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खुद जंग में उतरने का डर, तेल-गैस की कमी और...: किस डर से अमेरिका-ईरान का संदेशवाहक बनने पर मजबूर हुआ पाकिस्तान
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: Kirtivardhan Mishra
Updated Thu, 09 Apr 2026 05:49 PM IST
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सार
अमेरिका के लिए लंबे समय तक पाकिस्तान एक गैर-भरोसेमंद भागीदार रहा। मौजूदा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से पहले बाइडन के कार्यकाल में पाकिस्तान को अमेरिकी कूटनीति में तवज्जो नहीं दी गई। फिर ऐसा क्या हुआ कि पाकिस्तान 'दलाली' की भूमिका में आ गया। अमेरिका-ईरान संघर्ष विराम की कोशिशों के पीछे पाकिस्तान अपनी पीठ थपथपा रहा है, लेकिन इसके पीछे की कहानी क्या है, आइए जानते हैं...
युद्ध में जुटे थे अमेरिका-ईरान, मुश्किल में फंसी थी पाकिस्तान की जान।
- फोटो : अमर उजाला/AI
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विस्तार
पाकिस्तान, जो कभी ओसामा बिन लादेन की अपने मुल्क में मौजूदगी और तालिबान को कथित समर्थन देने के कारण अमेरिका की नजरों में संदिग्ध था, आज वॉशिंगटन और तेहरान के बीच पहली सीधी बातचीत की मेजबानी करने की तैयारी कर रहा है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ अमेरिका-ईरान संघर्ष विराम के पीछे अपने मुल्क की भूमिका को अब तक की सबसे बड़ी कूटनीति करार दे रहे हैं। हालांकि, पाकिस्तान बेवजह अपनी पीठ थपथपा रहा है। असल में उसने डर की वजह से मध्यस्थ बनने का रास्ता चुना। पश्चिमी देशों की मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो अगर बातचीत की कोशिशों में चीन की एंट्री नहीं होती, तो पाकिस्तान कभी कामयाब नहीं हो पाता। पाकिस्तान की भूमिका पर इस्राइल को अब भी संदेह है।
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पहले जानते हैं कि ताजा स्थिति क्या है...
- अमेरिका-ईरान के बीच संघर्ष विराम के बावजूद युद्ध से उपजा ऊर्जा संकट जारी है।
- ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में समुद्री बारूदी सुरंगों के खतरे का हवाला देते हुए जहाजों के लिए वैकल्पिक मार्गों की घोषणा की है।
- अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पर लिखा है कि जब तक 'वास्तविक समझौता' आकार नहीं लेता, तब तक सभी अमेरिकी जहाज, विमान और सैनिक ईरान के आसपास तैनात रहेंगे।
- अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस शुक्रवार को इस्लामाबाद में प्रस्तावित बातचीत में शामिल होंगे। 2011 के बाद वेंस पाकिस्तान का दौरा करने वाले सबसे वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारी होंगे।
- बुधवार को इस्राइली हमलों में 254 लोगों की मौत और 1,165 से अधिक के घायल होने के बाद लेबनान ने शोक दिवस घोषित किया है।
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पाकिस्तान मध्यस्थ बनने को क्यों मजबूर हुआ?
1. पाकिस्तान को जंग में उतरना पड़ता
सऊदी अरब के साथ हुए एक नए रक्षा समझौते का मतलब था कि यदि रियाद युद्ध में शामिल होता, तो पाकिस्तान को भी इसमें उतरना पड़ता। एक पाकिस्तानी अधिकारी के अनुसार, पाकिस्तान की सेना और सरकार बेहद नाजुक स्थिति में थी और बातचीत शुरू करने के लिए बेताब थी। द गार्जियन के अनुसार,मंगलवार शाम करीब पांच बजे इस्लामाबाद में हुई कैबिनेट बैठक में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज बेहद निराश नजर आए। उन्होंने अपने मंत्रियों से कहा, “हमें जंग के असर के लिए खुद को तैयार रखना चाहिए। हालात वास्तव में बहुत खराब हो गए हैं। अमन की उम्मीद अब काफी कम हो गई है।”
* पाकिस्तान ने बीते साल सितंबर में सऊदी अरब के साथ रक्षा समझौता किया था, जिसके तहत उसे परमाणु सुरक्षा तक देने की बात कही गई थी।
2. तेल की कीमतों से निपटना पाकिस्तान के लिए मुश्किल था
पाकिस्तान की सरकार और सेना के लिए यह मध्यस्थता केवल प्रतिष्ठा का विषय नहीं थी। देश की अर्थव्यवस्था, तेल की जरूरतें, रक्षा, राष्ट्रीय सुरक्षा और सांप्रदायिक सद्भाव इस युद्ध के रुकने पर निर्भर थे। पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों की वजह से शहबाज शरीफ सरकार दबाव में थी। पाकिस्तान में जबर्दस्त विरोध हो रहा था। लोग सड़कों पर उतर आए थे। शरीफ सरकार को पेट्रोल की कीमत 80 रुपये प्रति लीटर तक घटानी पड़ी। इसके बावजूद पेट्रोल 378 रुपये प्रति लीटर में बिक रहा था।
3. सीमा और आंतरिक दबाव
पाकिस्तान की ईरान के साथ 900 किलोमीटर लंबी अस्थिर सीमा है, जहां दोनों ओर बलूच आबादी के गहरे संबंध हैं। पाकिस्तान में शिया समुदाय करीब 15% आबादी का हिस्सा है और ईरान के बाद यहां उनकी सबसे बड़ी संख्या है। इसलिए आंतरिक दबाव भी था कि मामले को सुलझाया जाए। ऐसा न होने पर पाकिस्तान में अंदरूनी हालात बिगड़ सकते थे। पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर रावलपिंडी में एक इफ्तार कार्यक्रम के दौरान शिया धर्मगुरुओं को धमकी दे चुके थे। उन्होंने धमकी भरे अंदाज में कहा किथ था अगर आपको ईरान इतना पसंद है, तो आप वहां चले जाएं।
पाकिस्तान की सरकार और सेना के लिए यह मध्यस्थता केवल प्रतिष्ठा का विषय नहीं थी। देश की अर्थव्यवस्था, तेल की जरूरतें, रक्षा, राष्ट्रीय सुरक्षा और सांप्रदायिक सद्भाव इस युद्ध के रुकने पर निर्भर थे। पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों की वजह से शहबाज शरीफ सरकार दबाव में थी। पाकिस्तान में जबर्दस्त विरोध हो रहा था। लोग सड़कों पर उतर आए थे। शरीफ सरकार को पेट्रोल की कीमत 80 रुपये प्रति लीटर तक घटानी पड़ी। इसके बावजूद पेट्रोल 378 रुपये प्रति लीटर में बिक रहा था।
3. सीमा और आंतरिक दबाव
पाकिस्तान की ईरान के साथ 900 किलोमीटर लंबी अस्थिर सीमा है, जहां दोनों ओर बलूच आबादी के गहरे संबंध हैं। पाकिस्तान में शिया समुदाय करीब 15% आबादी का हिस्सा है और ईरान के बाद यहां उनकी सबसे बड़ी संख्या है। इसलिए आंतरिक दबाव भी था कि मामले को सुलझाया जाए। ऐसा न होने पर पाकिस्तान में अंदरूनी हालात बिगड़ सकते थे। पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर रावलपिंडी में एक इफ्तार कार्यक्रम के दौरान शिया धर्मगुरुओं को धमकी दे चुके थे। उन्होंने धमकी भरे अंदाज में कहा किथ था अगर आपको ईरान इतना पसंद है, तो आप वहां चले जाएं।
इस मध्यस्थता प्रक्रिया को किसने और कैसे आगे बढ़ाया?
इसमें पाकिस्तानी सेना प्रमुख असीम मुनीर की भूमिका अहम रही। पर्दे के पीछे, सेना प्रमुख असीम मुनीर और आईएसआई प्रमुख असीम मलिक ने लगातार काम किया। मुनीर के ट्रंप के साथ व्यक्तिगत संबंध और ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के साथ पुराने रिश्ते ने उन्हें शहबाज शरीफ की तुलना में ज्यादा मजबूत स्थिति में रखा।ईरान को समझौते के लिए राजी करने में चीन की क्या भूमिका थी?
अधिकारियों के अनुसार, ईरान को ट्रंप प्रशासन पर भरोसा नहीं था। पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार ने बीजिंग जाकर चीन से मदद मांगी। पाकिस्तान ने चीन को ईरान को मनाने के लिए शामिल किया। चीन ने ईरान को सुरक्षा की गारंटी दी और वादा किया कि यदि ईरानी नेता बातचीत के लिए यात्रा करते हैं, तो उनकी सुरक्षा का ध्यान रखा जाएगा।पाकिस्तानी अधिकारी ने स्पष्ट किया, "हम केवल मध्यस्थ थे, गारंटर नहीं। असली भूमिका चीन ने निभाई। चीन ने गारंटी दी कि अमेरिका समझौते पर कायम रहेगा। ट्रंप प्रशासन ने भी पुष्टि की कि चीन ने ईरान को बातचीत के लिए मनाया।''
क्या पाकिस्तान के प्रधानमंत्री का सोशल मीडिया पोस्ट पहले से तय था?
हां। द न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार, प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने एक्स पर राष्ट्रपति ट्रंप से ईरान के लिए मंगलवार की समय सीमा बढ़ाने की जो अपील की थी, उसे व्हाइट हाउस ने पोस्ट होने से पहले ही देख लिया था और उस पर अपनी मंजूरी दे दी थी। यह दर्शाता है कि पाकिस्तान सब कुछ व्हाइट हाउस के इशारों पर कर रहा था।
पाकिस्तान का पिछला इतिहास कैसा रहा है?
सीएनएन के अनुसार, पाकिस्तान को पिछले साल तक अमेरिका का एक 'अविश्वसनीय भागीदार' माना जाता था। उस पर आरोप थे कि वह अफगानिस्तान युद्ध में अमेरिका की मदद करते हुए तालिबान का भी समर्थन कर रहा था। 2011 में एबटाबाद में पाकिस्तान मिलिट्री एकेडमी के पास ओसामा बिन लादेन के मारे जाने से पाकिस्तानी सेना को भारी शर्मिंदगी झेलनी पड़ी थी। ट्रंप सहित कई अमेरिकी राजनेताओं ने पाकिस्तान की आलोचना की थी।पाकिस्तान का झुकाव ट्रंप की ओर कैसे बढ़ा?
पाकिस्तान ने दावा किया कि उसके पास खरबों डॉलर के दुर्लभ खनिज हैं, जिससे अमेरिका की रुचि बढ़ी। पिछले साल भारत के साथ संघर्ष के दौरान ट्रंप के प्रयासों की पाकिस्तान ने खुलकर और चापलूसी भरे अंदाज में प्रशंसा की। इसके बाद पाकिस्तान ने खनिजों पर सौदे किए और नोबेल शांति पुरस्कार के लिए ट्रंप की कोशिशों का खुलकर समर्थन किया।
पाकिस्तान को लेकर क्या आशंकाएं हैं?
अल जजीरा के अनुसार, दोनों पक्षों में संदेह बना हुआ है। ईरान की शर्तें अमेरिका को और अमेरिका की शर्तें ईरान को स्वीकार्य नहीं हो सकतीं। द गार्जियन के अनुसार, पाकिस्तान में ईरान के राजदूत ने वह सोशल मीडिया पोस्ट डिलीट कर दी, जिसमें उन्होंने ईरानी प्रतिनिधिमंडल के इस्लामाबाद आने की बात कही थी। यह दर्शाता है कि संघर्ष विराम अभी भी बहुत नाजुक है और क्षेत्र में किसी भी गंभीर घटना से यह टूट सकता है। भारत में इस्राइली राजदूत रूवेन अजार की मानें तो पाकिस्तान बिल्कुल भी भरोसे के लायक नहीं है।संबंधित वीडियो