमेरिका सऊदी साथ
सऊदी अरब के विदेश मंत्री प्रिंस फैसल ने बताया कि फलस्तीन को अलग देश के रूप में मान्यता देकर क्षेत्रीय शांति का लक्ष्य हासिल करने के लिए अमेरिकी प्रशासन के साथ गंभीरता से काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह गाजा के संदर्भ में अधिक प्रासंगिक है।
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सऊदी के फैसले से अंतरराष्ट्रीय राजनीति में होगा बड़ा बदलाव
खबरों के मुताबिक अगर सऊदी इस्राइल को मान्यता देता है तो यह प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की बड़ी सफलता होगी। इससे पहले संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन और मोरक्को इस्राइल के साथ राजनतिक संबंध स्थापित कर चुके हैं। इसके बाद इस्राइल और सऊदी के बीच समान्यीकरण समझौता (normalisation deal) पश्चिम एशिया या मिडिल ईस्ट की भूराजनीतिक तस्वीर बदल सकता है।
इस्राइल की योजना पर अमेरिकी प्रभाव, युद्ध के 100 से अधिक दिन बीते
सऊदी की भूमिका इसलिए भी अहम है क्योंकि सुन्नी मुस्लिम समुदाय के शासन वाला यह देश दुनिया के सबसे ताकतवर मुल्कों में गिना जाता है। राजनीतिक-आर्थिक क्षमता के अलावा इसका धार्मिक प्रभाव भी काफी अधिक है। रिपोर्ट्स के मुताबिक अक्तूबर, 2023 में इस्राइल पर हमास के हमले के बाद शुरू हुए युद्ध के बाद सऊदी ने इस्राइल को मान्यता देने की योजना ठंडे बस्ते में डाल दी। खास बात ये भी है कि इस योजना को अमेरिका से भी समर्थन हासिल है। हालांकि, युद्ध के 100 से अधिक दिन बीतने के बाद सऊदी की सियासत से जुड़े सूत्रों ने बताया कि कूटनीतिक प्राथमिकताओं पर नए सिरे से विचार किया जा रहा है। समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक सऊदी इस्राइल संबंधों को सामान्य बनाने में थोड़ा लंबा वक्त लग सकता है। सऊदी इसे अमेरिकी रक्षा समझौते का सबसे बड़ा इनाम मानता है।
56 साल पहले शुरू हुआ संघर्ष
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक हमास के लड़ाकों को ईरान का भी समर्थन हासिल है। इस अप्रत्याशित हमले के बाद इस्राइल और सऊदी के नेताओं ने संकेत दिया था कि वे राजनयिक संबंध स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। 1967 में हुए युद्ध के बाद इस्राइल ने फलस्तीन के बड़े हिस्से पर कब्जा किया है। फलस्तीनी जनता की मांग है कि उनकी राजधानी पूर्वी येरुशलम होनी चाहिए। हालांकि, अमेरिका प्रायोजित वार्ता 10 साल से भी अधिक समय पहले खटाई में पड़ गई थी।
पश्चिम एशिया में अशांति का प्रमुख कारण?
शांति बहाल करने की अड़चनों में प्रमुख रूप से पश्चिमी देशों की तरफ से फलस्तीनी अधिकारियों-प्रशासकों को समर्थन, हमास के इस्लामिक समूह के बीच झगड़ा और भूभाग पर इस्राइल का कब्जा शामिल है। हमास इस्राइल के साथ सह-अस्तित्व को खारिज करता है। पश्चिमी एशिया में राजनीतिक बदलाव को समझते हुए सऊदी के विदेश मंत्री ने कहा, फलस्तन के साथ-साथ इस्राइल के लिए भी क्षेत्रीय शांति अहम है। फलस्तीन की जनता को इंसाफ मिलना चाहिए। सऊदी इसके लिए प्रतिबद्ध है।