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पीओके चुनावों को लेकर पश्चिमी देशों के रुख पर क्यों उठे सवाल?: रिपोर्ट में दावा- PAK को मिल रही रणनीतिक छूट
Sun, 02 Aug 2026 07:56 AM IST
Devesh Tripathi
आईएएनएस, तेल अवीव
आईएएनएस, तेल अवीव
Published by: Devesh Tripathi
Updated Sun, 02 Aug 2026 07:56 AM IST
सार
पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में हुए कथित विधानसभा चुनावों को लेकर प्रकाशित एक रिपोर्ट में चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। रिपोर्ट में विपक्षी दलों द्वारा धांधली, मतदाताओं पर दबाव और राजनीतिक कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी जैसे आरोपों का उल्लेख करते हुए पश्चिमी देशों की अपेक्षाकृत सीमित प्रतिक्रिया की आलोचना की गई है।
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पीओके चुनावों पर पश्चिमी देशों की प्रतिक्रिया पर सवाल
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) में हुए तथाकथित विधानसभा चुनावों को लेकर पश्चिमी देशों के रुख पर सवाल उठाए गए हैं। एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि चुनावों के दौरान धांधली, मतदाताओं को डराने-धमकाने और विपक्षी दलों के कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी जैसे आरोप सामने आए, लेकिन इसके बावजूद पश्चिमी देशों की प्रतिक्रिया अपेक्षाकृत शांत रही।
रिपोर्ट के अनुसार, इन चुनावों में विपक्षी दलों ने पाकिस्तानी अधिकारियों पर चुनावी प्रक्रिया में हस्तक्षेप के आरोप लगाए। रिपोर्ट में कहा गया है कि यह केवल किसी एक आरोप का मामला नहीं है, बल्कि ऐसे आरोपों का एक दोहराया जाने वाला पैटर्न है, जिसके कारण कई मतदाताओं को लगता है कि मतदान से पहले ही चुनाव परिणाम तय कर दिए जाते हैं।
पाकिस्तान को लेकर क्यों अलग है पश्चिमी देशों का रवैया?
रिपोर्ट में कहा गया है कि दक्षिण एशिया के अन्य देशों में चुनावी अनियमितताओं पर पश्चिमी देश अक्सर खुलकर प्रतिक्रिया देते हैं, जबकि पाकिस्तान के मामले में दशकों से अलग रवैया देखने को मिलता रहा है। इटली के राजनीतिक सलाहकार, लेखक और भू-राजनीतिक विशेषज्ञ सर्जियो रेस्टेली ने टाइम्स ऑफ इस्राइल में प्रकाशित अपने लेख में लिखा, "इसका परिणाम यह होता है कि पाकिस्तान को जवाबदेही से एक तरह की रणनीतिक छूट मिल जाती है। समय के साथ यह छूट एक आदत बन जाती है।"
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उन्होंने लिखा कि शीत युद्ध के दौर में भी पाकिस्तान के साथ इसी तरह का व्यवहार हुआ। बाद में 11 सितंबर के हमलों के बाद आतंकवाद के खिलाफ युद्ध में पाकिस्तान की रणनीतिक भूमिका के कारण लोकतांत्रिक जवाबदेही का मुद्दा पीछे चला गया।
पाकिस्तान में क्यों लोकतांत्रिक संस्थाओं पर बढ़ा दबाव?
रेस्टेली ने दावा किया कि मौजूदा पाकिस्तान भी उसी ढांचे में फिट बैठता है। उन्होंने लिखा, "इमरान खान जेल में हैं। अदालतें अपने फैसलों को लेकर पहले से अधिक सतर्क हो गई हैं। पिछले चुनावों के बाद मीडिया का दायरा सिमटा है और राजनीतिक विपक्ष पुलिस के दबाव में काम कर रहा है।" उनके अनुसार, ऐसे माहौल में पीओके में विवादित चुनाव कोई असामान्य घटना नहीं, बल्कि उसी व्यवस्था का हिस्सा हैं।
चुनावी वैधता पर उठते हैं सवाल?
रेस्टेली ने कहा कि पीओके में राजनीतिक वैधता कमजोर होने से इस्लामाबाद के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह दावा करना और कठिन हो जाता है कि कश्मीर मुद्दे पर उसका पक्ष लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व पर आधारित है। उन्होंने कहा कि स्थानीय स्तर पर चुनावी अनियमितताओं की वैश्विक स्तर पर भी राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ सकती है।
पश्चिमी देशों की चुप्पी क्यों खतरनाक?
रेस्टेली के अनुसार, पश्चिमी नीति-निर्माताओं के लिए यह समझना जरूरी है कि जिस साझेदारी को बनाए रखने के लिए चुनावी धांधली पर आंखें मूंदनी पड़ें, वह दीर्घकाल में मजबूत नहीं हो सकती। उन्होंने लिखा, "सुरक्षा सहयोग और लोकतांत्रिक जवाबदेही तब एक-दूसरे के पूरक बनते हैं, जब साझेदार देश इसके लिए तैयार हो। लेकिन यदि ऐसा नहीं है, तो दोनों के बीच टकराव पैदा होता है।"
उन्होंने यह भी कहा कि अगर चुनावी धांधली पर प्रतिक्रिया कमजोर रहती है, तो इससे यह संदेश जाता है कि नियम केवल वहीं लागू होते हैं, जहां बड़ी शक्तियों के हित जुड़े हों। उनके अनुसार, इससे उन देशों में पश्चिम की विश्वसनीयता प्रभावित होती है, जहां पहले से ही उसके प्रति संदेह मौजूद है।
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रिपोर्ट के अनुसार, इन चुनावों में विपक्षी दलों ने पाकिस्तानी अधिकारियों पर चुनावी प्रक्रिया में हस्तक्षेप के आरोप लगाए। रिपोर्ट में कहा गया है कि यह केवल किसी एक आरोप का मामला नहीं है, बल्कि ऐसे आरोपों का एक दोहराया जाने वाला पैटर्न है, जिसके कारण कई मतदाताओं को लगता है कि मतदान से पहले ही चुनाव परिणाम तय कर दिए जाते हैं।
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पाकिस्तान को लेकर क्यों अलग है पश्चिमी देशों का रवैया?
रिपोर्ट में कहा गया है कि दक्षिण एशिया के अन्य देशों में चुनावी अनियमितताओं पर पश्चिमी देश अक्सर खुलकर प्रतिक्रिया देते हैं, जबकि पाकिस्तान के मामले में दशकों से अलग रवैया देखने को मिलता रहा है। इटली के राजनीतिक सलाहकार, लेखक और भू-राजनीतिक विशेषज्ञ सर्जियो रेस्टेली ने टाइम्स ऑफ इस्राइल में प्रकाशित अपने लेख में लिखा, "इसका परिणाम यह होता है कि पाकिस्तान को जवाबदेही से एक तरह की रणनीतिक छूट मिल जाती है। समय के साथ यह छूट एक आदत बन जाती है।"
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उन्होंने लिखा कि शीत युद्ध के दौर में भी पाकिस्तान के साथ इसी तरह का व्यवहार हुआ। बाद में 11 सितंबर के हमलों के बाद आतंकवाद के खिलाफ युद्ध में पाकिस्तान की रणनीतिक भूमिका के कारण लोकतांत्रिक जवाबदेही का मुद्दा पीछे चला गया।
पाकिस्तान में क्यों लोकतांत्रिक संस्थाओं पर बढ़ा दबाव?
रेस्टेली ने दावा किया कि मौजूदा पाकिस्तान भी उसी ढांचे में फिट बैठता है। उन्होंने लिखा, "इमरान खान जेल में हैं। अदालतें अपने फैसलों को लेकर पहले से अधिक सतर्क हो गई हैं। पिछले चुनावों के बाद मीडिया का दायरा सिमटा है और राजनीतिक विपक्ष पुलिस के दबाव में काम कर रहा है।" उनके अनुसार, ऐसे माहौल में पीओके में विवादित चुनाव कोई असामान्य घटना नहीं, बल्कि उसी व्यवस्था का हिस्सा हैं।
चुनावी वैधता पर उठते हैं सवाल?
रेस्टेली ने कहा कि पीओके में राजनीतिक वैधता कमजोर होने से इस्लामाबाद के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह दावा करना और कठिन हो जाता है कि कश्मीर मुद्दे पर उसका पक्ष लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व पर आधारित है। उन्होंने कहा कि स्थानीय स्तर पर चुनावी अनियमितताओं की वैश्विक स्तर पर भी राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ सकती है।
पश्चिमी देशों की चुप्पी क्यों खतरनाक?
रेस्टेली के अनुसार, पश्चिमी नीति-निर्माताओं के लिए यह समझना जरूरी है कि जिस साझेदारी को बनाए रखने के लिए चुनावी धांधली पर आंखें मूंदनी पड़ें, वह दीर्घकाल में मजबूत नहीं हो सकती। उन्होंने लिखा, "सुरक्षा सहयोग और लोकतांत्रिक जवाबदेही तब एक-दूसरे के पूरक बनते हैं, जब साझेदार देश इसके लिए तैयार हो। लेकिन यदि ऐसा नहीं है, तो दोनों के बीच टकराव पैदा होता है।"
उन्होंने यह भी कहा कि अगर चुनावी धांधली पर प्रतिक्रिया कमजोर रहती है, तो इससे यह संदेश जाता है कि नियम केवल वहीं लागू होते हैं, जहां बड़ी शक्तियों के हित जुड़े हों। उनके अनुसार, इससे उन देशों में पश्चिम की विश्वसनीयता प्रभावित होती है, जहां पहले से ही उसके प्रति संदेह मौजूद है।