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US-Iran Talk: जेडी वेंस क्यों कर रहे ईरान से बातचीत का नेतृत्व, ट्रंप के दामाद-दोस्त कैसे पहुंचे पिछली सीट पर?

स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: Kirtivardhan Mishra Updated Sat, 11 Apr 2026 04:50 PM IST
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सार

अमेरिका और ईरान के बीच पाकिस्तान में प्रतिनिधिमंडल स्तर की अहम वार्ता रखी गई। इसमें अमेरिका का नेतृत्व उपराष्ट्रपति जेडी वेंस कर रहे हैं, जो कि ईरान से उसके परमाणु कार्यक्रम पर चर्चा करने वाली पिछली किसी भी टीम का हिस्सा नहीं रहे। माना जा रहा है कि अगर वेंस ईरान को समझौते तक लाने में सफल होते हैं तो यह उनके राजनीतिक करियर के लिए एक बड़ी उपलब्धि होगा। 

US Iran Talks Vice President JD Vance Leading Steve Witkoff Jared Kushner Donald Trump Politics Delegation
जेडी वेंस के नेतृत्व में अमेरिका की ईरान से बातचीत। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

अमेरिका और ईरान के बीच करीब 40 दिन तक चला संघर्ष फिलहाल रुक गया है। पाकिस्तान, मिस्र और तुर्किये की तरफ से संदेशवाहक की भूमिका निभाए जाने की वजह से अमेरिका-ईरान दोनों ने ही कुछ समय के लिए युद्ध विराम पर सहमति जता दी। हालांकि, लेबनान पर इस्राइल के लगातार जारी हमलों से इस संघर्ष विराम के टूटने की भी आशंका जारी रही। इस बीच शनिवार को अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के नेतृत्व वाला प्रतिनिधिनमंडल पाकिस्तान पहुंचा। वेंस यहां ईरान के प्रतिनिधिमंडल के साथ चर्चाओं में शामिल होंगे, जिसमें युद्ध विराम को पूर्ण शांति की तरफ बढ़ाने पर बातचीत होगी। 
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इस बीच यह चर्चाएं हैं कि आखिर क्यों अमेरिका ने पिछली बार की तरह डोनाल्ड ट्रंप के दामाद- जैरेड कुशनर और उनके दोस्त- स्टीव विटकॉफ के नेतृत्व में प्रतिनिधिमंडल को ईरान से बातचीत के लिए नहीं भेजा? क्यों जेडी वेंस इस बार पाकिस्तान में ईरान से बात करने के लिए पहुंचे हैं? ईरान के लिए वेंस का पहुंचना क्या मायने रखता है? खुद जेडी वेंस के राजनीतिक करियर के लिए यह बातचीत कितनी अहम है? आइये जानते हैं...
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क्यों इस बार ट्रंप के दामाद और दोस्त ईरान से बातचीत का नेतृत्व नहीं कर रहे?

ट्रंप के दामाद- जैरेड कुशनर और उनके दोस्त स्टीव विटकॉफ को इस बार ईरानी प्रतिनिधिमंडल से बातचीत के लिए भेजा जरूर गया है, लेकिन उन्हें इसका नेतृत्व नहीं सौंपा गया है। दरअसल, ट्रंप के दूसरी बार सत्ता में आने के बाद से ईरान से बातचीत के लिए राष्ट्रपति ने इन्हीं दोनों को जिम्मेदारी सौंपी थी। रिपोर्ट्स के मुताबिक, कुशनर और विटकॉफ ईरान की तरफ से अपने परमाणु कार्यक्रम को लेकर दिए गए भरोसों के बावजूद उससे समझौते को आगे नहीं बढ़ा पाए। उल्टा समझौतों में सकारात्मक बातचीत के बावजूद अंततः अमेरिका ने इस्राइल के साथ मिलकर ईरान के खिलाफ जंग छेड़ दी। इसके बाद से ही ईरान की शिकायत रही है कि कुशनर और विटकॉफ ने ट्रंप को गलत जानकारियां पहुंचाईं और उसे इन दोनों पर बिल्कुल भरोसा नहीं है।  

ईरानी अधिकारियों का मानना है कि कुशनर और विटकॉफ के साथ युद्ध से पहले हुई वार्ताओं का इस्तेमाल शांति के बजाय केवल सैन्य तैयारियों को पूरा करने और समय निकालने की एक कूटनीति के रूप में किया गया था। जब कुशनर और विटकॉफ ने जिनेवा में पिछले दौर की वार्ता का नेतृत्व किया था, तो उसके कुछ ही समय बाद अमेरिका और इस्राइल ने ईरान पर बड़े सैन्य हमले शुरू कर दिए थे। इसमें ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई सहित कई नेताओं की मौत हुई थी। इसे कुशनर और विटकॉफ की तरफ से धोखा माना गया था। अपने इस कड़वे अनुभव और भरोसे की भारी कमी के कारण, ईरान ने ट्रंप प्रशासन को स्पष्ट रूप से बता दिया था कि वह विटकॉफ और कुशनर के साथ फिर से बातचीत में शामिल नहीं होना चाहता है। 

वेंस क्यों कर रहे ईरान से बातचीत में अमेरिका का नेतृत्व?

पाकिस्तान में अमेरिका और ईरान के प्रतिनिधिमंडल की बातचीत के लिए ट्रंप ने खुद उपराष्ट्रपति जेडी वेंस को नेतृत्व सौंपा है। इसके पीछे कई वजहें हैं...

ईरान का भरोसा और प्राथमिकता 
तेहरान ने पर्दे के पीछे से वेंस को इस वार्ता का नेतृत्व करने के लिए प्राथमिकता दी है, क्योंकि ट्रंप के करीबी सहयोगियों में ईरान केवल वेंस पर ही भरोसा करता है। ईरान ने स्पष्ट कर दिया था कि वह स्टीव विटकॉफ और जैरेड कुशनर के साथ दोबारा बातचीत नहीं करना चाहता और उसकी जगह वेंस के साथ बातचीत करना पसंद करेगा।

डिफेंस प्रायोरिटीज थिंक टैंक की निदेशक रोसमेरी केलानिक कहती हैं कि चूंकि ईरान के साथ भरोसे की बहुत कमी है, इसलिए युद्ध-विरोधी माने जाने वाले वेंस जैसे नए चेहरे की मौजूदगी से ईरान इस बातचीत को अधिक गंभीरता से लेगा।

ये भी पढ़ें: Trump: 'अमेरिका होर्मुज खोलेगा, चाहे ईरान साथ दे या नहीं', US-ईरान शांति वार्ता से पहले बोले डोनाल्ड ट्रंप

वेंस की युद्ध-विरोधी नेता के तौर पर छवि 
ईरानी अधिकारी वेंस को ट्रंप प्रशासन में युद्ध का विरोध करने वाली सबसे मजबूत आवाजों में से एक के रूप में देखते हैं। अमेरिकी अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, वेंस ने अलग-अलग बैठकों में सीधे ट्रंप के सामने ईरान से युद्ध का विरोध भी किया था। साथ ही उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के तौर पर उन्होंने अपने चुनाव प्रचार अभियान में अमेरिका को नए विदेशी युद्धों से दूर रखने की वकालत की थी। इस छवि के कारण ईरान को लगता है कि वेंस कूटनीतिक समाधान खोजने के प्रति ज्यादा ईमानदार होंगे।

पिछली नाकाम वार्ताओं से दूरी बनाना चाहता है ईरान
चूंकि ईरान से उसके परमाणु कार्यक्रम और बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम को लेकर अब तक किसी भी बातचीत में अमेरिकी उपराष्ट्रपति खुद शामिल नहीं रहे हैं, इसलिए ईरान का मानना है कि वे बेहतर ढंग से उसकी शर्तों को समझ सकते हैं। पहले जिनेवा में हुई यही वार्ताएं कुशनर और विटकॉफ के नेतृत्व में नाकाम हो गई थीं। वह भी तब, जब ईरान ने अधिकतर मांगों को लेकर बातचीत पर सहमति जत दी थी। ईरान इसे एक धोखे के रूप में देखता है, जहां बातचीत की आड़ में अमेरिका ने ईरान पर सैन्य हमलों की तैयारी की थी। 

तेहरान में फारस की खाड़ी अध्ययन समूह के निदेशक जवाद हेरान-निया का मानना है कि प्रतीकात्मक दृष्टिकोण से ईरान के लिए वेंस के साथ बातचीत करना अपनी जनता को यह समझाने के लिए काफी सही कदम है कि वह शांति के पक्ष में है। 

उपराष्ट्रपति के सांविधानिक और राजनीतिक अधिकार 

व्हाइट हाउस के अधिकारियों का मानना था कि किसी विशेष दूत मुकाबले एक निर्वाचित उपराष्ट्रपति के नेतृत्व से ईरानी नेतृत्व पर अधिक दबाव रहेगा। वेंस का संवैधानिक अधिकार और राजनीतिक रसूख इस बातचीत को सर्वोच्च स्तर पर ले जाता है, जो कुशनर या विटकॉफ के नेतृत्व में संभव नहीं है। कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान से युद्ध में फंसने के बाद खुद डोनाल्ड ट्रंप ने वेंस को इस कूटनीतिक मिशन पर भेजने का निर्णय लिया, ताकि ईरान को अमेरिका की गंभीरता का संदेश दिया जा सके। 

पूर्व अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रॉबर्ट ओ'ब्रायन के मुताबिक, एक निर्वाचित उपराष्ट्रपति के रूप में वेंस बातचीत में इतनी अधिक वैधता लाते हैं, जिसकी बराबरी कोई विदेश मंत्री या सीनेटर (सांसद) भी नहीं कर सकता।

खुद जेडी वेंस के राजनीतिक करियर के लिए यह बातचीत कितनी अहम है?

जेडी वेंस के राजनीतिक करियर और भविष्य के लिए ईरान के साथ यह शांति वार्ता बेहद अहम और एक बड़ा राजनीतिक जुआ मानी जा रही है। इसके परिणाम सीधे तौर पर उनके 2028 के संभावित राष्ट्रपति चुनाव अभियान पर असर डाल सकते हैं।

2028 के राष्ट्रपति चुनाव के लिए दावेदारी: वेंस को 2028 में रिपब्लिकन पार्टी की ओर से राष्ट्रपति पद के सबसे प्रमुख उम्मीदवारों में से एक के रूप में देखा जा रहा है। अगर वह इस शांति समझौते को कराने में सफल होते हैं, तो वैश्विक स्तर पर एक कूटनीतिज्ञ के रूप में उनकी साख बढ़ सकती है। इससे उन्हें मार्को रुबियो जैसे अपने संभावित प्रतिद्वंद्वियों पर भारी बढ़त मिलेगी, क्योंकि वे यह दावा कर सकेंगे कि उन्होंने उस युद्ध को खत्म किया, जिसने ट्रंप के वोटर बेस को बांट दिया था।

जवाद हेरान-निया के मुताबिक, वेंस का रवैया ईरान में यह धारणा बनाता है कि वे भविष्य में राष्ट्रपति पद के लिए खुद को सावधानी से तैयार कर रहे हैं और ट्रंप के सिस्टम में रहते हुए भी अपनी एक स्वतंत्र पहुंच बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं।

नाकामी का भारी राजनीतिक जोखिम: यह उनके अब तक के उपराष्ट्रपति कार्यकाल का सबसे चुनौतीपूर्ण मिशन है, जिसमें अगर बातचीत विफल होती है तो खोने के लिए बहुत कुछ है। अगर कूटनीति विफल हो जाती है, तो उनकी राजनीतिक छवि को नुकसान पहुंच सकता है और अमेरिका के एक लंबे युद्ध में फंसने का काफी हद तक दोष उनके सिर मढ़ा जा सकता है। अगर वह कुछ ठोस परिणाम नहीं लाते हैं, तो उनका कद घटने की आशंका है।

खुद राष्ट्रपति ट्रंप ने एक ईस्टर लंच के दौरान मजाक में कहा था कि अगर यह समझौता नहीं होता है, तो मैं जेडी वेंस को दोष दूंगा और अगर यह हो जाता है, तो मैं इसका पूरा श्रेय लूंगा। इससे स्पष्ट है कि बातचीत में नाकामी की स्थिति में वेंस को ही बलि का बकरा बनाया जा सकता है।

अमेरिकन-जर्मन इंस्टीट्यूट के अध्यक्ष जेफ राथके बताते हैं कि वेंस अमेरिका की विदेश नीति में संयम बरतने की वकालत करते रहे हैं, जिसका ईरान युद्ध में ट्रंप की नीति के साथ मेल खाना बहुत मुश्किल है। उनके मुताबिक, वेंस के लिए सबसे बड़ा जोखिम यह है कि अगर ट्रंप किसी समझौते पर सहमत होकर बाद में अपना मन बदल लेते हैं, तो वे इसका पूरा दोष वार्ताकार वेंस पर मढ़ सकते हैं। अमेरिका के पूर्व एनएसए ओ'ब्रायन कहते हैं कि लंबे युद्धों के विरोध के कारण वेंस के पास समाधान खोजने का एक अच्छा कारण है, लेकिन अगर वह नाकाम होते हैं, तो इससे ट्रंप को फिर से युद्ध शुरू करने का राजनीतिक कवर भी मिल सकता है।

समर्थकों के बीच संतुलन की चुनौती: ट्रंप का कट्टर अमेरिका-फर्स्ट (MAGA) समर्थक वर्ग विदेशी युद्धों का सख्त विरोध करता है। वेंस को ट्रंप के प्रति अपनी वफादारी और लंबे विदेशी युद्धों को लेकर अपने ही युद्ध-विरोधी रुख के बीच सावधानी से संतुलन बनाना पड़ रहा है। अमेरिकी मीडिया ग्रुप सीएनएन के मुताबिक, यह समर्थक वर्ग वेंस पर बहुत करीब से नजर रख रहा है कि वे भविष्य के लिए अपनी विदेश नीति को कैसे आकार देते हैं।

रिपब्लिकन पार्टी के रणनीतिकार मार्क बेडनार का मानना है कि ईरान से बातचीत के लिए वेंस एकदम सही प्रतिनिधि हैं, क्योंकि उन्हें ट्रंप के लक्ष्यों की गहरी समझ है और उन्हें राष्ट्रपति का पूरा भरोसा भी हासिल हुआ है। वह कहते हैं कि अगर वेंस को लगेगा कि अमेरिका के लिए कुछ सही नहीं हो रहा है, तो वह बहस करने से भी पीछे नहीं हटेंगे।


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