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ट्रंप-जिनपिंग की मुलाकात क्यों खास: व्यापार से लेकर ताइवान और ईरान तक, US-चीन के बीच किन मुद्दों पर टकराव तय?
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Wed, 13 May 2026 06:10 PM IST
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सार
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बुधवार को चीन पहुंचें। गुरुवार को उनकी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ व्यापार, टैरिफ, ताइवान और पश्चिम एशिया जैसे अहम मुद्दों पर बातचीत होगी। चीन इस दौरे को अमेरिका के साथ व्यापारिक रिश्ते सुधारने का अवसर मान रहा है। वहीं, दुनिया की नजर इस यात्रा पर इसलिए भी टिकी है, क्योंकि इसमें ईरान संकट और खाड़ी क्षेत्र की स्थिति पर भी चर्चा होने की संभावना है।
शी जिनपिंग से मुलाकात के लिए चीन पहुंचे डोनाल्ड ट्रंप।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप चीन दौरे पर हैं। उनका यह दौरा तीन कारणों से बेहद खास होने वाला है। पहला- यह किसी अमेरिकी राष्ट्रपति का करीब 9 साल में पहला चीन का दौरा है। दूसरा- दोनों ही नेताओं के बीच ईरान युद्ध को लेकर चर्चा तय है। तीसरा- ट्रंप और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग लंबे से चली आ रही कूटनीतिक और व्यापारिक प्रतिद्वंद्विता को लेकर भी चर्चा करेंगे, जो कि पूरी दुनिया के आर्थिक भविष्य को तय कर सकता है। इसे अलावा ट्रंप-जिनपिंग में ताइवान, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और नशीले पदार्थों की तस्करी का मुद्दा भी चर्चा में रह सकता है।
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ऐसे में यह जानना अहम है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के चीन दौरे का पूरा कार्यक्रम क्या रहने वाला है? उनके साथ कौन-कौन चीन दौरे पर आया है? ट्रंप और शी जिनपिंग के बीच किन मुद्दों पर चर्चा तय है? इनमें से किन मुद्दों का दुनिया पर क्या असर हो सकता है? इसे लेकर विशेषज्ञों की क्या राय है? आखिर कब दोनों वैश्विक नेताओं की यह मुलाकात सफल कही जा सकती है? आइये जानते हैं...
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क्या रहेगा ट्रंप का चीन में पूरा कार्यक्रम, साथ में कौन जा रहा?
ट्रंप और शी जिनपिंग के बीच किन मुद्दों पर चर्चा तय है?
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच होने वाले शिखर सम्मेलन में कई अहम वैश्विक और द्विपक्षीय मुद्दों पर चर्चा होनी तय है।1. ईरान युद्ध और पश्चिम एशिया तनाव
अमेरिका-इस्राइल की तरफ से ईरान के खिलाफ छेड़े गए युद्ध पर प्रमुखता से चर्चा होगी। अमेरिका चाहता है कि चीन, जो ईरान के तेल का सबसे बड़ा खरीदार है, ईरान पर अपना कूटनीतिक प्रभाव डाले। इसके जरिए वह ईरान को बातचीत के लिए राजी करना चाहता है, ताकि ऊर्जा आपूर्ति के लिए अहम होर्मुज जलडमरूमध्य को ट्रंप की शर्तों पर सुरक्षित कर फिर से खोला जा सके। इसके अलावा ईरान को चीन की तरफ से संभावित हथियारों के निर्यात और आर्थिक मदद पर भी बात होगी।
2. व्यापार, टैरिफ और निवेश
ट्रंप का दूसरा फोकस व्यापार और अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर होगा। दोनों देश व्यापार युद्ध को शांत रखने, टैरिफ में छूट बढ़ाने और एक नए बोर्ड ऑफ ट्रेड और बोर्ड ऑफ इन्वेस्टमेंट के गठन पर चर्चा कर सकते हैं। अमेरिका को उम्मीद है कि चीन अमेरिकी कृषि उत्पादों, जैसे सोयाबीन; ऊर्जा और बोइंग विमानों की खरीद को लेकर अहम समझौते करेगा।
3. ताइवान का मुद्दा
ताइवान को लेकर चीन और अमेरिका के बीच तनाव एक प्रमुख एजेंडा है। अमेरिका की तरफ से ताइवान को बेचे जाने वाले हथियारों और ताइवान की सुरक्षा को लेकर दोनों नेताओं के बीच बातचीत होगी। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग इस मुद्दे पर अमेरिका से ताइवान की स्वतंत्रता का स्पष्ट विरोध करने जैसी भाषा के इस्तेमाल की उम्मीद कर रहा है।4. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और उच्च तकनीक
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) की रेस, बौद्धिक संपदा की चोरी के आरोपों और इसके सैन्य इस्तेमाल को लेकर दोनों देशों के बीच चर्चा होगी। अमेरिका और चीन उन्नत सेमीकंडक्टर (चिप्स) के निर्यात पर लगे प्रतिबंधों पर बात करेंगे और एआई के इस्तेमाल से होने वाले संभावित संघर्षों से बचने के लिए एक संचार चैनल स्थापित करने पर विचार करेंगे।
5. रेयर अर्थ मिनरल्स
सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रिक वाहन और सैन्य उपकरणों के लिए जरूरी दुर्लभ खनिजों की रिफाइनिंग पर चीन का भारी दबदबा है। अमेरिका इन खनिजों के निर्यात पर चीन की तरफ से लगाए गए प्रतिबंधों को हटाने और इनकी निर्बाध आपूर्ति के समझौते को आगे बढ़ाने पर जोर देगा।
स्कॉट बेसेंट दक्षिण कोरिया में अपनी वार्ता पूरी करने के बाद बीजिंग में ट्रंप की टीम में शामिल होंगे।
सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रिक वाहन और सैन्य उपकरणों के लिए जरूरी दुर्लभ खनिजों की रिफाइनिंग पर चीन का भारी दबदबा है। अमेरिका इन खनिजों के निर्यात पर चीन की तरफ से लगाए गए प्रतिबंधों को हटाने और इनकी निर्बाध आपूर्ति के समझौते को आगे बढ़ाने पर जोर देगा।
स्कॉट बेसेंट दक्षिण कोरिया में अपनी वार्ता पूरी करने के बाद बीजिंग में ट्रंप की टीम में शामिल होंगे।
6. फैंटेनिल और ड्रग तस्करी
ट्रंप इस बैठक में फैंटेनिल संकट का मुद्दा भी उठाएंगे। अमेरिका का आरोप है कि चीनी व्यवसाय मैक्सिको के ड्रग कार्टेल को फैंटेनिल बनाने वाले रसायन सप्लाई करते हैं, जिसे रोकने के लिए चीन पर दबाव बनाया जाएगा।
7. परमाणु हथियार नियंत्रण
अमेरिका लंबे समय से चीन के साथ उसके परमाणु हथियारों के शस्त्रागार और नियंत्रण पर बातचीत शुरू करना चाहता है। हालांकि, चीन इस पर चर्चा करने से कतराता रहा है। इसके बावजूद अमेरिकी राष्ट्रपति इस दिशा में बातचीत की उम्मीद कर रहे हैं।
8. हॉन्गकॉन्ग और मानवाधिकार
ट्रंप ने कहा है कि वह बैठक के दौरान हॉन्गकॉन्ग में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत जेल में बंद मीडिया टाइकून और लोकतंत्र समर्थक जिमी लाई का मुद्दा भी उठाएंगे।
ट्रंप इस बैठक में फैंटेनिल संकट का मुद्दा भी उठाएंगे। अमेरिका का आरोप है कि चीनी व्यवसाय मैक्सिको के ड्रग कार्टेल को फैंटेनिल बनाने वाले रसायन सप्लाई करते हैं, जिसे रोकने के लिए चीन पर दबाव बनाया जाएगा।
7. परमाणु हथियार नियंत्रण
अमेरिका लंबे समय से चीन के साथ उसके परमाणु हथियारों के शस्त्रागार और नियंत्रण पर बातचीत शुरू करना चाहता है। हालांकि, चीन इस पर चर्चा करने से कतराता रहा है। इसके बावजूद अमेरिकी राष्ट्रपति इस दिशा में बातचीत की उम्मीद कर रहे हैं।
8. हॉन्गकॉन्ग और मानवाधिकार
ट्रंप ने कहा है कि वह बैठक के दौरान हॉन्गकॉन्ग में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत जेल में बंद मीडिया टाइकून और लोकतंत्र समर्थक जिमी लाई का मुद्दा भी उठाएंगे।
इनमें से किन मुद्दों का दुनिया पर क्या असर हो सकता है?
ट्रंप और शी जिनपिंग के बीच होने वाली इस बैठक के कई मुद्दों का असर सिर्फ अमेरिका और चीन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी दुनिया पर इसका व्यापक प्रभाव पड़ने की संभावना है, खासकर ईरान संकट से जुड़ी चर्चा का नतीजा सबसे ज्यादा असरकारी होगा।ईरान युद्ध पर चर्चा के नतीजों का क्या असर?
अमेरिका और इस्राइल की तरफ से ईरान के खिलाफ शुरू किए गए युद्ध के बाद से ही दुनिया की करीब 20 फीसदी तेल सप्लाई के लिए जिम्मेदार होर्मुज जलडमरूमध्य से आवाजाही लगभग बंद है। इस तनाव के कारण वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित हुई है। सबसे ज्यादा असर एशियाई देशों पर पड़ा है, जो कि पश्चिम एशियाई देशों पर तेल के लिए निर्भर हैं। वाणिज्यिक जहाजों पर हमलों और देरी के कारण दुनिया भर में तेल, गैस और उर्वरकों की कीमतों में भारी उछाल आया है। अगर ईरान युद्ध सुलझाने को लेकर अमेरिका-ईरान एकमत नहीं होते तो तेल आपूर्ति का संकट और गहरा सकता है, तो इससे दुनिया में वैश्विक मंदी आ सकती है।वैश्विक व्यापार और अर्थव्यवस्था पर क्या असर?
दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच व्यापार युद्ध और 100% से अधिक के टैरिफ लगाने जैसे मुद्दे अगर नहीं सुलझते तो वैश्विक व्यापार और सप्लाई चेन पर गहरा असर पड़ सकता है। अगर दोनों देशों के बीच व्यापारिक तनाव फिर से बढ़ता है, तो यह वैश्विक अर्थव्यवस्था की नींव को हिला सकता है, क्योंकि दुनिया भर के कई देश व्यापार के लिए इन दोनों पर जबरदस्त रूप से निर्भर हैं।ताइवान मुद्दे पर चर्चा का परिणाम कितना दूरगामी?
ताइवान दुनिया का प्रमुख सेमीकंडक्टर (माइक्रोचिप्स) निर्माता है। अगर ताइवान को लेकर अमेरिका और चीन के बीच मुद्दा नहीं सुलझता और आगे कोई सैन्य संघर्ष या अस्थिरता होती है, तो इसका असर पूरे भारत समेत पूरे हिंद-प्रशांत क्षेत्र पर पड़ेगा। इससे दुनिया भर में सेमीकंडक्टर की आपूर्ति ठप हो सकती है, जिससे तकनीक और इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग को भारी नुकसान होगा।एआई शीत युद्ध और हथियारों की होड़ की संभावना क्यों?
अमेरिका और चीन के बीच आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को लेकर चल रही होड़ अब एक तकनीकी शीत युद्ध या एआई शीत युद्ध में बदल रही है। ऐसे में अगर ट्रंप-जिनपिंग की बैठक में एआई को लेकर सहमति नहीं बनती तो बिना किसी कड़े वैश्विक नियम या सुरक्षा मानकों के एआई का सैन्य इस्तेमाल और एआई हथियारों का विकास पूरी दुनिया की सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा बन सकता है।ट्रंप-जिनपिंग के बीच दुर्लभ खनिजों पर चर्चा क्यों जरूरी
चीन का दुनिया के लगभग 90% रेयर अर्थ यानी दुर्लभ खनिजों की रिफाइनिंग पर नियंत्रण है। अगर चीन अमेरिका या अन्य देशों के लिए इनके निर्यात पर रोक लगाता है, तो दुनिया भर में स्मार्टफोन, इलेक्ट्रिक वाहन (ईवी), विंड फार्म, जेट इंजन और सैन्य उपकरणों का उत्पादन बुरी तरह प्रभावित होगा, क्योंकि इन सभी के लिए ये खनिज अनिवार्य हैं।संक्षेप में कहें तो यह शिखर सम्मेलन केवल दो देशों की वार्ता नहीं है, बल्कि यह आने वाले कई वर्षों के लिए वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा बाजार और भविष्य की तकनीक की दिशा तय करेगा।
दोनों देशों की वार्ता को लेकर विशेषज्ञों का क्या कहना है?
अमेरिका और चीन के बीच होने वाले इस उच्च स्तरीय शिखर सम्मेलन को लेकर दुनिया भर के कूटनीतिक और आर्थिक विशेषज्ञों की अपनी-अपनी राय है। कुल मिलाकर, विशेषज्ञ मानते हैं कि दांव पर बहुत कुछ लगा है, लेकिन वे किसी स्थायी या व्यापक समझौते की उम्मीद नहीं कर रहे हैं।1. दिखावा और राजनीतिक फायदे की कोशिश है ये मुलाकात
लीडेन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर साल्वाडोर सैंटिनो रेजिलेम का मानना है कि ट्रंप के लिए यह दौरा मुख्य रूप से अपनी घरेलू राजनीति चमकाने का जरिया है, क्योंकि व्यापारिक मुद्दों के जरिए वे अपने मतदाताओं को आसानी से लुभा सकते हैं।
दूसरी तरफ ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन के काइल चैन के अनुसार, इस वार्ता से किसी बड़े परिणाम की उम्मीद कम है। दोनों नेता मुख्य रूप से अपने संबंधों की पुष्टि करने और स्थिरता बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं।
2. व्यापार और रेयर अर्थ खनिजों की मजबूरी
रेजिलेम के अनुसार, अमेरिका और चीन एक बड़े विरोधाभास में फंसे हुए हैं। दोनों एक-दूसरे से आजादी चाहते हैं। हालांकि, अमेरिका सस्ते उत्पादन के लिए और चीन अमेरिकी बाजार, अर्थव्यवस्था की स्थिरता के लिए उस पर निर्भर है। इसी वजह से किसी बड़े व्यापारिक समझौते के बजाय केवल छोटे और सीमित समझौते, जैसे कुछ टैरिफ रोकना या कृषि उत्पादों की खरीद, होने की संभावना है।
काइल चैन का यह भी मानना है कि ट्रंप प्रशासन का इस वार्ता को लेकर उत्साह मुख्य रूप से चीन से रेयर अर्थ खनिजों की आपूर्ति को फिर से सुचारू करने के लालच से प्रेरित है।
3. ताइवान पर ट्रंप के बयानों को लेकर चिंता
विशेषज्ञ ताइवान के मुद्दे पर ट्रंप की तरफ से इस्तेमाल की जाने वाली भाषा को लेकर काफी आशंकित हैं। पूर्व अमेरिकी अधिकारी जॉन किर्बी और काइल चैन का कहना है कि ताइवान को लेकर अमेरिका के रुख में जरा सा भी बदलाव भारी पड़ सकता है और चीन इस पर बेहद पैनी नजर रखे हुए है।
हालांकि, एशिया सोसाइटी के विशेषज्ञ जॉन डेलुरी का मानना है कि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी ट्रंप की बातों को बहुत गंभीरता से नहीं लेंगे, क्योंकि ट्रंप कभी भी सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए अपनी ही बात से पलट सकते हैं।
रेजिलेम के अनुसार, अमेरिका और चीन एक बड़े विरोधाभास में फंसे हुए हैं। दोनों एक-दूसरे से आजादी चाहते हैं। हालांकि, अमेरिका सस्ते उत्पादन के लिए और चीन अमेरिकी बाजार, अर्थव्यवस्था की स्थिरता के लिए उस पर निर्भर है। इसी वजह से किसी बड़े व्यापारिक समझौते के बजाय केवल छोटे और सीमित समझौते, जैसे कुछ टैरिफ रोकना या कृषि उत्पादों की खरीद, होने की संभावना है।
काइल चैन का यह भी मानना है कि ट्रंप प्रशासन का इस वार्ता को लेकर उत्साह मुख्य रूप से चीन से रेयर अर्थ खनिजों की आपूर्ति को फिर से सुचारू करने के लालच से प्रेरित है।
3. ताइवान पर ट्रंप के बयानों को लेकर चिंता
विशेषज्ञ ताइवान के मुद्दे पर ट्रंप की तरफ से इस्तेमाल की जाने वाली भाषा को लेकर काफी आशंकित हैं। पूर्व अमेरिकी अधिकारी जॉन किर्बी और काइल चैन का कहना है कि ताइवान को लेकर अमेरिका के रुख में जरा सा भी बदलाव भारी पड़ सकता है और चीन इस पर बेहद पैनी नजर रखे हुए है।
हालांकि, एशिया सोसाइटी के विशेषज्ञ जॉन डेलुरी का मानना है कि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी ट्रंप की बातों को बहुत गंभीरता से नहीं लेंगे, क्योंकि ट्रंप कभी भी सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए अपनी ही बात से पलट सकते हैं।
4. ईरान युद्ध से चीन को मिली कूटनीतिक बढ़त
जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर आर्थर डोंग का कहना है कि ईरान युद्ध ने चीन को अमेरिका के सामने एक कूटनीतिक बढ़त दे दी है। डैन ग्रेजियर और अली वाइन जैसे विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका को अच्छी तरह पता है कि ईरान को बातचीत की मेज पर लाने के लिए उसे चीन के प्रभाव का इस्तेमाल करना ही होगा। रणनीतिक विशेषज्ञ ग्रेगरी पोलिंग का यह भी कहना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से दबाव और कूटनीतिक अपमान अमेरिका को झेलना पड़ रहा है, न कि चीन को। आर्थर डोंग ने यह भी चेतावनी दी है कि ईरान में उलझे होने के कारण अमेरिका का ध्यान बंटा हुआ है, जो चीन को ताइवान पर हमला करने का सबसे बेहतरीन मौका दे सकता है।
ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन के रयान हास का आकलन है कि अगर इस दौरे पर ट्रंप को लगता है कि उन्हें पूरा सम्मान मिला है, तो दोनों देशों के बीच की असहज ही सही लेकिन शांति बनी रहेगी, लेकिन अगर वे अपमानित महसूस करते हैं, तो हालात पलटने में देर नहीं लगेगी।
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जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर आर्थर डोंग का कहना है कि ईरान युद्ध ने चीन को अमेरिका के सामने एक कूटनीतिक बढ़त दे दी है। डैन ग्रेजियर और अली वाइन जैसे विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका को अच्छी तरह पता है कि ईरान को बातचीत की मेज पर लाने के लिए उसे चीन के प्रभाव का इस्तेमाल करना ही होगा। रणनीतिक विशेषज्ञ ग्रेगरी पोलिंग का यह भी कहना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से दबाव और कूटनीतिक अपमान अमेरिका को झेलना पड़ रहा है, न कि चीन को। आर्थर डोंग ने यह भी चेतावनी दी है कि ईरान में उलझे होने के कारण अमेरिका का ध्यान बंटा हुआ है, जो चीन को ताइवान पर हमला करने का सबसे बेहतरीन मौका दे सकता है।
ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन के रयान हास का आकलन है कि अगर इस दौरे पर ट्रंप को लगता है कि उन्हें पूरा सम्मान मिला है, तो दोनों देशों के बीच की असहज ही सही लेकिन शांति बनी रहेगी, लेकिन अगर वे अपमानित महसूस करते हैं, तो हालात पलटने में देर नहीं लगेगी।
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